पिछली कड़ी : तिवारी मॉडल में पहाड़ की उद्योग नीति और पलायन
आजादी के दौर में 1946 से 1954 तक का समय उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों या आज के उत्तराखंड के लिए आधारभूत नीतिगत नींव रखने वाला समय बना. संसाधन सीमित थे तो पहले मुख्यमंत्री पंडित गोविन्द बल्लभ पंत की आर्थिक सोच यह बनी कि पहाड़ में प्रशासन, आधारभूत ढांचा व शिक्षा पहुंचे तो विकास स्वयं आएगा. 1947 में उत्तरप्रदेश में प्रशासनिक एकीकरण की प्रक्रिया चली पर क्षेत्रीय असंतुलन बना रहा. यह दौर राष्ट्रीय एकीकरण का था. अवसंरचना दुर्बल व सीमित थी. इस दौर में पंडित पंत ने प्रशासनिक ढांचे का आधार स्थापित करने के प्रयास किये. समस्या बनी रही कि पहाड़ के भूगोल के अनुसार अलग नीति न बन पाई. सड़क, उद्योग व शिक्षा पर विनियोग सीमित रहा.
पंत जी के भाषणों को पढ़ते साफ इशारा मिलता है कि सबसे पहले तो वह पर्वतीय इलाके में प्रशासनिक ढांचा पहुँचा देना चाहते थे. फिर यहाँ के शहरों में उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय व अन्यत्र इंटर व जूनियर स्कूल, गाँव-गांव प्राथमिक स्कूल खोलना उन्हें बहुत जरुरी लगा ताकि कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे बालक- बालिका शिक्षा के अवसर की प्राप्ति कर सकें. उनका मानना था कि पहाड़ की समस्याएं मात्र आर्थिक नहीं हैं संरचनात्मक अलगाव की हैं. इसलिए लोगों को सबसे पहले तो यह लगना चाहिये कि अब तो उनका अपना राज है. यानी पहाड़ वासियों के दिल में राज्य की उपस्थिति दर्ज करानी होगी.
पंडित पंत “नीचे से नियोजन” के पक्षधर रहे. उन्होंने पर्वतीय प्रदेश में प्रशासनिक विकेंन्द्रीकरण किया. गढ़वाल और कुमाऊं मण्डलों में इसका ढांचा मजबूत बनाया. तहसील स्तर तक राजकीय कार्यालय खोले और स्थानीय भर्ती पर भी जोर दिया. स्वाभाविक था कि ऐसे में राज्य की बात गांव तक पहुंची और लोगों को लगा कि शासन उनके करीब आ रहा है.उन्होंने जन सुलभ शिक्षा के क्रमिक विस्तार पर बल दिया. मिशनरियों द्वारा पहाड़ में कुछ जगह उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यालय खुले थे तो आर्थिक रूप से संपन्न स्थानीय प्रबुद्ध जन आरम्भ से ही ऐसे प्रयास कर चुके थे. पंडित पंत ने शिक्षा हेतु राजकीय स्तर पर गुणात्मक संवर्धन व प्रसार की नीति अपनाई. इंटर कॉलेज व डिग्री कॉलेज की स्थापना हुई. अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और टिहरी में शिक्षा संस्थान बढ़े. इनमें सबसे उल्लेखनीय योगदान नैनीताल में मालदार दान सिंह के विनियोग से खुला डी एस बी राजकीय महाविद्यालय रहा जहाँ पंत जी ने प्राध्यापक वर्ग के लिए अन्य के सापेक्ष उच्च वेतन की सुविधा दे उसे गुणात्मक आधार प्रदान किया. पर्वतीय इलाका साक्षरता में उत्तरप्रदेश के अन्य भागों की तुलना में आगे निकलने लगा. शिक्षित युवाओं की वह नई पीढ़ी तैयार हुई जो गांव की पृष्ठ भूमि से आगे निकल दुर्गमता व अलगाव के कई चक्र पार कर अपने परिश्रम, साहस व लगन से सेना, तकनीक,विज्ञान, संस्कृति, पुलिस-प्रशासन, साहित्य,चिकित्सा व कानून में अपनी योग्यता सिद्ध कर गये. लड़कियां भी आगे निकलीं. यह गुणात्मक विकास के लक्षण थे.
