पहाड़ और मेरा बचपन – 10 (पिछली क़िस्त : हां मैंने चलाए साइकल के लचक मारते, पुराने टायर और भरपूर मजा लूटा) (पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर के लोड होने की प्रत... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 9 (पिछली क़िस्त : कंचों के खेल ने साबित किया कि मैं कृष्ण जैसा अवतार था) (पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर के लोड होने की प्रतीक्षा करें.)... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 8 (पिछली क़िस्त : अमीर अंकलों की खैरात से जब दिल्ली में मैंने मौज उड़ाई ) (पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर के लोड होने की प्रतीक्षा करें.... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 7 दिल्ली की डीटीसी बसों में मैंने एक समय के बाद टिकट लेना बंद ही कर दिया. मां जब मुझे बस के किराए के लिए तीस पैसे देती, तो मैं मन ही मन सोचने लगता कि तीस पैसे का आज क्या... Read more
पहाड़ और मेरा बचपन – 3
पिछली क़िस्त पहाड़ और मेरा बचपन – 2 मां आस-पास की ऐसी औरतों को जानती थी, जिन्होंने खुद भी गाय पाली हुई थीं. ये सभी महिलाएं आपस में मिलकर घास का कोई पहाड़ खरीद लेतीं और फिर मिलकर घास काटने जात... Read more
पहाड़ी माँ के जीवन की संघर्षगाथा
पांच दशक पूर्व तक पहाड़ में नारी के कठिन और संघर्षपूर्ण जीवन गाथा की आज कल्पना भी नहीं की जा सकती. उन दिनों गांव की अधिकांश महिलाओं को सुबह बिना कुछ खाए अथवा मंडूवे की रोटी का एक आधा टुकड़ा, ब... Read more
टीचर्स डे स्पेशल : नकलची छात्र और दयालु मास्साब
तब यूपी सरकार का बहुचर्चित नक़ल अध्यादेश लागू नहीं हुआ था. हालाँकि जब यह लागू भी हुआ तो उस माहौल का कुछ नहीं बिगाड़ पाया जो उस वक़्त हुआ करता था. सरकारी स्कूलों में तब परीक्षाओं में नक़ल का ही स... Read more
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