लेखे के नये लाल बैग से निकला निर्मल बजट उत्साह संवर्धन नीति का पिटारा लाया है. ऐसे समय में जब आर्थिक शीत युद्ध की कमान तेजी से दुनिया में भारत की ओर तान दी गयीं हों. वाहय असंतुलन से निबटते हुए आतंरिक स्थायित्व बनाये रखना मौद्रिक व राजकोषीय नीतियों के समंजन पर निर्भर करता है जिसके कई पैमाने अर्थशास्त्री जे. ई. मीड ने सुझाए थे. वित्त मंत्री की सूझ-बूझ 2026 के बजट में साफ झलकती है. अब तय की गई विकास की परियोजनाओं का लेखा-जोखा रख, खर्च जारी रखते हुए दायित्वों को पूरा करना राज्य की जिम्मेदारी बताता है साथ ही क्या किया और हमें क्या मिला की जवाब देही भी लेता है. जमा-खर्च का हिसाब तो लोग लेंगे ही, समझेंगे भी.
(Uttarakhand in Union Budget)
2026 का बजट अर्थव्यवस्था को स्थिर रखते हुए विकास प्रेरित विनियोग के नामे पूंजीगत व्यय में बढ़ोत्तरी के सन्देश देता है. खर्च की आदत को काबू में रखते हुए इसे इस प्रकार समंजित करने का प्रयास करता है जिससे कर्ज व ब्याज के भुगतान का बोझ सीमित रहे. ऐसा तो बिल्कुल न हो कि कमर ही झुक जाए. यह समझ में आता है कि रीढ़ की हड्डी सीधी रखने के सिलसिले में कर्ज से सकल राष्ट्रीय उत्पाद के अनुपात को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश हो रही है, यानी स्ट्रेस रिलीफ. अब देखना ठीक आगे है. न्यूनता वित्त प्रबंधन के दिन गए. लोकलुभावन की कोई कोशिश नहीं. बाजार अपूर्णताओं का दलदल में किसी सूरत में न फसें इसलिए जो अपने हाथ की मुट्ठी में है उससे ही विनियोग योग्य वित्तीय स्वास्थ्य बनाये रखने की जुगत भिड़ानी है. साफ संकेत देना है कि राजकोष की नीति स्थिर राजस्व आधार पर टिकाई जाएगी, कर्ज की आदत बढ़ाने पर नहीं, भीख की झोली फैला के भी नहीं. अब राष्ट्र की गरिमा का सवाल है.
लगातार वृद्धि प्रेरित खर्च, कर संग्रह, बेहतर वित्तीय प्रबंध व लागत प्रभावी सार्वजनिक विनियोग से सरकार वित्तीय घाटे को कम करने व खर्च संतुलित करना चाह रही है जिससे ” वृद्धि के साथ स्थायित्व” की नीतिगत संरचना में कसा गया है.
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का कहना है कि केंद्रीय बजट 2026-27 में विभिन्न योजनाओं में किये आवंटन से उत्तराखंड को करीब ₹ 40,000 करोड़ की परियोजनाएँ मिलने की आस है. इनके तालमेल से ढांचे मतलब अंर्तसंरचना का विस्तार होगा. पढ़ाई-लिखाई व लोगों की सेहत सुधरेगी, कामकाज का सीप और अच्छा होगा व कामगार बढ़ेंगे. यह उम्मीद भी रहेगी कि तेजी से हवाखोरी के लिए झुलसती धूप से बचने के लिए और बरफ देखने की हौस में जो लोग पहाड़ चढ़े जा रहे, थम ही न रहे उनका बढ़ता हुआ रेला गुणात्मक रूप से समृद्ध दिशा प्राप्त करेगा तभी बरफ से ढके पहाड़ काले न दिखेंगे और न ही ठेके पे कूड़ा बीनते ट्रक इतनी गन्दगी कुड़ खड्डों में डालेंगे कि पूरा इलाका बदबदा उठे. ओ चार धाम के देबता, पंच नाम देवा, नैनीताल की नयनादेवी, कैंची वाले बाबा, उधर हरिद्वार की मनसादेवी दून मसूरी तक भक्त पहुँचाने वाली,हे खोली के गणेशा, हे भूमिया, खसों की धरा के ओ पैको. सब ये विनती सुन लेना हो, साथ साथ कथनी -करनी की भूल चूक माफ भी कर देना. इतने साल हो गए बजट आते कितने मामलों में कोई सुध ही न ली तुमने, आई रकम वापस फरका दी.