पंत जी के समय रणनीतिक सड़क निर्माण का भी पुनरुद्धार हुआ जिसका सीमांत जिलों में अभाव था. डाक तार की व्यवस्था गांव-गांव फैली. पर्वतीय संपर्क मार्गो पगडंडियों का नेटवर्क मजबूत हुआ. गांव के डाकखाने व पैदल रास्ते अलग थलग पड़ गए गाँवों के अलगाव को दूर करने में बहुत सहायक बने. आवत-जावत, सौदा पत्ता, सेना व अन्य आपूर्तियां व प्रशासन की दौड़ भाग संभव हुई.
पंत के शासन काल का महत्वपूर्ण पक्ष भूमि व वन नीति का संतुलन-समायोजन था. ब्रिटिश काल की कठोर वन नीतियों में आंशिक ढील दी गई. गांव वालों को सीमित ही सही पर वन उपयोग का अधिकार मिला. जानवरों की घास-पात उनकी चराई व चूल्हे चौके के लिए स्थानीय रेंज से अनुमति मिलने के अधिकार व व्यवस्था बनी.
उपनिवेश काल 1815 से 1947 में विकास नहीं संसाधन प्रबंध प्राथमिक लक्ष्य था. पहाड़ को राजस्व व सैन्य दृष्टि से ही उपयोगी माना गया था. सैन्य व व्यापारिक मार्गों पर ही सीमित सड़कें थीं. वन व पेय जल स्त्रोतों व खनिजों पर सरकार बहादुर का कब्ज़ा था. वन अधिनियम से स्थानीय लोगों के पारस्परिक अधिकार सीमित कर दिए गए थे. चाय बागान, वन, सैनिक भर्ती व ठेकेदारी को बढ़ावा दिया गया था.
सेना की भर्ती व सीमित रोजगार के अवसर दिलाए गये. पहाड़ की कठिन दिनचर्या में शारीरिक सौष्ठव वाले किशोर -युवाओं की अच्छी मांग थी, उन्हें भर्ती में प्राथमिकता भी मिलती थी. राज्य की तृतीय व चतुर्थ वर्ग की सेवा में भी कुछ अवसर मिले. इससे गांव तक नकद आय का आधार बना. मनी आर्डर इकॉनमी फलने फूलने लगी थी जो गाँव छोड़ कमाने गए परिवारों की कृय शक्ति व बचत की प्रकृति बनी. साथ में जीवन निर्वाह की खेती, बाल बच्चों के लिए दूध घी, क्यारियों में उगे साबुत मसाले और सब्जी घर के आस पास के पेड़ों से मिले फल-फूल तो रहे ही.
कृषि परंपरागत ही रही. स्थानीय बीजों पर निर्भरता थी. हर इलाके की किस्में भिन्नता भी रखती थी. उस समय अनाज की स्थानीय किस्में ही बोई जाती थीं जो दूर-दूर तक मशहूर होती थीं. खेती विशुद्ध रूप से जैविकीय थी. सिंचाई के लिहाज से अलग-अलग रुझान थे कई स्थानों में गूल व नहरें बेहतर थीं तो कई जगहों में पानी का टोटा था. यही दशा पीने के पानी के नौलों-धारों व खाल की भी थीं. गांव की औरतों का बड़ा समय पीने का पानी, चूल्हे की लकड़ी और जानवरों की घास खा जाता था.
अंग्रेजों के समय से पहाड़ में स्थानीय फल, जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प, धातु के बर्तन, खेती के औजार पर स्थानीय तकनीक से छोटा परिवार संचालित उद्योग अपनी उपस्थिति जता रहा था.हर क्षेत्र में इनके कुशल कामगार व शिल्पकार थे, स्थानीय धातुओं व पत्थर-पटाल बनाने लगाने में चतुर मिस्त्री थे. खादी व ग्रामोद्योग की अच्छी इकाईयां चल रही थीं. परंपरागत तकनीक का जमाना था जिसमें अनाज को कूटने के लिए उखल, पीसने के लिए घट, व स्थानीय खास लकड़ियों से बने साधारण यँत्र मुख्य रहे. सीमांत इलाकों में ऊन का काम व तिब्बत से व्यापार फल फूल रहा था.
