शिक्षा की बदहाली के प्रतीक बने, हर मौहल्ले में कुकुरमुत्ते सरीखे उगे प्ले स्कूल के आगे पीछे गुजरते आपने नर्सरी राइम खूब सुनी होगी. बा बा ब्लैक सीप की जो चरस मौहल्ले दर मौहल्ले बोई गयी है उसन... Read more
नए साल पर दूरदर्शन के जमाने की मीठी यादें
नए साल की ईव पर (न्यू इयर्स ईव जैसे फ्रेज़ ने भी जीवन में उन प्रोग्रामों की वजह से ही घुसपैठ की, वर्ना हैप्पी न्यू ईयर जैसे तीन ऊर्जाहीन शब्दों की शरण में ही जाना पड़ता था) दूरदर्शन का सबसे... Read more
फिर आयेगा धुन्नी
मुंशी प्रेमचंद की क्लासिक कहानी ‘ईदगाह’ की शुरुआत, अगर मुझे ठीक से याद है, तो कुछ इस तरह से है- “रमज़ान के पूरे तीस रोज़ बाद ईद आयी…”. क़िस्सागोई वाले सीधे सपाट... Read more
बचपन की यादों का पिटारा घुघुतिया त्यार
[उत्तराखंड (Uttarakhand) में मनाया जाने वाला घुघुतिया त्यार (Ghughutiya)अब वैसे उत्साह से नहीं मनाया जाता. एक समय बच्चों के सबसे प्रिय त्यौहारों में शामिल घुघुतिया का आकर्षण आधुनिकता के साम... Read more
हजरत सैंया बाबा
मुझे बचपन की याद है कि मुंशी मत्लुबुर्रहमान खां नगरपालिका, अल्मोड़ा के खोड़ के मुंशी थे. वे नगर-पालिका परिषद् की बिल्डिंग के बांयी ओर गाड़ी सड़क से लगी हुई बोर्ड की बिल्डिंग में अपना दफ्तर का का... Read more
बाली उमर का सिनेमा प्रेम और सच बोलने का कीड़ा
लड़के, पढ़ने के लिए देहात से शहर जाते थे. आसपास के इलाकों में अव्वल तो कोई इंटर कॉलेज नहीं था. अगर था भी, तो तब तक उसमें साइंस नहीं खुला था.लड़कों की मजबूरी थी, रोज का तीस किलोमीटर आना-जाना.... Read more
1977 की कॉमिक्स के विज्ञापन
हमारे ज़माने में तो ऐसा होता था… वाक्य भारत का ध्येय वाक्य घोषित किये जाने की क्षमता रखता है. आदमी 25 पार का हुआ नहीं उसका ज़माना बन जाता है. जैसे इन दिनों भारत में नाइंटीज का नोस्टाल्जि... Read more
हम जाने भी कहां देंगे तुमको गिर्दा
उस साल यानी 2010 में अचानक एक याद बन गया गिर्दा. इतवार, 22 अगस्त का दिन था. बारह बजे के आसपास मोबाइल फोन कुनमुनाया. देखा, लखनऊ से नवीन का संक्षिप्त एस एम एस था- ‘हमारे गिर्दा चल दिए इस दुनिय... Read more
दिल ढूंढता है फिर वही नैनीताल एक्सप्रेस
सन 2016 के शुरुआती महीनों में लखनऊ से छोटी लाइन की ‘नैनीताल एक्सप्रेस’ ट्रेन पूरी तरह बंद होने की खबर पढ़कर यादों का पिटारा खुला तो खुलता ही चला गया था. बचपन के दिन. हर साल 20 मई को हमें स्कू... Read more
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मैं मुरली मनोहर मंजुल बोल रहा हूँ
रेडियो में बैठे कई लोगों का मानना है कि क्रिकेट की लोकप्रियता के हमारे यहाँ सर चढ कर बोलने का कारण असल में रेडियो पर भाषाई और खासकर हिंदी की कमेंटरी ही है.इस पर किसी तरह की चर्चा यहाँ नहीं क... Read more