1857 का ग़दर और उत्तराखंड

1857 की क्रान्ति तक कुमाऊँ में गार्डनर, ट्रेल, गोवन, लुशिंगटन और बैटन के नेतृत्व में ब्रिटिश कंपनी के शासन को 42 साल गुजर चुके थे. गदर के दौरान कुमाऊँ का कमीश्नर हैनरी रैमजे था. हैनरी रैमजे को 1857 तक कुमाऊँ कमीश्नर के पद पर 15 माह हो चुके थे. हैनरी रैमजे पिछले 15 सालों से कुमाऊँ क्षेत्र में विभिन्न पदों पर रह चुका था. हैनरी रैमजे कुमाऊँ क्षेत्र से इतना परिचित हो चुका था कि वह स्थानीय लोगों से टूटी-फूटी कुमाऊंनी में ही बातचीत भी करता था.

1857 के गदर के बाद जुलाई 1858 में रैमजे ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी. रिपोर्ट के अनुसार 22 मई 1857 को अपने गढ़वाल दौरे के दौरान रैमजे को ग़दर की जानकारी मिली. जिसके बाद वह तत्काल अल्मोड़ा पहुंचा. अपनी रिपोर्ट में रैमजे ने बताया कि अल्मोड़ा में सुरक्षा प्रबंध के बाद वह नैनीताल के सुरक्षा प्रबंध में जुट गया. नैनीताल में प्रवेश के दो दर्रे थे जिनकी सुरक्षा सैनिक बिना बंदूक के केवल पत्थर गिराकर ही कर सकते थे.

जून 1857 के समय डाक व्यवस्था पूरी तरह भंग हो गयी थी और अंगेजों को मैदानी इलाक़ों से किसी भी प्रकार की सूचना नहीं मिला रही थी. पहाड़ो में गदर की किसी भी घटना के शुरू होने से पहले ही काबू पा लिया गया था. जुलाई अंत तक मसूरी के रास्ते डाक व्यवस्था पुनः प्रारंभ की गयी. इस दौरान बरेली और मुरादाबाद से अनेक शरणार्थी नैनीताल पहुँचने लगे. हैनरी रैमजे ने इस दौरान पूरे कुमाऊं में मार्शल लॉ लागू किया था.

अपनी रिपोर्ट में रैमजे ने बताया की रामपुर के नवाब ने अपनी रियासत में शान्ति व्यवस्था कायम की उसने न्यायाधीश क्रेकोफ्ट विल्सन को भी मुरादाबाद से नैनीताल पहुंचाने में सहायता की. इस दौरान कुमाऊँ में 66 गोरखा और 8 अनियमित कुमाऊँनी सेना थी. हैनरी रैमजे को इस दौरान महिलाओं और बच्चों को मसूरी भेजने का आदेश दिया गया. उसने आदेश का पालन नहीं किया क्योंकि यह अव्यवहारिक था. उसकी नजर में नैनीताल मसूरी के मुकाबले अधिक सुरक्षित था साथ ही माल ढ़ोने के लिये कुलीयों की संख्या भी नहीं थी.

इस दौरान भारवाहक कुलियों की कमी कारण 40 बंदियों को इस शर्त पर छोड़ा गया कि यदि उनका आचरण अच्छा रहा तो उन्हें क्षमादान कर दिया जायेगा. इन्हीं बंदियों ने कालाढूंगी में ग़दर आन्दोलनकारियों को मौत के घाट उत्तराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

संदर्भ ग्रन्थ : शेखर पाठक की पुस्तक सरफरोशी की तमन्ना और पुरवासी पत्रिका के अंक.

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Girish Lohani

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