आजादी के बाद जो जोश उभरा उसमें शिक्षित होने की चाह मुख्य थी. नौकरी भी मिल रही थी. लोग तकनीकी रूप से कुशल होना चाह रहे थे.पर गांव में रोजगार के मौके न थे. सो लोग गांव से निकलते रहे. त्यौहार मेलों घर के कामकाज में आते भी रहे. पलायन तो हो ही रहा था.
पंतजी ने पहाड़ को शिक्षित किया. उनका समय स्वाधीन भारत की संरचनात्मक नींव रखने का था. आर्थिक संवृद्धि के संकेतकों में वृद्धि दिखाई भी दी. पहाड़ को उन्होंने राज्य से एकीकृत करते मुख्य धारा से जोड़ने के प्रयास भी किये पर ग्रामीण पहाड़ी उत्पादन की बड़ी मंडियों में लगातार पहुँच हो नहीं पाई जिससे विविध प्रसार -विस्तार व श्रृंखला प्रभाव उपज न पाए.
पंडित गोविन्द बल्लभ पंत के बाद जिन मुख्य मंत्रियों का कार्यकाल आया उनमें से अधिकांश ने समूचे प्रदेश के लिए नीति बना उसे पहाड़ पर रोपने की कोशिश की इसलिए हर किसी की विकास प्राथमिकता का पहाड़ पर अलग सा प्रभाव पड़ा. सन 1954 से 1960 तक सम्पूर्णानंद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे जो समाजवादी सिद्धांतों पर आधारित विकास नीति पर विश्वास करते थे. उन्होंने सहकारी समितियों का विस्तार किया और पहाड़ में सामुदायिक विकास के कार्यक्रमों को गति दी. विनियोग का आधिक्य मैदानी इलाकों में बना रहा.
अब आया 1960 का दशक जिसके कई कार्यकालों में चंद्रभानु गुप्त मुख्यमंत्री रहे. प्रशासनिक दृष्टि से वह उत्तम रहे और उत्तरप्रदेश के शहरी विकास को उन्होंने प्राथमिकता दी. उनके समय में लखनऊ, कानपुर और मेरठ जैसे शहरों में अधिक विनियोग हुआ पर पहाड़ के लिए अलग से कोई योजना न बनी. अब तक पहाड़ में क्षेत्रीय असमानताऐं काफी गहरी हो चुकी थीं व सरकार के रवय्ये से असंतोष भी बढ़ता जा रहा था. नैनीताल के महाविद्यालय ठाकुर देव सिंह दान सिंह बिष्ट राजकीय महाविद्यालय,जिसे पंडित गोविन्द बल्लभ पंत ने प्रदेश के अन्य महाविद्यालयों की तुलना में उच्च प्रतिमान व प्राध्यापकों को अधिक वेतनमान दे विशिष्ट बनाने की आधारशिला रखी थी वहां चंद्र भानु गुप्त ने बढ़े वेतनमान गिरा दिए. महाविद्यालय के विस्तार के परिव्यय भी धट गये. गौरतलब है कि चंद्र भानु गुप्त पहाड़ से भी चुनाव जीते थे.
1963 से 1967 की अवधि में सुचेता कृपलानी ने उत्तरप्रदेश का राज संभाला. वित्तीय अनुशासन के साथ ग्रामीण विकास उनकी प्राथमिकता रही. उनके समय में गांव-गांव तक सड़कें पहुंची. पंचायत के कार्यक्रमों को नई दिशा मिली. उन्होंने महिला शिक्षा और उनके स्वास्थ्य पर समुचित ध्यान दिया. पहाड़ को उनकी योजनाओं के फायदे मिले पर यहाँ के लघु-कुटीर धंधों की स्थानिक प्रकृति को देखती योजनाओं की क्षेत्रीय जनता आस लगाती रही.