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सो अब इस साल इतवार को पहली तारीख को पेश देश के बजट में उत्तराखंड में लोग-बाग यानी मानव संसाधन की खुशहाली के लिए, यहाँ के नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर खुलने की मंशा प्रकट हुई. सेवाओं का बढ़ना, तमाम काम-काज जैसे हॉस्पिटेलिटी पर ध्यान, सेहत, घूमक्कड़ी व कल पुर्जे औजार के उपयोग की बेहतर तमीज को तो बढ़ा ही देना है जान दिल खुश हुआ दिमाग की नसें उलझ मिटा गयीं. सब जानते हैं कि पहाड़ी मानस जब पढ़-लिख समझदार गुणवान बनेंगे तो जारी योजनाओं में उनके लिए काम के मौके अपने आप बढ़ेंगे.कई कई कोस दूर गाड़ गधेरे पार कर ब्लैक बोर्ड के दर्शन किये थे उन्होंने. हाईस्कूल इंटर किया तो पता चला कि गांव व उसके आस-पास कमाने का कोई जरिया ही नहीं तो बह निकले कस्बे पार कर नगर महानगर की ओर. सपड़ गए. गांव अकेला पड़ गया.अभी भी लिखाई पढ़ाई के समाचार यह हैं कि कक्षा में बैठ पोथी घोटना नई जमात को पसंद ही नहीं आ रहा. बड़े-बड़े गुरू श्रेष्ठ भी कोई रोक टोक बर्दास्त नहीं करते. बायोमेट्रिक हाजिरी तो बिल्कुल न लगाएंगे पर अड़ भी जाते हैं. अभी भी महाविद्यालयों में करोड़ों के बजट से बने कमरों की कुर्सियां खाली पड़ी रह जाती हैं. कम्प्यूटर सजावट का नायाब माल बनता है. खेल चाहे कैसे-कैसे देख लो उनमें. रिफरेन्स किताब की कौन कहे अब तो कहानी उपन्यास नाटक पढ़ने वालों का टोटा है. परीक्षा में दी गयी कॉपी के आधे से ज्यादा भाग कोरे छूटे दिख रहे. लिखने की आदत तो गई. जहां पहले दुनिया की बेहतर नई किताब सुलभ होती थी वहाँ अब मोमबत्ती बिक रही. रेल स्टेशन में एएच व्हिलर के बोर्ड तक गनेल के सींग की तरह गायब हैं. जो बढ़िया सरकारी कॉलेज थे बरसों पहले उसे बड़े गठजोड़ से स्वायत बनाया. बड़ा हो हुल्ल्ड हुआ. जहां अनगिनत को प्रवेश मिलता था वहां सीट बांध दी. ना इससे ज्यादा एडमिशन नहीं होंगे. साथ में तुर्रा यह कि पछत्तर से कम प्रतिशत पर परीक्षा देने के लायक ही न समझे जाएंगे बच्चे. बवाल कटा कि इससे तो बेकारी बढ़ेगी. उपकथा यह भी कि जमे जमाए प्रोफेसर को दस से पांच स्वायत्त में पड़े रहने की बेड़ी पड़ी. कौन चाहेगा ऐसी बंदिश. फिर ये स्वायत्त नये विश्वविद्यालय के नाम पट्ट में बदल गया. अभी शिक्षा मंत्री की हसरत है कि और नये स्वायत्त का उदघाटन करेंगे. पुराने घघरे में नई ब्वारी क्यों न सिसके. उसकी तो रील ही न बनी.
एक सीमांत का महाविद्यालय रहा जिसके खुलने के दौर निर्माण में छात्रों ने बलिदान दिया. उसे बेहतरीन प्राचार्यों व दक्ष स्टॉफ ने लिखाई-पढ़ाई-खेल-रिसर्च-नाटक-संस्कृति-लोकथात का नामचीन बना दिया. उसे सब पुरानी सुधबुध मिटा कैंपस कॉलेज बना दिया. सरकारी प्राध्यापक ट्रांसफर हो गये सब अब तदर्थ के हवाले जब तक नये पद श्रजित हो भरे न जाएँ. दूसरी ओर प्ले स्कूल से ले सी बीएससी बोर्ड हो या यूजीसी के झंडे तले निजी कॉलेज तकनीकी कॉलेज कहाँ से कहां पहुँच गए भले ही असिस्टेंट प्रोफेसर को नियमों की धता बंधा बीस हज़ार थमा रहे हों. अब बेकार इतने ही सत्कार में ही मगन है. उन्हें भी साइड जॉब का चस्का लग गया है.
