आदतों के बांस से बजेगी सफलता की बांसुरी
आदतें बड़ी कमाल की चीज हैं. अगर इंसान में सही आदतें आ गईं, तो वे उसे कामयाबियों के शिखर पर पहुंचा देती हैं. गलत आदतें उसे गुमनामियों के अतल में फेंक देती हैं. ऐसा नहीं कि आपको और मुझे यह बात... Read more
हर पल संतुलन का नाम है जिंदगी
जीवन हाथों में डंडा पकड़े रस्सी पर संतुलन बनाकर चल रहे नट जैसा है. जैसे रस्सी पर चलते रहने के लिए नट को कभी बाईं ओर, तो कभी दाईं ओर झुकना पड़ता है, वैसे ही जीवन की रस्सी पर संतुलन बनाकर आगे... Read more
खुद पर यकीन करोगे, तो कामयाबी कदम चूमेगी
सोचने से सब हो सकता है. कुछ भी. अगर हम पूरे विश्वास और भक्ति के साथ सड़क पर पड़े किसी लावारिस पत्थर की पूजा करें, तो उसमें भी ईश्वर उतरकर आ सकता है. सब कुछ हमारे सोचने और यकीन करने पर निर्भर... Read more
जिंदगी से बिना शर्त प्यार करो
किसी का भी आत्महत्या करना हमें बहुत दुखी कर जाता है, क्योंकि हम जानते हैं कि किसी ने कैसी भी स्थितियों में आत्महत्या की हो, उसके जीवन में कितना भी गहरा अंधेरा रहा हो, कैसी भी वजहें रही हों,... Read more
इस लम्हे से पहले जो हुआ सब भूल जा
यह बात ज्यादातर लोगों को बहुत नागवर लगेगी और बहुत क्रूर भी लेकिन हर पल बिना किसी दुख का, एक नया और बच्चों जैसे भोलेपन से भरा, आनंद और उत्साह से लबरेज जीवन जीने के लिए यह बहुत जरूरी है कि हम... Read more
जीवन में पारदर्शिता ले जाएगी तनावों से पार
छात्र जीवन में मेरा एक सहपाठी था, जिसके पिता किसान थे और शहरी मानदंडों के हिसाब से गरीब. वह सहपाठी गांव के स्कूल से बारहवीं करने के बाद कॉलेज में आया था और कॉलेज की आबोहवा से बहुत प्रभावित... Read more
सिकंदर की तृष्णा और दार्शनिक फकीर डायोजनीज
सिकंदर यानी अलेक्जेंडर तृतीय के बारे में तो हम सबने सुना ही है कि वह मेसीडोनिया यानी मकदूनिया, जो कि आज के जमाने का ग्रीस है, का सबसे ताकतवर सम्राट था. वह उस वक्त की जानकारी के मुताबिक जितनी... Read more
दुखी रहना कहीं आपकी आदत तो नहीं बन गया है
थोड़ा-सा अटपटा तो लग सकता है, पर सच यही है कि हम अपनी मर्जी से ही दुखी होते हैं. कोई हमें दुखी होने को कहता नहीं. और असल में दुखी होने की कोई वजह भी नहीं होती, क्योंकि दुख तो आपके सोचन... Read more
सुन्दर चन्द ठाकुर के कॉलम पहाड़ और मेरा जीवन – अंतिम क़िस्त (पिछली क़िस्त: मैं बना चौबीस रोटियों का डिनर करने वाला भिंडी पहलवान) हमारे समय में बीएससी दो साल का होता था. 1989 में जिस वर्ष मैं... Read more
पहाड़ और मेरा जीवन – 66 (पिछली क़िस्त: और यूं एक-एक कर बुराइयां मुझे बाहुपाश में लेती गईं जिम शब्द का इतना अधिक इस्तेमाल होता है कि अब हिंदी का ही शब्द लगता है. इस्तेमाल इसलिए होता है क्योंक... Read more
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