1967 से 1968 और फिर 1970 में चौधरी चरण सिंह के शासन में विकास की नीतियाँ खेतिहर-किसान के पक्ष में रहीं. उन्होंने भूमि-सुधार कानून लागू किये और छोटी जोत वाले किसानों के हक दिलाने की कोशिश की. उनकी नीतियाँ मैदानी खेती के ढांचे से बेहतर तालमेल बनाती थीं. पहाड़ के सीढ़ी दार खेतोँ व तलाऊं-उपरांऊ की खेती पर इनका असर न पड़ा.
1971 से 1973 तक अवसंरचना व रेलवे के विस्तार में पंडित कमलापति त्रिपाठी का योगदान महत्वपूर्ण रहा. तराई इलाके का अधिक विकास हुआ. पहाड़ में भी सीमित सड़क विस्तार हुआ.
1973 से 1975 की अवधि पहाड़ के लिए सबसे संवेदनशील मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा का कार्यकाल रही. उन्होंने सबसे पहले तो पहाड़ी जिलों में प्रशासनिक पद बढ़ाए. स्थानीय युवकों को भर्ती में अधिक अवसर दिए. पहाड़ के पर्यटन की दिशा व सम्भावनाओं की पहचान की. पहली बार यह कहने वाले मुख्यमंत्री बहुगुणा ही थे कि पर्वतीय इलाका अलग आर्थिक नीति मांगता है.
1976-77,1984-85 व 1988-89 में नारायण दत्त तिवारी उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. पर्वतीय प्रदेश में उनका प्रभाव बाद में उत्तराखंड राज्य बनने के बाद दिखा. उनकी नीतियाँ रोजगार आधारित विकास, उद्योग व विनियोग आकर्षण पुष्ट करने की प्राथमिकता लिए थीं. पहाड़ में उद्योग लगाने की सम्भावनाएं उन्हीं के प्रयास से संभव हुईं जो बाद में राज्य बनने पर सही आकार ले पायीं.
1970 से 1990 का समय पहाड़ के प्रति आंशिक विकास प्रयास से संयोजित रहा जिसमें योजनाएं बनी पर संरचनात्मक ढांचे की दुर्बलता व क्षेत्रीय बाजार की अपूर्णताएं मौजूद थीं. पहाड़ पर किया खर्च रिस- रिस कर पहुँचता था. इसी समय अवधि में “पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम” का सूत्रपात हुआ अर्थात पहाड़ के बारे में जो सोच अंचल में उभर रही थी उसकी आवाज राजधानी लखनऊ के गालियारों में भी सुनाई देने लगी. क्षेत्रीय विकास की योजनाओं में लघु व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने के साथ सिंचाई व गूल से पहाड़ की खेती को उन्नत करने पर जोर दिया गया. ग्रामीण सड़कों पर काम भी आरम्भ हुआ. क्षेत्रीय असमानता की समस्या को देशव्यापी स्तर पर हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुखर किया तो नारायण दत्त तिवारी ने भीमताल और काशीपुर में औद्योगिक आस्थानों की नींव डाली. साथ ही शिक्षा संस्थानों व जल विद्युत परियोजनाओं को आधार दिया. 1980 से 1990 की अवधि में तिवारीजी का समय सबसे संगठित विकास प्रयासों पर केंद्रित था जिसमें उन्होंने उद्योग, तकनीकी शिक्षा, पर्यटन व ऊर्जा के चार स्तम्भों पर समानान्तर काम किया.