नये किसम का नवप्रवर्तन हो रहा. कहते थे पहाड़ में दूध से ज्यादा देसी विदेशी के ठेके हैं.अब तो क्या कुछ नहीं पहुँच गया. खिलाडी-साहसी-फौज-पुलिस में नाम कमा मनी आर्डर इकॉनमी से गांव की दशा सुधारने वालों की नई पीढ़ी अब पबजी का शौक फरमा रही. कुछ सूंघ रही कुछ खींच रही कुछ गटक रही.अभिभावकों की समर्थ दशा है तो आधुनिक स्कूल में भेजेंगे ही जहां सारी चमक-धमक-प्रदर्शन है. नतीजा अगर कुंठा अवसाद है तो गलती किसकी? ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स की सुध किसे रही.
बजट में उल्लेख है कि आम लोगों की सेहत व अस्पताल-दवा को तवज्जो मिलने से राज्य की तंदरुस्ती मजबूत-ठोस रहेगी व चिकित्सा पर्यटन जैसे शौक के लिए प्रेरित विनियोग का रास्ता भी खुलेगा. शहर के बड़े अस्पताल चांदी काटेंगे.
बात जहां तक आंकड़ों की हो तो उत्तराखंड को केंद्रीय कर आगम से ₹ 1841 करोड़ की बढ़ी हुई राशि मिलेगी जो राज्य स्तर की योजनाओं में खर्च हो सकती है, क्योंकि 16वें वित्त आयोग ने उत्तराखंड की हिस्सेदारी 1.118 % से बढ़ा कर 1.141% कर दी है. अब रेलवे बजट में ₹4769 करोड़ का आवंटन हुआ है जो पिछले वर्षों से अधिक है. इससे रेलवे अंर्तसंरचना का विस्तार, स्टेशन पुर्ननिर्माण, ट्रैक निर्माण व सुरक्षा के उपाय संभव होंगे. ऋषिकेश-कर्ण प्रयाग जैसी बड़ी रेल परियोजनाओं के पूरा होने से कनेक्टिविटी व यात्री प्रवाह दोनों को मजबूती मिलेगी. पर्यटन संबंधी नई पहल में टिकाऊ पर्वतीय ट्रेल्स की घोषणा हिमाचल, जम्मू-कश्मीर व उत्तराखंड के लिए की गयी है. इनसे रोमांचकारी पर्यटन थ्रिल के साथ पहुँच सुविधाएं बढ़ेंगी. साथ ही इको पर्यटन, स्थानीय गाइड प्रशिक्षण व सेवा सुविधाएं बल प्राप्त करेंगी. पर्यटन पहाड़ी आर्थिकी में स्थिर आय का स्त्रोत बनने की पूरी गुंजाईश रखता है बल.
केंद्रीय उड़ान योजना के विस्तार से पिथौरागढ़, नैनीसैनी, गोचर व चिन्यालीसौड़ जैसे पैरलेक्स हवाई पट्टियों को कनेक्टिविटी मिलेगी. इससे दूर दराज के इलाकों में चिकित्सा आपात सेवा व आवाजाही भी बढ़ेगी. इनमें से दो हवाई अड्डों की निगरानी वायु सेना भी करेगी.
अब आती है खेती. बजट में कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रति खेतिहर, पशुपालक व उच्च मूल्य वाली उपजों पर विशेष ध्यान दिया गया है. हालांकि नारियल, काजू, कोकोआ, चन्दन पहाड़ की फसल नहीं हैं. यहाँ के परंपरागत कृषि आधार को पुर्नजीवित कर पहाड़ी कृषि उत्पादों का बाजार बढ़ना तय है जो गाँव के इलाके में ज्यादा लोगों को काम देगा. कृषि उद्योग पनपेंगे व गांव में स्थिर नियमित आय प्राप्त होनी संभव होगी.
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उत्तराखंड को केंद्र से जो रकम मिली है उसके उपयोग के कई भले संकेत हैं. विशेष पूंजी विनियोग सहायता (एसएएससीआई) की पहली किश्त ₹484 करोड़ मिली थी जिसका समयबद्ध व सही रूप से चिकित्सा शिक्षा, सिंचाई, गृह उद्योग, व तकनीकी शिक्षा जैसी कुल 43 परियोजनाओं पर व्यय कर लिया गया. तब राज्य को दूसरी किश्त का ₹250 करोड़ मिल गया व राज्य ₹734 करोड़ की प्रोत्साहन राशि का भी पात्र बना.
