काले कव्वा : एक दिन की बादशाहत
Posted By: Sudhir Kumaron:
मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले ‘घुघते’ आदि पकवान बनाकर दूसरी सुबह बच्चों के द्वारा कव्वों को खिलाये जाते हैं. उसके पीछे अनेक लोक विश्वास हैं. जिन्हें अपने मूल रूप से विकृत करके भुला दिया ग... Read more
काले कौआ : ले कौवा पुलेणी, मी कें दे भल-भल धुलेणी
Posted By: Kafal Treeon:
पूस की कुड़कुड़ा देने वाली ठंड, कितना ही ओढ़ बिछा लो, पंखी, लोई लिपटा लो कुड़कुड़ाट बनी रहती. नाक से भी पानी चूता रहता. नानतिनों की क्या कहें, ठुले जवान बुड़-बाड़ि स्वीटर, फ... Read more
Popular Posts
- कुमाऊं में रामलीला की परम्परा
- ‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…
- हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें
- ‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है
- धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’
- गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी
- देवदार या देव दारु
- कसारदेवी : जहां स्वर्ग के सबसे करीब होने का अहसास होता है
- दुर्गम पहाड़ों तक कैसे पहुंचे महाराष्ट्र-गुजरात के पर्व
- पिथौरागढ़ में स्विट्ज़रलैंड बनने की है पूरी क्षमता
- अलमोड़े में नंदादेवी मेले की ताज़ा तस्वीरें
- अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक
- सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन
- उत्तराखण्ड की महिलाएं : स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों का दस्तावेज
- कामिनी तुम कौन?
- पूर्वी नयार नदी की वो बाढ़
- कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा
- बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार
- आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”
- भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्
- उत्तराखण्ड के सरोवर
- दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध
- सिंधुजा की कविता : स्मृति यात्रा
- पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल
- घी संक्रान्ति का लोक विज्ञान