1990 के दशक में मुलायम सिंह व कल्याण सिंह राज्य के मुख्यमंत्री रहे जो मुख्यतः राजनीतिक संतुलन साधने व बड़े राज्य के प्रबंधन में ही व्यस्त रहा. पहाड़ प्रशासन की दृष्टि से उपेक्षित तो रहा ही अलग राज्य की भावनाएं और उग्र हुईं. मुलायम सरकार के समय रामपुर तिराहा जैसी बर्बर घटनाएं हुईं जिसमें पुलिस -प्रशासन का वरद हस्त था.यह राज्य आंदोलन व गठन काल रहा जिसमें पहाड़ के लिए प्रथक नीति को लागू करने का भावनात्मक स्पर्श था. इसका कारण पहाड़ से हो रहा निरन्तर पलायन, पहाड़ में काम धंधे का अभाव और सभी लाभकारी योजनाओं का रुझान मैदान की तरफ कर दिए जाने का गुस्सा था. विकेंद्रित प्रशासन की संरचना के साथ स्थानीय भूगोल पर आधारित नीति के आधार पर प्रथक उत्तराखंड की मांग वर्ष 2000 में असमंजस के साथ स्वीकार हुई.
ऐतिहासिक अवलोकन से स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक काल में पहाड़ के संसाधनों पर नियंत्रण व उनका विदोहन मुख्य नीति थी. 1950से 1970 में प्रशासनिक सुधार तो हुए पर क्षेत्रीय नीति न बनी. 1970 से 1980 के दशक में पहली बार पहाड़ विशिष्ट योजनाएं बनी तो गंभीर प्रयास बाद में ही हुए.
समग्र रूप से 1970 तक की नीतियों से पर्वतीय इलाकों में संस्थागत विकास, शिक्षा व प्रशासन पर जोर दिया गया जिससे गुणात्मक आधार सबल बना. 1970 से 1985 तक राजनीतिक अस्तव्यस्तता व उठापठक में पहाड़ का विकास उपेक्षित रहा. आंचलिक असमानता बढीं. यह असंतुलन और आंदोलन का समय था.क्षेत्रीय समन्वय के साथ विनियोग पर आधारित रुपरेखा के साथ नारायण दत्त तिवारी के प्रयास ऐसे थे जिनसे स्वयं स्फूर्ति की दशा उत्पन्न हो सके.
आजादी के बाद के दौर में पहाड़ हितैषी मुख्यमंत्रियों में पंडित गोविन्द बल्लभ पंत सबसे महत्वपूर्ण थे जिन्होंने गांव तक प्रशासनिक ढांचे व सड़क संपर्क की शुरुवात कर पहाड़ के “सुदीर्घकलिक विकास” का आधार बनाया. पहाड़ को पहली बार “एक अलग विकास इकाई ” मानने वाले हेमवतीनंदन बहुगुणा रहे. उन्होंने पहाड़ के लिए प्रथक नीति की अवधारणा रखी, स्थानीय भर्ती बढ़ाई और पर्यटन की सम्भावनाएं रखीं.
उनके बाद तिवारीजी का प्रारूप महत्वपूर्ण था जिनकी औद्योगिक विकास की सोच, विनियोग वृद्धि व रोजगार आधारित दृष्टि से तदन्तर उत्तराखंड राज्य की औद्योगिक रीढ़ मजबूत बनी. सामाजिक विकास पर ग्रामीण योजनाएँ और महिला शिक्षा पर जोर देने वाली सुचेता कृपलानी थीं. संस्थाओं को मजबूत बनाते शिक्षा व सहकारिता पर बल डॉ सम्पूर्णानंद ने दिया. वहीँ भूमि सुधार पर चौधरी चरण सिंह सबसे आगे रहे जिसका प्रभाव पहाड़ पर तो कमजोर ही रहा पर तराई भाबर व मैदान के किसानों के लिए उपयोगी रहा.अन्य मुख्यमंत्रियों की नीति राज्य स्तरीय रही जिसमें पहाड़ के भूगोल को समझते हुए कोई विशेष योजना नहीं बनी. इसी उपेक्षा से उत्तराखंड राज्य आंदोलन की मांग जोर पकड़ती रही.
पहाड़ के विकास को ध्यान में रखते हुए आधारभूत ढांचे के लिए पंत, नीति दृष्टि में बहुगुणा, आर्थिक मामलों में तिवारी, सामाजिक संवृद्धि में सुचेता कृपलानी व शिक्षा में सम्पूर्णा नंद मुख्य आधार स्तम्भ रहे. पहाड़ में विकास की लहर तब चली जब इसकी क्षेत्रीय विशिष्टताओं को ध्यान में रखा गया जब भी इसे उत्तरप्रदेश का हिस्सा मान सामान्य नीति इस पर थोपी गयी विकास की गति मंद पड़ी.