बजट 2026 में उत्तराखंड को केंद्रीय करों की हिस्सेदारी के करीब ₹17,414 करोड़ प्राप्त होने हैं जो पिछले वर्ष से ₹1,841 करोड़ अधिक हैं. राज्य के लिए यह स्थिर और बढ़ता राजस्व का स्त्रोत बना जिसे सूझ-बूझ से व्यय कर सरकार योजनाओं को गुणात्मक रूप से भी समृद्ध कर सकती है. रेल बजट में उत्तराखंड को ₹ 4,769 करोड़ की राशि प्राप्त होने के संयोग हैं व ₹39,491 करोड़ की रेलवे अंतरसंरचना परियोजना की प्रगति के लिए दिए जाएंगे. अब ऋषिकेश -कर्ण प्रयाग रेल लाइन जैसी मुख्य परियोजनाएँ अंतिम चरण में हैं व राज्य में रेल नेटवर्क विस्तार, विद्युतीकरण का कार्य व कनेक्टिविटी की बड़ी परियोजनाओं का काम जानकार संतोषजनक बताते हैं. हालांकि राज्य द्वारा केंद्रीय सहायता कोष के कुछ अंश का उपयोग लक्ष्य के अनुरूप नहीं हुआ जिसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय ने केंद्रीय सहायता के उपयोग पर नियमित समीक्षा कमेटी बनाने का निर्देश दिया था. राज्यों को कोष मिलने के बाद योजनाओं की प्रगति समय से हो व उन पर निगरानी रखी जाय यह मनः स्थिति दृढ़ करने का टेक ऑफ आ गया है.
कुछ केंद्रीय योजनाओं जैसे 15 वें वित्त आयोग की पंचायत निधि (₹94.236करोड़) भी उत्तराखंड को जारी हुई पर इसके परिणाम के आंकड़े सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं. इसका स्थानीय स्तर पर कहाँ और कैसे कितना उपयोग हुआ स्पष्ट रहे तो स्थानीय समुदाय को इस वित्त का प्रभावी लाभ पता चले. जनता देख सके कि उसके विकास खंड में क्या परियोजना है? कितना पैसा आया और काम कब पूरा होगा? इस पारदर्शिता से जानकारी-जागरूकता बढ़ेगी. अब राजनय यह भी सावधानी रखें कि कोई भी नई योजना तब ही बने जब पुरानी की समीक्षा पूरी हो जाए.उसके गुण -अवगुण पहचान लिए जाएं. वरना सब धान एक पसेरी!
उत्तराखंड के लिए बजट 2026 दरवाजा खोलता है पर इसके अंदर जा जन-जन को सुविधा अवसर की पगडण्डियों पर ले जाना तो प्रदेश सरकार के इशारों पर है. इसलिए उसे बजट की निगरानी को उच्च प्राथमिकता देनी होगी. इसके लिए ढांचा भी मौजूद है और अनुभवी युवा व बुजुर्ग नौकरशाह भी, जो यह जानते-चाहते हैं कि बजट मात्र घोषणा न रहे बल्कि जमीनी स्तर पर परिणाम दे. हर मंडल में ऐसे आयुक्त व जिलाधिकारी हैं जो गांव की अपनी थात का मोह रखते हैं और सुधार के कठोर कदम उठाने के उदाहरण देते रहे हैं.
बजट में प्राप्त अवसरों को पाने के लिए तंत्र की सूझ बूझ अब क्रियात्मक वित्त की उस गहरी पैठ की अपेक्षा करती है जिसे अर्थशास्त्री अब्बा पी लर्नर ने तमाम आर्थिक झंझावतों को दूर करने के उपाय के रूप में दिया था. उसके विचार की थाह से यह समझ साफ होती है कि व्यय का स्त्रोत क्या है? कैसे इसके आवंटन और गतिशीलता पर पूरा ध्यान रखा जा सकता है.
