पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र खो दिए, और वररुचि राज्य के प्रधान मंत्री बने. पर सत्ता का स्थिर रहना ही अंत नहीं होता, वास्तविक परीक्षा तब शुरू होती है, जब शक्ति मनुष्य को बदलने लगती है. आप हमारी वेबसाइट पर पहले ही “पुष्पदन्त और माल्यवान को मिला श्राप” और “पुष्पदंत बने वररुचि और सीखे वेद”, और पाटलिपुत्र की स्थापना की कथा पढ़ चुके हैं. अब कथा उस बिंदु पर पहुँचती है, जहाँ धैर्य, प्रतिशोध और समय की प्रतीक्षा; तीनों आमने-सामने आते हैं. यह कथा है : शकटाल के प्रतिशोध की.
वररुचि ने अपनी कथा आगे बढ़ाई, “धीरे-धीरे योगनंद अपने भोग-विलास में डूबने लगा. जैसे मद में चूर हाथी किसी अंकुश को नहीं मानता, वैसे ही राजा अब संयम से दूर होता जा रहा था. अचानक मिली अपार संपत्ति किसे उन्मत्त नहीं कर देती? यह देखकर मेरे मन में विचार आया; ‘राजा स्वयं पर नियंत्रण खो रहा है और मैं उसके काम सँभालते-सँभालते अपने कर्तव्यों से भी चूक रहा हूँ. क्यों न शकटाल को मुक्त कर दिया जाए, ताकि वह शासन के भार में सहायता करे. वह चाहे मेरा शत्रु ही क्यों न हो, जब तक मैं सत्ता में हूँ, वह मुझे अधिक हानि नहीं पहुँचा सकता.’
मैंने राजा से अनुमति ली और उस अंधे कारागार से शकटाल को बाहर निकलवाया. ब्राह्मण स्वभाव से करुणाशील होते हैं; यह मैंने उस समय किया. शकटाल भली-भाँति समझ गया था कि जब तक मैं, वररुचि, राजा का मुख्य सलाहकार हूँ, तब तक योगनंद को हटाना असंभव है. इसलिए उसने नदी की धारा में झुक जाने वाले नरकट की तरह व्यवहार करना चुना; समय आने तक झुकना, बहना और प्रतीक्षा करना.
मेरे आग्रह पर वह चतुर शकटाल फिर से राज्य के प्रधान मंत्री के पद पर बैठा. बाहर से वह आज्ञाकारी और निष्ठावान दिखता था, पर उसके भीतर प्रतिशोध की अग्नि शांत नहीं हुई थी; वह केवल उचित क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी.”
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