अनुभवसिद्ध अवलोकन से स्पष्ट है की पहाड़ का विकास सामान्य राजनीति नहीं बल्कि विशेष क्षेत्रीय नीति को अपनाये जाने की अपेक्षा रखता था. इनमें बहुगुणा उत्तरप्रदेश के ऐसे नेता थे जिन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों की समस्या को प्रशासनिक नहीं वरन भौगोलिक आर्थिक चुनौती के रूप में समझा था. उनका कार्यकाल भले ही दो वर्ष का रहा हो पर दृष्टि व निर्णयों से वह पर्वतीय नीति दृष्टा रहे. प्रशासनिक अधिकारियों को उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए कि पहाड़ी जिलों के लिए वह अनुकूल विकास प्राथमिकताएं तय करें. उनके समय पर्वतीय जिलों में सरकारी पद बढ़ाए गये. स्थानीय युवकों को नियुक्ति में प्राथमिकता दी गई तथा जिला प्रशासन को अधिक स्वायत्तता दी गई. इन सबसे स्थानीय लोगों को शासन व्यवस्था में भागीदारी मिलनी सम्भव हुई.ग्रामीण समाज की टोह में बहुगुणा की दृष्टि पैनी थी इसीलिए अपने कार्यकाल में उन्होंने महिलाओं के सशक्तीकरण की योजनाओं को प्राथमिकता दी, ग्रामीण सहकारिता को जरुरी समझा और पहाड़ में शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों की अभिवृद्धि को जरुरी समझा. कसर यह रह गई कि उनका कार्य काल दो वर्ष की सीमित अवधि का ही रहा इसलिए उनकी कई योजनाएं फाइल तक ही सिमट कर रह गईं. फिर भी उनका योगदान महत्त्व पूर्ण था जिन्होंने पहाड़ के लिए नीति निर्माण आधार को मजबूत किया ठीक उसी तरह जैसे पंडित पंत ने पहाड़ में प्रशासन की बुनियाद रखी और तिवारीजी ने आर्थिक रणनीति रची.बहुगुणा पहाड़ की समस्या गहराई से महसूस करते थे और स्वीकार करते थे कि इनके निदान के लिए सुदीर्घकालिक समाधान चाहिये. एक अलग पर्वतीय विकास अभिकरण, पहाड़ को अलग बजट हेड व छोटे उद्योग धंधों के लिए कर की छूट के साथ पर्यटन आधारित आर्थिकी विकास की गति को बढ़ाती क्योंकि पर्यटन को वह पहाड़ के विकास का मुख्य अवलम्ब मानते रहे.
पहाड़ के पर्यटन को बहुगुणा ने तीन स्तरों में रखा. धार्मिक पर्यटन, प्राकृतिक पर्यटन और साहसिक पर्यटन. उस समय यह विचार दूरदर्शी था क्योंकि भारत में पर्यटन नीति अभी पहाड़ों के बारे में स्पष्टता न लिए थी. इसी बात को ध्यान में रख उन्होंने दुर्गम इलाकों में संपर्क मार्ग व सीमांत जिलों में सड़क परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जिसका लक्ष्य सुरक्षा के साथ बाजार की पहुँच और बेहतर प्रशासन का आधार बनाना रहा. उन्होंने स्वीकार किया कि यदि पहाड़ों में विनियोग न बढ़ाया गया तो पलायन बढ़ता जाएगा. यहाँ के मेहनतकश बाहर काम खोजने के बजाय स्थानीय उद्यम करते इससे न तो इलाके खाली होते बंजर पड़ते. बहुगुणा जी ने सीमांत जिलों के महत्त्व को समझा. उनकी सोच थी कि उत्तराखंड की सीमा के निकट बसे शहर आर्थिक परिक्षेत्र बने व सेना आपूर्ति के क्लस्टर हों. इससे पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी सीमांत आर्थिक हब का स्वरूप लें.