उदाहरण के लिए पर्यटन-इको टूरिज्म-सस्टेनेबल ट्रेल डेवलपमेंट में केंद्रीय घोषणा हिमालयी राज्यों में ट्रेकिंग व पर्यटन की अवसंरचना का विस्तार है. यहाँ नोडल पर्यटन मंत्रालय भारत सरकार है तो उत्तराखंड का पर्यटन के साथ-वन साथ ग्राम्य विकास विभाग इसे कार्य रूप देगा. अब उत्तराखंड सरकार का प्राथमिक कार्य तो यह हो कि वह 50 से 100 ट्रेल कॉरिडोर चिन्हित कर उनकी डीपीआर केंद्र को भेजे और इस सिलसिले में ग्राम पंचायत को सहभागी बनाए. जमीनी स्तर पर स्थानीय युवकों को गाइड लाइसेंस दिए जाएँ. आस-पास के तमाम होम स्टे पंजीकृत व सूचीबद्ध रहें तथा ट्रेल मार्ग के ठहराव बिंदुओं पर स्थानीय दुकानें आवंटित की जाएँ. यदि डीपीआर नहीं भेजी तो कोष किसी और राज्य को मिल जायेंगे. राज्य नैनी-सैनी, गोचर व चिन्यालीसौड़ के विस्तार की नवीकृत डीपीआर भी बनाए. जहाँ कहीं भूमि विवाद हैं उनका निबटान करे और टूर ऑपरेटर के साथ व्यवहार्यता वित्त पोषण प्रस्ताव रखे.इससे चिकित्सा आकस्मिकता व टूरिस्ट पैकेज उड़ान के लाभ सुलभ होंगे.
रेलवे के भारी विनियोग हेतु रेल मंत्रालय अधिकृत है जिसमें राज्य की यह भूमिका रहेगी कि भूमि अधिग्रहण के साथ टनल व स्टेशन हेतु स्थानीय क्लियरेन्स का रास्ता साफ रखे. राज्य लाभ प्राप्त करने के लिए स्टेशन के पास फूड कोर्ट, स्थानीय हैंडीक्राफ्ट बाजार व टैक्सी स्टैंड की व्यवस्था बनाए.
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कृषि व उच्च मूल्य वाली स्थानीय उपजों की वृद्धि का दारोमदार राज्य का कृषि विभाग देखेगा. राज्य मोटे अनाज, दालों के साथ स्थानीय फलों के क्लस्टर सुदृढ़ करे, एफपीओ बनाए व प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करे. यह नीति उत्तराखंड में डॉ रघुनन्दन सिंह टोलिया सुविचारित रूप से लागू करने के लिए उत्साह शील रहे. उनके समय प्रशासनिक प्रशिक्षण अकादमी नैनीताल में ग्राम्य विकास पर हुई अनेकों कार्यशालाएं आयोजित हुईं थीं. आईसीमोड के रुझान भी पर्वतीय विकास की नीति को व्यावहारिक ढांचे में बदलने के उपाय बताते थे. इसका पूरा ढांचा बना था. नवीकृत परियोजना में इनके कोष का स्त्रोत राष्ट्रीय कृषि विकास योजना व खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय होगा. यहाँ सबसे बड़ी चूक यह होगी जब लाभार्थी को अनुदान दे कर मुक्त कर दिया जाएगाहमेशा की तरह. रामगढ़ मुकतेश्वर से आगे उत्तरकाशी हर्षिल तक ऐसे खुशदिल बागवान हैं जो अपनी लगन से बाग लहलहाने के विशेषज्ञ बन चुके हैं बिना सरकारी मदद की चाहत लिए. कुछ साल हुए तब के जिलाधिकारी ने सेब के पौंधे सिलसिले से लगाए अब उनमें फल आने की खबर भी सोशल मीडिया पर है.जरा खोजबीन करें तो पुराने बीज बचा कर रखने वाले बुबू भी हैं यहाँ और ताल खाल बना जंगल उगाने वाले भी. कुछ ने आटा पीसने के घट भी जारी रखे हैं.पत्थर के काम और लकड़ी की नक्काशी वाले हाथ भी. बैद भी और जगरिये-डंगरिये भी. छोलिया नर्तक के दल भी जिन्हें दूर-दूर से बुलावा आता है. ऐसे अभियंता भी जो पढ़ने समझने की आदत पाड़ने के लिए कई पुस्तक मेले लगा चुके तो अंग्रेजी दां लिटरेरी फेस्टिवल वाले भी. दुख इस बात का भी कि पृथ्वी थिएटर से अपनी पहचान बना कई उपन्यास लिखने वाले नाटककार पंडित गोविन्द बल्लभ पंत की रचनाओं का संग्रह छापने का जब शासन ने मन बनाया तो उनकी छपी कई पाण्डुलिपियाँ मिली ही नहीं. यह सब समझ तब आएगी जब रील बनाने से हट कुछ आगे सोचा जाए. लाखों का पैकेज छोड़ गांव में बेहतर और कारगरतकनीक से कुछ नया कर डालने वाले भी हैं आसपास.
