एशियन बॉक्सिंग चैम्पियनशिप के फाइनल मुकाबले में कवीन्द्र सिंह बिष्ट ने 56 किलो भारवर्ग में सिल्वर मैडल जीता. बीस वर्ष के कवीन्द्र बिष्ट का फाइनल मुकाबला उज्बेकिस्तान के बाक्सर मिर्जा से हुआ. इससे पहले भारत के कवीन्द्र बिष्ट ने मौजूदा वर्ल्ड चैम्पियन येरालियेव को हराया था.
पिथौरागढ़ के रहने वाले कवीन्द्र सिंह बिष्ट ने इस चैम्पियनशिप में सबका दिल जीत लिया. फाइलन से पहले कवीन्द्र के लिये सोशियल मिडिया पर लोगों ने हजारों बधाई संदेश भेजे थे.
सेमीफाइनल मुकाबले में कवीन्द्र सिंह बिष्ट ने मंगोलिया के मुक्केबाज अमर खाखू को पराजित कर फाइनल में प्रवेश कर लिया है. इस मुकाबले के दौरान कवीन्द्र की आंख में भी चोट लगी थी.
कवीन्द्र सिंह बिष्ट पिथौरागढ़ में पंडा गांव के रहने वाले हैं और वर्तमान में वायुसेना में कार्यरत हैं. कवीन्द्र सिंह विष्ट के पिता आईटीबीपी में नौकरी करते थे.
पिथौरागढ़ में कवीन्द्र के शुरूआती कोच धरम चंद रहे. 2009 में कवीन्द्र साई सेंटर काशीपुर में दाखिला लिया. यहां उनके कोच एचएस संधू रहे. कोच एचएस संधू से 2013 तक कवीन्द्र सिंह बिष्ट ने बाक्सिंग की बारीकियां सीखी.
इस प्रतियोगिता में भारत के 13 में से 6 बॉक्सर अमित पंघल, कवीन्द्र सिंह बिष्ट, दीपक सिंह, आशीष कुमार, पूजा रानी और सिमरनजीत कौर फाइनल में पहुंचे थे. जिनमें से अमित और पूजा ने ही स्वर्ण पदक जीते. एशियन बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में भारत ने 2 स्वर्ण समेत कुल 13 पदक जीते. इनमें से एक स्वर्ण समेत 7 पदक पुरुष और एक स्वर्ण समेत 6 पदक महिला मुक्केबाजों ने जीते.
-काफल ट्री डेस्क
वाट्सएप में पोस्ट पाने के लिये यहाँ क्लिक करें. वाट्सएप काफल ट्री
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें : Kafal Tree Online
इसे भी पढ़ें :
अस्कोट में आज भी मौजूद है पाल शासकों का महल
भगवान शिव के विषय में मजाक-छेड़छाड़ भरा गीत
भारत का सबसे पहला मैथोडिस्ट चर्च नैनीताल में बनाया गया
पिथौरागढ़ के लिये अब चलेगी ग्रीन हवाई सेवा
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
बचपन में हमें होली-दिवाली और राखी के अलावा मकर संक्रांति, घी त्यार और फूलदेई जैसे उत्सवों…
इस बार करीब 9 साल बाद पिथौरागढ़ जाकर एक बात साफ दिखी कि यहां कुछ…
आस्था और विश्वास की प्रतीक श्री नंदा देवी की भक्ति में इन दिनों पूरा उत्तराखंड…
उत्तराखण्ड के पहाड़ों में मेले केवल मनोरंजन के अवसर नहीं रहे हैं. वे लोकजीवन की…
पिछली कड़ी : बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की…
1970 के दशक का उत्तराखण्ड का ‘चिपको आंदोलन’ विश्वविख्यात है. यह तथ्य भी कमोबेश ज्ञात है कि…