जिंदे को लात, मरे को भात: एक उत्तराखंडी लोककथा
एक गांव में एक बहुत बूढ़ा अपने छोटे लड़के, बहू और अपनी औरत के साथ रहता था. उसके दो लड़के और भी थे, पर वे नौकरी की तलाश में बाहर चले गए थे और वहीं बस गये थे. बूढा अपने समय में बहुत प्रतिष्ठित... Read more
कुमाऊंनी लोकगीतों में सामाजिक चित्रण
लोकगीतों से हमारा तात्पर्य लोक साहित्य के उन रूपों से है, जो प्रायः अलिखित रहकर जन-साधारण द्वारा निर्मित होते हुए एवं परंपरा से देश काल की विविध परिस्थितियों का चित्रण करते हुए उनके बीच प्रच... Read more
खड़ महराज और शिवजी की कथा
गीता गैरोला लेकर आई हैं एक और गढ़वाली लोक कथा. लम्बी अनुपस्थिति फागुन बीत गया. सूरज की गर्मी ने अपनी तपस को बढ़ा दिया. जाड़ों के ठंडक की सीलन भाप बनकर आसमान की तरफ दौड़ लगाने लगी. सारी प्रकृति ख... Read more
यमराज और बूढ़ी माँ की लोककथा
शाम सामने वाले गदेरों को सुरमई बना रही थी. स्वीली घाम (शाम को ढलते सूरज की हल्की पीली रोशनी) दीवा के डाण्डे को फलांगता चौखम्भा की सबसे ऊंची चोटी को ललाई से बाँधने लगा. दादी लोग गाय, बाछी ,बै... Read more
लोक कथा : ब्यौला मर जायेगा पर गांठा नहीं टूटेगा
छोटी दादी रंगत में थी बोली आओ रै छोरों आज तुम्हे ऐसे बामण की कथा लगाउंगी जो न्यूत के बुलाया गया अर बिचारा पीट के पठाया गया. लो जी दादा जी कहते हैं बिन मांगे मोती मिले अर मांगे मिले न भीक. हम... Read more
कुमाऊंनी लोकगीतों में सामाजिक चित्रण भाग – 2
पिछली कड़ी विवाहोपरान्त पुत्री की विदाई सर्वत्र करूण होती है. वह मां की दुलारी है, जिसने उसे पालपोस कर बड़ा किया, उपयुक्त गृहिणी के सभी गुण लाने का प्रयास किया है. किन्तु आज वह वृ़द्धा भी अपने... Read more
कुमाऊंनी लोकगीतों में सामाजिक चित्रण भाग 1
लोकगीतों से हमारा तात्पर्य लोक साहित्य के उन रूपों से है, जो प्रायः अलिखित रहकर जन-साधारण द्वारा निर्मित होते हुए एवं परंपरा से देश काल की विविध परिस्थितियों का चित्रण करते हुए उनके बीच प्रच... Read more
सोने के बालों वाली सूना और उसके बीरा की कथा
बर्फ पड़ने के बाद की सुरसुराहट अब कम होने लगी थी. डाँडी-काँठी में जमा ह्यूं सर्दीले घाम के मद्धिम ताप से धीरे-धीरे पिघलने लगा. झड़े पत्तों की मार से भूरे नंगे पेड़ों की टहनियों में रस बहने लगा.... Read more
चालाक गीदड़ और शिबजी की कथा
जिन दिनों खेतों में हल लगाने का काम होता घर के सब बड़े लोग बच्चों की तरफ ध्यान ही नहीं देते. दादाजी, दादी, माँ, चाचियाँ, ननि दादी, ठुली दादी सब कहते आज-कल सब बच्चे चुप सो जाओ. सब थके हैं. जब... Read more
Popular Posts
- पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल
- घी संक्रान्ति का लोक विज्ञान
- दुनिया ने अपनाया और अपनों ने भुलाया : जन्मदिन विशेष
- गलगोटिया वाला कॉपी नहीं, असली नवाचार है अल्मोड़ा के रवि टम्टा का ड्रोन
- लोक गायिकाओं का समृद्ध इतिहास रहा है पहाड़ो में
- कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से जनआंदोलन तक
- उत्तराखण्ड में वन्य-जीवों का आतंक
- उनके बारे में जो सिर्फ नाम नहीं जीवन हैं
- उत्तराखण्ड के आयुष के हाथ में दिल्ली की रणजी टीम की कमान
- उत्तराखण्ड की उन्नति शर्मा ने देश का गौरव बढ़ाया, कॉमनवेल्थ -26 में जीता कांस्य
- बचपन से छीन ली गई बचपन की तस्वीर
- खसों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन
- वह माला के गेट पर सुबह-शाम पहरा देते मिलता
- पहाड़ो में भूस्खलन
- जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई
- हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी
- हैप्पी बर्थडे कॉर्बेट साहब
- 28 साल के युवा से जब टिहरी रियासत डर गई
- दुनिया में शांतिपूर्ण आंदोलनों का संक्षिप्त इतिहास
- गांधीजी ने दुनिया के सबसे बड़े अहिंसक आंदोलन का संचालन कैसे किया?
- भारत में आँसू गैस के गोले सबसे पहले अंग्रेज़ लाए थे
- कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल
- हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम
- हरेले के रंग में पहाड़ : फोटो निबन्ध
- अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत
