कला साहित्य

बसंत हमारी आत्मा का गीत और मन के सुरों की वीणा है

जनवरी का महीना था ज़मीन से उठता कुहासा मेरे घर के आसपास विस्तीर्ण फैले हुए गन्ने के खेतों पर एक वितान सा बुनकर मेरे भीतर न जाने कहीं सहमे हुए बच्चे की तरह बुझा-बुझा सा बैठ जाया करता था. (Spring is the Song of our Soul)

लाख चेष्टा की मैंने मेरे भीतर बैठ गये डरे सहमे से उस कुहासे रूपी बच्चे को माघ की बहुरूपिया धूप में धुपियाने की किंतु वह ठगनी धूप मेरे भीतर बैठे उदास बच्चे की अन्यमनस्कता को कभी पढ़ ही नहीं पायी, न ही सहला पायी हौले से उसकी बेजान पड़ी दिल की झंकारों को किसी संगीत के सुर में ढालकर.

मेरे घर के हाते में एक विचित्र सा पेड़ लगा है  बारीक सी बुझी-बुझी सी पत्तियों वाला. माघ के भीषण कोहरे में न चाहते हुए भी उसकी मलिनता, काहिली पत्तियों से छनकर मेरे संपूर्ण अस्तित्व में घर कर जाती है मन आया उस गाछ को उखाड़ कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दूं किंतु प्रकृति से ही अथाह स्नेह रखने वाली मैं मुझसे यह नहीं हो पाया, छोड़ दिया उसे मैंने अपने जीवन के प्रवाह में स्वच्छंद बहने हेतु. किसी ने बताया यह तोर की दाल का पेड़ है.

जनवरी चली गयी है हौले से फरवरी  ने बसंत का आगाज़ किया है, किसलयों ने मुस्कराकर सुना है भौंरों का बेचैन राग हौले से, पंखुड़ियां फैलाकर वह पुष्प में कब परिणत हो जायेंगी यह उन्हें भी अहसास नहीं होगा क्योंकि बसंत की बयार चहुं ओर है चर-अचर लालायित हैं प्रेम में पगा होने के लिए.

मेरे खेत की मेड़ों पर उमग आये  हैं भाकले के पेड़, पीली सरसों,मटर की हरहराती बेलें, फ्यूली के फूलों से रहगुज़र मेरे दृग भी प्रकृति प्रदत्त बसंत पर निसार होने लगे हैं.

वह तोर की दाल का पेड़ याद है न आपको जनवरी के महीने का उदासी भरा पेड़? मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं है बसंत का यौवन उस पर टूट कर बरस पड़ा है इतना ख़ूबसूरत जैसे कि सेहरा पहने दूल्हा धरा से परिणय सूत्र में बंधने जा रहा हो.

बसंत उस तोर के पेड़ पर आयेगा या नहीं अनभिज्ञ थी मैं इस बात से किंतु आज उस गाछ का अद्भुत सौंदर्य मुझे भीतर तक आह्लादित कर रहा है कहीं ऐसा तो नहीं बाहर तो सूरज की छटा थी मेरे भीतर ही कहीं अंधकार था?

ऋतुएं तो क्रमबद्ध आयेंगी जायेंगी क्योंकि यह प्रकृति और ईश्वर द्वारा संयोजित व्यवस्था है हमारे लिए.

किंतु अपने हिस्से का बसंत तो हमें हर ऋतु में जुटाना होगा न?

बसंत की ही प्रतीक्षा क्यों ? स्वयं प्राप्य व जुटाया हुआ बसंत क्यो नहीं?

इसे भी पढ़ें : उत्तराखण्ड में टोपी पहनने का चलन कब शुरू हुआ?

जुटानी चाहिए हमें सौंदर्य बोध की कला बदरंग और हाशिये पर पड़ी वस्तुओं में, विकसित करनी चाहिए सृजनशीलता ताकि बसंत की सुगबुगाहट से पहले ही हम अपने एकाकीपन और एकांतवास में सहेज लें फूलों के अनगिनत रंग और तितलियों को तस्वीरों में, जैसे कि सर्दी की झड़ी से पहले घर में आग तापने के लिए लकड़ियां एकत्र की जाती हैं.

हुआ यूं कि बसंत कभी लकदक कर उमड़ा ही नहीं मेरी तरफ़, स्वयं को ही ढाल लिया मैंने बाहर ओसारे में एक दूसरे पर ढलते, पछाड़ खाते गुलाब, पिटूनियां गजीनियां, डेन्थस, डाग फ्लावर के आगोश में.

स्वयं व्यवस्था जुटाई मैंने अपने हिस्से के बसंत को अपने क्रोड में बिठाने हेतु ऋतुओं की महत्ता से विरत होकर.

किंतु यह भी सत्य है कि पहाड़ों पर फ्यूली, बुरांस ,मैदान में आडुओं और आम पर उतर आयी मंजरी, गेहूं की बालियों के परस्पर आलिंगन का सुर, गमकते गुलाबों की मुस्कराहट के रूप में बसंत की रंग-बिरंगी चादर हमारी आत्मा का गीत हैं. प्रकृति में बसंत की हनक है तो हमारे ह्रदय में भी उल्लास और स्पंदन की आहट है.

क्योंकि बाह्य सकारात्मक आवरण का स्वरूप ही हमारे अभ्यांतर प्रसन्नचित चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं अतः बसंत का आगाज़ ऐसे ही होना चाहिए हम सभी के हृदय स्थलों में जैसे मायका छोड़कर पहली बार ससुराल की दहलीज़ पर कदम रखती नयी नवेली दुल्हन का स्वागत किया जाता है.

देहरादून की रहने वाली सुनीता भट्ट पैन्यूली रचनाकार हैं. उनकी कविताएं, कहानियाँ और यात्रा वृत्तान्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

इसे भी पढ़ें : कण्वाश्रम : जहां राजा दुष्यंत ने विश्वामित्र व मेनका की कन्या शकुंतला को देखा

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

वह माला के गेट पर सुबह-शाम पहरा देते मिलता

माला नाम था उसका. छरहरी काया, बला की ख़ूबसूरत. लेडीज साइकिल से जब कॉलेज आती,…

20 hours ago

पहाड़ो में भूस्खलन

उत्तराखण्ड का अधिकांश भूभाग हिमालय की पर्वतीय श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ तीव्र ढाल, गहरी नदी घाटियाँ, युवा…

3 days ago

जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई

पनार बुग्याल के ऊपरी छोर वाले रास्ते पर अब हम चल रहे हैं. पनार चोटी…

3 days ago

हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी

पिछली कड़ी : कुमाऊं का सबसे बड़ा सामाजिक समूह “खस” रहा : आर. डी. सनवाल सन 1928 में अल्मोड़ा…

3 days ago

हैप्पी बर्थडे कॉर्बेट साहब

जिम कॉर्बेट उन चुनिंदा विदेशी मूल के भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने भारत में…

6 days ago

28 साल के युवा से जब टिहरी रियासत डर गई

रात का वक्त था. जुलाई की बारिश पहाड़ों को भिगो रही थी, और भिलंगना नदी हमेशा…

6 days ago