फोटो : हरेला सोसाइटी के फेसबुक पेज से साभार
हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में जब कोई आगंतुक किसी पुराने घर या मंदिर के सामने ठहरता है, तो सबसे पहले उसकी दृष्टि जिस तत्व पर टिकती है, वह है – नक्काशीदार लकड़ी का दरवाज़ा. यह दरवाज़ा केवल भीतर प्रवेश का साधन नहीं, बल्कि अतीत की ओर खुलने वाला एक सांस्कृतिक द्वार है. इन दरवाज़ों पर उकेरी गई आकृतियाँ, प्रतीक और अलंकरण उत्तराखंड की ऐतिहासिक चेतना, धार्मिक विश्वास और लोकसंस्कृति की गहरी परतों को उद्घाटित करते हैं.
उत्तराखंड की पारंपरिक वास्तुकला कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच विकसित हुई है. यहाँ पत्थर और लकड़ी का संतुलित प्रयोग न केवल पर्यावरण के अनुकूल था, बल्कि संरचनात्मक रूप से भी टिकाऊ सिद्ध हुआ. इस लोकवास्तुकला में दरवाज़ा एक विशिष्ट स्थान रखता है – वह सुरक्षा, उपयोगिता और आध्यात्मिकता का संगम है.
लोकमान्यता रही है कि दरवाज़ा केवल घर की सीमा नहीं, बल्कि बाहरी और आंतरिक संसार के बीच एक पवित्र रेखा है.इसलिए उस पर की गई नक्काशी केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अर्थवत्ता से भरपूर होती थी.
उत्तराखंड में लकड़ी की नक्काशी की परंपरा अत्यंत प्राचीन है. वैदिक और उत्तर-वैदिक काल में लकड़ी को पवित्र निर्माण सामग्री माना जाता था. हिमालयी क्षेत्र में इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि यह भूकंप-रोधी और स्थानीय जलवायु के अनुकूल थी.
कत्यूरी काल (7वीं–11वीं शताब्दी) में मंदिर वास्तुकला के विकास के साथ प्रवेश द्वारों पर धार्मिक प्रतीकों की नक्काशी प्रारंभ हुई. मंदिरों के गर्भगृह और सभामंडपों के दरवाज़ों पर देवी-देवताओं की आकृतियाँ उकेरी जाती थीं. यही परंपरा धीरे-धीरे आवासीय भवनों तक पहुँची, जहाँ दरवाज़े को घर की पवित्रता का रक्षक माना जाने लगा.
चंद शासकों के काल (13वीं–18वीं शताब्दी) में कुमाऊँ क्षेत्र में लकड़ी की नक्काशी अधिक सजावटी और कलात्मक हो गई. पुष्प, लताएँ, ज्यामितीय आकृतियाँ और लोककथाओं से प्रेरित दृश्य दरवाज़ों पर स्थान पाने लगे. वहीं गढ़वाल क्षेत्र में दरवाज़े अपेक्षाकृत सादे, परंतु मजबूत और प्रतीकात्मक रहे, जहाँ संरचनात्मक स्थायित्व को प्राथमिकता दी गई.गोरखा शासन और बाद में ब्रिटिश काल में भी यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. यद्यपि कुछ बाहरी डिज़ाइनों का प्रभाव दिखता है, फिर भी धार्मिक प्रतीकों और लोकविश्वासों की निरंतरता बनी रही.
पारंपरिक उत्तराखंडी दरवाज़े कई स्तरों पर अर्थ रचते हैं. धार्मिक दृष्टि से गणेश, लक्ष्मी, स्वस्तिक और कमल जैसे प्रतीकों का अंकन शुभता और संरक्षण का प्रतीक था. सामाजिक स्तर पर दरवाज़े की भव्यता परिवार की प्रतिष्ठा और आर्थिक स्थिति को दर्शाती थी. वहीं व्यावहारिक रूप से मोटी चौखट और मजबूत लकड़ी बाहरी खतरों से सुरक्षा प्रदान करती थी.इन सबके अतिरिक्त, नक्काशीदार दरवाज़े लोककथाओं और ऐतिहासिक स्मृतियों को दृश्य रूप में सुरक्षित रखने का माध्यम भी थे, एक प्रकार का लोक अभिलेख.
देवदार और तून जैसी टिकाऊ लकड़ियाँ इन दरवाज़ों के निर्माण में प्रमुख रूप से प्रयुक्त होती थीं. स्थानीय कारीगर पारंपरिक औज़ारों से नक्काशी करते थे, और यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा से आगे बढ़ता था. कमल उर्वरता और जीवन का प्रतीक है, बेल-बूटे प्रकृति से मानव के संबंध को दर्शाते हैं, जबकि पशु-पक्षी लोकविश्वासों और दैनिक जीवन से जुड़े संकेत देते हैं.
कुमाऊँ शैली जहाँ अधिक अलंकृत और दृश्यात्मक है, वहीं गढ़वाल शैली में सादगी, धार्मिक प्रतीकात्मकता और मजबूती का स्पष्ट आग्रह दिखाई देता है. यह भिन्नता क्षेत्रीय इतिहास और सामाजिक संरचना को भी प्रतिबिंबित करती है.
आज आधुनिक निर्माण सामग्री और बदलती जीवनशैली के कारण पारंपरिक नक्काशीदार दरवाज़े धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं. इनके साथ केवल एक कला नहीं, बल्कि पूरा सांस्कृतिक इतिहास लुप्त होने का खतरा है. यदि इन दरवाज़ों का संरक्षण, दस्तावेज़ीकरण और पुनर्प्रयोग नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ इस समृद्ध लोकवास्तुकला को केवल पुस्तकों और तस्वीरों में ही देख पाएँगी.
उत्तराखंड के नक्काशीदार लकड़ी के दरवाज़े इतिहास, आस्था और लोकसंस्कृति का जीवंत संगम हैं. वे हमें बताते हैं कि कैसे एक साधारण वास्तु-तत्व भी समय के साथ सांस्कृतिक दस्तावेज़ बन जाता है. इन्हें संरक्षित करना केवल कला-संरक्षण नहीं, बल्कि हिमालयी सभ्यता की स्मृति को जीवित रखना है.
मूल रूप से टिहरी गढ़वाल की रहने वाली निधि सजवान डेनियलसन डिग्री कॉलेज के इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं. निधि वर्तमान में छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश में रहती हैं.
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