पहाड़ के विकास की रणनीतियाँ प्रतिक्रिया आधारित रहीं पर बहुगुणा की सोच पहाड़ के पूर्व नियोजित विकास पर केंद्रित रहीं इसी लिए उन्होंने क्षेत्रीय संतुलन, स्थानीय कामधंधे व प्रशासनिक विकेंद्रीयक रण पर जोर दिया. पर्यटन बहुगुणा का विजन था तो खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को वह स्थानीय संसाधन आधारित बनाना चाहते थे. वह पहाड़ के लिए छोटे स्थानीय उद्योगों के समर्थक थे व उनकी प्राथमिकता जड़ी – बूटी उद्योग, फल प्रसंस्करण, ऊन व हस्तशिल्प था. उनकी कार्यनीति जिला प्रशासन को अधिकार देते हुए जिलाधिकारी आधारित विकास परियोजनाऐं लागू कर स्थानीय योजना इकाई को सबल करना चाहती थीं. यह नीचे से नियोजन की रणनीति थी जिससे विकेंद्रित राज्य की बुनियाद मजबूत पड़ती.
विकास के मात्रात्मक स्वरूप के साथ उन्होंने इसके अधिक महत्वपूर्ण गुणात्मक पक्ष पर अधिक जोर दिया. वह चाहते थे कि हर ब्लॉक में इंटर कॉलेज हो जिसके साथ ही पहाड़ में तकनीकी संस्थान खोले जाएँ व स्थानीय व आंचलिक विषय आधारित पाठ्यक्रम बनें. ऐसा करने से पहाड़ की युवा शक्ति बाहर नौकरी खोजने के बजाय अपने स्थानीय उद्यम में अवसर प्राप्त कर सकती है.
हेमवती नंदन बहुगुणा ने पहली बार क्षेत्रीय असमानता का पक्ष रखा था तो नारायण दत्त तिवारी ने औद्योगिक व ऊर्जा उत्पादन की दृष्टि प्रदान की. ऐतिहासिक अवलोकन से यह स्पष्ट होता है की पहाड़ में विकास की सुगबुगाहट तो सिर्फ तब हुई जब शासन का ध्यान स्थानीय मुद्दों पर गया. पहाड़ के विकास की सोच भी 1970 के दशक से आरम्भ हुई. इससे पहले शासन केवल संसाधन दोहन व प्रशासन के ढांचे के निर्माण की नीति पर चला. पर्वतीय विकास की उपेक्षा का संरचनात्मक कारण यह भी रहा कि शासन का केंद्र या तो दिल्ली थी या राजधानी.संसाधनों का आवंटन जनसंख्या आधारित था जिसमें पहाड़ को हमेशा कम बजट मिला. उद्योग नीति भी मैदान केंद्रित थी तो प्रशासनिक अधिकारी भी मैदान के अनुभव वाले. इससे साफ पता चलता है कि समस्या नेतृत्व से अधिक अधिक “नेतृत्व ढांचे” की रही.
वह मुख्य मंत्री जिनके समय में पहाड़ सबसे अधिक उपेक्षित रहा उनमें 1985-86 में वीर बहादुर सिंह रहे जिसमें समस्त औद्योगिक विनियोग मुख्यतः मैदानी जिलों में ही हुआ. पहाड़ की सड़क और स्वास्थ्य सेवाएं भी दुर्बल पड़ गईं. इसके बाद 1989से 1991 व फिर 1993 से 1995 में मुलायम सिंह सरकार ने पर्वतीय प्रदेशों की समस्याओं के बढ़ने और अलग राज्य की मांगों को गंभीरता से नहीं लिया. 1994 में रामपुर तिराहा जैसी दमनकारी घटना हुई जिसके बाद उत्तराखंड राज्य के आंदोलन ने गति पकड़ी. 1997 से 1999 में कल्याण सिंह सरकार ने भी अलग राज्य की मांग पर प्रारंभिक अनिच्छा की थी. वह 1991-92 में भी मुख्यमंत्री रह चुके थे. इस अवधि में पहाड़ के प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण में शिथिलता आई. इन नेताओं की प्राथमिकताएं मैदानी क्षेत्र के विकास पर रहीं जिसका कारण राज्य की संरचना और चला आ रहा नीतिगत प्रारूप था. इसे उत्तरप्रदेश के केंद्रीय कृत प्रशासनिक ढांचे की संरचनात्मक समस्या के रूप में देखा जा सकता है.