बजट में ई एमएसएमई/स्टार्टअप व उद्यमिता संवर्धन के अवसर हैं. राज्य में इसे उद्योग विभाग द्वारा क्रियान्वित किया जाना है. पूर्व में इनकी लचर कार्यप्रणाली व कमीशन खोरी के किस्से सी ग्रेड की फिल्मों जैसे थे. अब तो सुशासन और पारदर्शिता की खबरें हैं. तो सबसे पहले यह विभाग पर्वतीय एमएसएमई नीति को डाने-काने-गाड़- गधेरे पार कर सबल करे. छोटी परियोजना, कल कारखाने पर फोकस कर पहाड़ी उद्यमी छांटे. सरकारी मदद का हिस्सा उसके खाते में डाले. ब्याज अनुदान पर सरकारी अमला तुरंत कार्यवाही का फैसला ले व पहाड़ में अगली इकाइयों के लिए भूमि बैंक बनाए. स्थानीय प्राथमिक उद्योग में फूड प्रोसेसिंग, हर्बल, वूलेन वुड क्राफ्ट मुख्य हैं जिनके कुशल कामगार आज भी परंपरागत धंधों को अपने बूते जीवित रखे हैं. जीवन चंद्र जोशी जैसे लकड़ी की नक्काशी के कुशल कारीगर व प्रशिक्षक हैं जिनने शारीरिक असमर्थता के परे जा कर भी अपने बूते अपना हुनर जीवित रखा है. अब जा मुख्यमंत्री से सम्मान भी मिला है. अब ऐसा न हो कि नये स्टार्ट अप सुविचारित योजना के बिना केवल अखबारों की सुर्खियों व स्टार्टअप मीट तक सीमित रह जाएं.
पहाड़ की धमनी शिरा को निरंतरता युक्त बनाना है जिसका प्रवाह सारे अंचल की उत्पादन व सेवा दशा पर पड़ता है. उत्तराखंड में आवाजाही की प्रवृति के मात्रात्मक आंकड़ों के बखान से उसकी गुणात्मक सिद्धि नहीं हो जाती. अब समस्या मुख्य पर्यटन स्थलों में धारक क्षमता से ज्यादा भीड़ है जिसका प्रबंध उलझन भरा है. प्रशासन इसे नियंत्रित करे तो व्यवसायी के हित आहत हों.राज्य कौशल विभाग पर्यटन के हॉस्पिटेलिटी आधारित कोर्स चलाए उनमें प्रशिक्षण व अप्रेन्टिशिप मुख्य हो जिसकी मदद से गाइड उन्हें उस नवीन उत्तराखंड तक पहुँचाए जहाँ पहले पहुँच न थी. रोमांचक पर्यटन के द्वार खुलते ही जा रहे हैं.छोटा कैलाश यात्रा ने टनकपुर से चम्पावत के बीच नए ठहराव स्थल उभार दिए हैं. होटल सुविधा बढ़ा डालीं हैं. होम स्टे खुले हैं. साथ में गन्दगी, कचरा, प्रदूषण भी. हिम ढकी चोटियां काली दिख रहीं. दुर्घटनाएं बढ़ रहीं. भूस्खलन है- भारी बारिश-बादल फटना है. इसी कारण पर्यावरण आपदा शमन के लिए राज्य की पहल जरुरी है. अलग से पर्वतीय प्रतिस्कन्दन पैकेज की मांग हो जो पहाड़ की मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने वाली कुशलता दिखाए.
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केंद्रीय बजट में कई पहाड़ी संवेदनशील क्षेत्रों जैसे जल संरक्षण, आपदा में सुधार, हरित ऊर्जा व पर्यावरण लॉजिस्टिक्स के लिए विशेष पैकेज स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं हैं. यह अवसर की बड़ी चूक है क्योंकि पहाड़ी राज्य आपदा-जोखिम और संसाधन संरक्षण के लिए विशेष सहायता के पात्र हैं ही. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ समझौता ज्ञापन हो. बजट की नीयत साफ है कि बिना राज्य की मंशा व दबाव के कोई अतिरिक्त धन राशि नहीं मिलने वाली.
