हिंदी में डी.लिट. की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले भारतीय ‘डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल’
उत्तराखण्ड में साहित्य, ज्योतिष और दर्शन की परम्परा प्राचीन रही है. उत्तर वैदिक काल में इस अंचल में भारद्वाज आश्रम, कण्वाश्रम, बदरीकाश्रम और शुक्राश्रम जैसे सिद्धपीठों से वेद-वेदागों का पठन-... Read more
कुमाऊं की रामलीला पर ‘गिर्दा’ का एक महत्वपूर्ण लेख
कुमाऊॅं (उत्तराखण्ड) में प्रचलित रामलीला सम्भवतः संसार का एक मात्र ऐसा गीत नाट्य है जो ग्यारह दिनों तक लगातार क्रमशः चलता है और जिसमें कई-कई बार बाजार का पूरा एक हिस्सा-पूरा इलाका ही मंच बन... Read more
पुन्यों सी उजली देबुली और नरिया के जीवन की एक झलक
छिलुके की रोशनी में चौथर का कोना कोना खिल उठा था. कई महीनों बाद दो दिन पहले ही चौथर लिपा घिसा गया था. छिलुके की रोशनी में धान कूटते देबुली की चूड़ियों की खनक किसी साज पर सजी अंगुलियों की करत... Read more
भगवत गीता के श्लोकों का कुमाऊंनी अनुवाद
भगवत गीता के श्लोकों का यह अनुवाद चारुचन्द्र पांडे द्वारा किया गया है. काफल ट्री में यह अनुवाद पुरवासी पत्रिका के 14वें अंक से साभार लिया गया है. (Kumaoni Translation of Bhagavad Gita) भौते... Read more
कुमाऊंनी लोक साहित्य में नारी का विरह
सामान्य जनों या आशुकवियों द्वारा मौखिक परम्परा के रुप में अभिव्यक्त साहित्य लोक साहित्य कहलाया. परिवेश के अनुसार उसकी अभिव्यक्ति विरह और मिलन दोनों रुपों में हुई है. नारी यों तो सृष्टि की वह... Read more
केदार घाटी का गाँव ‘आश्रम’. यहीं परमेश्वरानन्द और उनकी सती-साध्वी पत्नी पार्वती रहती थी. सुबह-शाम अपने इष्टदेव की आराधना करते और दिनभर अपनी खेती-बाड़ी. परिवार में कोई तीसरा नहीं... Read more
हमारे एक कुमाउंनी मित्र ने कुछ समय पूर्व अपनी आंखों का आपरेशन कराया. उन्हें मोतियाबिंद हो गया था. मिलने पर जब बातचीत हुई तो उन्होंने आंखों में ‘बडू जाव’ शब्द का प्रयोग किया, मोतियाबिंद का नह... Read more
कुमाऊंनी लोकगीतों में सामाजिक चित्रण
लोकगीतों से हमारा तात्पर्य लोक साहित्य के उन रूपों से है, जो प्रायः अलिखित रहकर जन-साधारण द्वारा निर्मित होते हुए एवं परंपरा से देश काल की विविध परिस्थितियों का चित्रण करते हुए उनके बीच प्रच... Read more
एक फायर के तीन शिकार कुली, मुर्गी और ‘अल्मोड़ा अख़बार’ यह टिप्पणी गढ़वाल समाचार पत्र की है. गढ़वाल समाचार पत्र ने यह टिप्पणी तब की थी जब ब्रिटिश सरकार ने अल्मोड़ा अखबार को बंद करवा दि... Read more
पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में लकड़ी के बर्तनों का उपयोग लगभग बंद हो गया है. कभी दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले लकड़ी के इन बर्तनों के नाम तक आज की पीढ़ी नहीं जानती होगी. लकड़ी के बने इन बर्... Read more
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