गोविन्द बल्लभ पंत ने जहाँ प्रशासन को सुदृढ बनाया पर अलग से पर्वतीय नीति नहीं बनाई. सम्पूर्णा नंद ने शिक्षा विस्तार किया पर पहाड़ के लिए अलग योजना न बनी. चंद्रभानु गुप्त के समय सीमित सड़क विस्तार हुआ तो सुचेता कृपलानी के समय प्रशासनिक स्थिरता आई पर विकास की गति धीमी ही रही. चौधरी चरण सिंह ने कृषि सुधार किये जिनका पहाड़ पर सीमित असर रहा. त्रिभुवन नारायण सिंह ने योजनागत चर्चा अधिक की जो लागू कम ही हुईं. कमलापति त्रिपाठी के समय सड़क विस्तार की गति संभली.
हेमवती नंदन बहुगुणा ने पहली बार क्षेत्रीय असमानता और असंतुलन का पक्ष सामने रखा. नारायण दत्त तिवारी ने औद्योगिक व ऊर्जा पर विनियोग को प्राथमिकता दी. आगे रामनरेश यादव के समय विकास योजनाएं अवरुद्ध ही रहीं तो उनके बाद बनारसीदास का कार्यकाल इतना सीमित था कि प्रभाव नगण्य ही रहे .विश्वनाथ प्रताप सिंह ने क्षेत्रीय नीति तो नहीं बनाई पर उनके समय प्रशासनिक सुधार अवश्य हुए. फिर आए श्रीपति मिश्र जिनके अल्प समय में योजनाएँ तो बनी पर उनका अनुपालन न हो सका. पुनः नारायण दत्त तिवारी आए जिन्होंने उद्योग, विनियोग व शिक्षा को प्राथमिक महत्त्व दिया. शासन में फिर उलट फेर हुआ तो वीर बहादुर सिंह आए जिनके समय विनियोग अधिकांशतः मैदानी भागों में ही किया गया. फिर नारायणदत्त तिवारी ने पद संभाला जिसमें सबसे अधिक संतुलित क्षेत्रीय विनियोग किया गया.
1989-91 की अवधि में मुलायम सिंह के रहते अलग राज्य की मांग अस्वीकार कर दी गई थी. अगले ही साल कल्याण सिंह के आने पर विकेंद्रीकरण धीमा पड़ गया. 1993-94 में सत्ता की बागडोर फिर मुलायम सिंह के हाथ आई और उन पर उत्तराखंड आंदोलन के दमन का आरोप लगा. 1997-99 में कल्याण सिंह ने राज्य गठन के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया. आखिरकार तमाम असमंजस के बीच वर्ष 2000 में राजनाथ सिंह के मुख्य मंत्री रहते उत्तराखंड राज्य निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ी.
पहाड़ समर्थक नेतृत्व में समस्या की पहचान करने वाले बहुगुणा थे तो इसका समाधान प्रारूप नारायण दत्त तिवारी ने दिया. आजादी के बाद पहले पचीस वर्ष प्रथक राज्य की जरुरत पर उपेक्षा भरे रहे. फिर अगले बीस वर्षों में धीरे धीरे इसे महसूस किया गया तो दस साल तक तेज होते राजनीतिक दबाव व सांस्कृतिक आंदोलन से आया बदलाव उत्तराखंड राज्य के गठन का कारक बना. नीति निर्माताओं को यह समझ में आया कि पर्वतीय प्रदेश का विकास तो स्वयं स्फूर्ति तब ही प्राप्त कर सकता है जब इसे स्थानीय संसाधन उपयोग, स्थानीय रोजगार और आंचलिक रणनीतियों का समर्थन करती विकेंद्रित शासन व्यवस्था से संयोजित किया जाए.

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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