फिर सबसे संवेदनशील प्राथमिकता तो चिकित्सा व स्वास्थ्य की दशा है. सुविधा वाले शहरों में पर्ची बनाने वालों की अपार भीड़ है. जरुरी जाँच के करोड़ो के उपकरण हैं पर न तो स्थापित हुए हैं और यदि हैं भी तो आधे अधूरे प्रबंध में चलाने वाले नहीं. नामचीन डॉक्टर हैं पर पूरा स्टॉफ नहीं. कस्बों और गाँवो से मरीज पीठ पर, खाट पर बांध लाये जाते हैं. समय पर अस्पताल न पहुँचने से कितने गर्भस्त शिशु काल के गाल में समा जाते हैं. सरकार ने जो सुविधाएं गोल्ड कार्ड व आयुष्मान से देने का वादा किया है उनमें विसंगतियां बहुत हैं. मरीज कई परिस्थितियों में अपने को ठगा पाता है. विषम भूगोल वाले पहाड़ के लिए स्वास्थ्य सुविधा का पुष्ट होना पहली जरुरत है. ऐसी योजनाएं स्वास्थ्य व परिवार कल्याण द्वारा निदेशित होंगी जिन्हें राज्य का स्वास्थ्य विभाग संचालित करेगा. उसे यह ध्यान रखना होगा कि आम आदमी के बदन व जेब की परवाह के साथ ऋषिकेश, हल्द्वानी, अल्मोड़ा व अन्य शहरों में मेडिकल हब बनाए व सहायक सेवाओं में नर्सिंग व पैरा मेडिकल के प्रशिक्षण की बेहतर व्यवस्था करे. गांव की आशा कार्यकर्त्ता को न भूले जिनने कोविड काल में अपने काम को शीर्ष ऊंचाइयों में पहुंचा दिया था.
बजट से स्वास्थ्य-चिकित्सा, कौशल, रेल-हवाई कनेक्टिविटी के साथ पर्यटन व खेती-बागवानी को विकास मूलक समर्थन मिलता है जो राज्य सरकार की विकास परियोजनाओं का केंद्रीय तंत्र से गठजोड़ कर अवसर व सुविधा प्रदान करने का सही समय आ गया है.
राज्य स्तर पर आवश्यक संस्थागत ढांचे को चतुर बनाना होगा. हर परियोजना बनाने वाली इकाई-विस्तृत परियोजना रिपोर्ट लिखने में तर्क संगत दृष्टिकोण रखे .हर जिले में विनियोग नियंत्रक जरुरी हो. यदि राज्य इसमें चूक गया तो वित्त कोई और राज्य प्राप्त कर लेगा. बजट सिर्फ समाचार रह जाएगा.
राज्य के बजट के अनुरक्षण के लिए बनी संरचना सभी केंद्रीय योजनाओं की सूची व उसमें प्राप्त हो सकने वाली रकम सुस्पस्ट करे. बजट में कई घोषणाऐं हैं जैसे तेज रफ्तार रेल, पर्यटन के नवीन कार्यक्रम, लघु एवम कुटीर उद्योग को सहायता के कई पक्ष, बुनियादी ढांचे का फैलाव पर इनमें से उत्तराखंड को मिलने वाली राशि/कोष के कई पक्ष, लक्ष्य बद्ध विवरण बजट के मुख्य भाषण में स्पष्ट नहीं हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य को मिलने वाली योजनाओं की वास्तविक राशियाँ और समय क्रम अभी स्पष्ट नहीं है. यह तो केंद्र-राज्य की बॉन्डिंग या सम्बन्ध जुड़ाव के बाद ही तय होंगी.
बजट में पर्यावरण-हरित ऊर्जा में हिमालयी राज्यों के लिए बड़े प्रोत्साहन की आस थी पर न तो इको-तंत्र और न ही पवन व सौर ऊर्जा पर बड़े विनियोग व संबंधित परियोजना की स्पष्टता है. राज्य विशेष के लिए भारत सरकार का बजट आईटम नहीं बना है. राज्यों को मिलने वाले कोष का स्पष्ट लक्ष्य, शीर्षक संख्या आदि अभी सामान्यीकृत ही दिखते हैं. राज्य विशेष हेतु आर्थिक निर्णय नीतियाँ भी आशानुरूप स्पष्ट नहीं हैं. लगता है इस विलंबित लय-ताल के वास्तविक प्रभाव बजट के क्रियान्वयन व केंद्र-राज्य समन्वय से ही तय होंगे.
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उत्तराखंड सरकार ने बजट में केंद्र से राज्य विशेष भौगोलिक जोखिम, आपदा पुर्न निर्माण व पहाड़ मुख्य आर्थिक पैकेज की मांग की थी पर ऐसा विशेष वित्तीय पैकेज स्पष्ट रूप से नहीं मिला. बजट में लघु उद्योगों व एमएसएमई की आम घोषणा है पर उत्तराखंड विशेष स्थानीय कुटीर के लिए विशेष पैकेज गहराई से सम्मिलित नहीं दिखा. राज्य की पहाड़ी आंचलिकता व विनिर्माण की चुनौतियों को ध्यान में रख यह आस स्वाभाविक ही थी.
पर्यटन में पर्यावरण अनुकूल ट्रेकिंग ट्रेल्स मिले पर इनके वित्तीय पैकेज स्पष्ट नहीं. हवाई कनेक्टिविटी में उड़ान विस्तार व हवाई पट्टियों का विकास लक्षित पर सीमांत इलाकों में पूर्ण आपूर्ति व संसाधन लक्ष्य रह गए. रेल संयोजन व सम्बद्धता पर रिकॉर्ड आवंटन पर पुल, सड़क, हाइड्रोल संजीवनी योजना जैसी सम्बद्ध मदद स्पष्ट नहीं दिखती. स्वास्थ्य मामले में मेडिकल टूरिज्म वृद्धि पर जोर है पर स्वास्थ्य केंद्रों हेतु स्पष्ट बजट वृद्धि रह ही गई. ऐसे ही खेती में उच्च मूल्य खेती पर बल पर पहाड़ की खेती के जोखिम व विपणन के सुधार के पैकेज पर जोर नहीं दिखा. ऐसे ही कौशल व रोजगार बढ़ाना चाहा गया पर स्थानीय एमएसएमई -पहाड़ी उत्पाद के पैकेज खोजने बाकी है.
बजट में राज्य विशेष कुछ मांगे साफ तरीके से शामिल नहीं दिखतीं जैसे आपदा सहेजक कोष, जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों -खनिज का अति विदोहन जिसने खेत चौपट कर दिए व स्थानीय पारम्परिक शिल्प जो एक नया उछाल चाहता था. इनके प्रति तटस्थता रेखा वही पुरानी रह गयी. अब बारी राज्य सरकार की है जिसने बजट घोषणाओं को योजनाबद्ध, लक्ष्य संचालित कार्यशैली से लागू करने का कौशल दिखाना है और केंद्र की मंशा में निहित अवसरों का भरपूर दोहन करने की जिम्मेदारी का निर्वाह भी करना है.रहा लोक से जुड़ा जन उसका बड़ी घोषणाओं से पेट नहीं भरता बल्कि इस विश्वास की पुष्टि से वह संतुष्ट होता है कि सरकार ने मनोयोग से व्यय किया, काम बोल रहा, रोजगार का अवसर पाया, जीवन कुछ आसान हुआ. विषमताएं कुछ कम हुईं.
बजट 2026 में उत्तराखंड को वित्त व योजनाओं में उपेक्षित करने का भाव तो है ही नहीं और उसका ठोस कारण यह है कि उत्तराखंड शासन अब पहले की तुलना में केंद्रीय पूंजीगत सहायता का बेहतर उपयोग कर रही. यानी नल में पानी आ रहा अब देखना यह है कि यह सही खेत तक, लोगों की प्यास बुझाने तक कितना पहुंचाया जा रहा. व्यय भी हो, योजना भी बने पर स्थानीय रोजगार के लिए तरसना पड़े, पहाड़ आधारित उपक्रम संभव ही नहीं बने तभी सरदर्द पहाड़ी कपाल में थम जाता है. पहाड़ी सीढ़ीदार खेतोँ में बांजा पड़ा दिखता है और टाटा महेंद्रा लोगों को हमेशा की तरह मैदान की ओर बगाती है. गांव भूतिया कहलाते हैं.
अब स्थितियाँ बदली हैं. पहले केंद्र की दी रकम लौट जाती थी अब खर्च हो गयी के पुष्ट आंकड़े सामने हैं. अर्न्तसंरचना झटके से बदल रही. पर्यटक अपनी कमाई यहाँ खर्च कर रहा. अब तो कितने प्रकार की सम्बद्धता-संयोजन-जुड़ाव से आर्थिकी के प्राथमिक-द्वितीयक-तृतीयक क्षेत्र की डोर बंध रही जो भविष्य की संभावनाएं संजो रही. उत्तराखंड सीमांत के साथ आपदा संवेदनशील पर्यटन राज्य की मान्यता लिए है तो विशेष सहायता की सम्भावना बनती ही है.
उत्तराखंड आज उस रास्ते पर जाता दिख रहा जहां आगम प्राप्ति समस्या नहीं, अब नीति और दिशा निर्देशन आधारभूत हुआ है. बस इसके लोक में बसे जन को रोजगार का हिसाब, आंचलिक उद्योग का अधिकार और प्रगति के पथ पर बढ़ने के लिए पारदर्शिता का मंत्र पढ़ना, काम काज को जगाना है ताकि स्वयं स्फूर्ति से आगे परिपक्वता की डगर चल निकले.
(Uttarakhand in Union Budget)

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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