Featured

आजादी के 70 बरस बाद चम्पावत के पुल्ला गांव में पानी आ ही गया

उत्तराखण्ड के सीमांत जिले चम्पावत से 28 किमी दूर और नेपाल की सीमा से लगे हुए गुमदेश क्षेत्र में एक खूबसूरत कस्बा है पुलहिंडोला संक्षेप में इसे पुल्ला नाम से जाना जाता है. पुलहिंडोला की आबादी बहुत ज्यादा नहीं है, बमुश्किल 50-60 परिवार रहते होंगे. यहां की सबसे बड़ी समस्या हल हो गई है. पुल्ला में अब पानी आ गया है. आजादी के 70 बरस बाद अब जाकर यहां पानी आ सका है. लोगों की खुशी देखते ही बनती है. Pulla Village Champawat

एक समय था जब पुल्ला नेपाल और सीमांत क्षेत्रों से होने वाले व्यापार का प्रमुख केंद्र था. आस-पास के क्षेत्रों के लिए भी पुल्ला का महत्व इसलिए भी बहुत था क्योंकि क्षेत्र में एकमात्र इंटरमीडिएट कालेज यहीं था, क्षेत्र का एक मात्र बैंक भारतीय स्टेट बैंक भी यहीं था जो नेपाल तक के पूर्व सैनिकों को पेंशन उपलब्ध करवाता था. सुनारों की दुकानें भी यहीं हुआ करतीं थीं. नेपाल तथा सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से पढ़ने आये विद्यार्थियों के रहने से, 10 बेड का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र , प्राइमरी स्कूल, सरस्वती शिशु मंदिर, दूरभाष केंद्र, सहकारी बैंक व अन्य छोटी बड़ी दुकानों के चलते कस्बे में रौनक बनी रहती थी.

पुल्ला में पानी के स्रोत वैसे तो कस्बे के चारों तरफ थे, लेकिन सभी कम से कम 2 किमी की दूरी पर थे. 2 किमी दूर जाने पर आपको अपना नम्बर लगाना पड़ता था तब पानी लेकर चढ़ाई में आ सकते थे. उन स्रोतों में जलस्तर बेहद कम था और कुछ का जल अप्रैल आते आते सूख जाता था.

पुल्ला में रहने वाले हर परिवार के हर आयु वर्ग के हर सदस्य के लिये यह जरूरी था कि वह जो भी काम या पेशे में हो लेकिन शाम तक पानी भरकर जरूर लाये. पानी लाने की यह जद्दोजहद हर मौसम में प्रातः 4 बजे शुरू हो जाती और रात दस बजे तक चलती रहती थी.

पानी लाने की इस जद्दोजहद के सबसे ज्यादा पीड़ित 2 प्रकार के लोग थे, एक वो जिनके घरों में कोई कार्यक्रम होना है, दूसरे बोर्ड परीक्षा देने आये विद्यार्थी. टैंकर या दूसरी जगहों से जीप से पानी ढो कर काम चलाया जाता था.

लगभग 30 वर्षों तक निकटवर्ती गाँव टुनकांडे (बिल्दे) निवासी देवीदत्त ने दूर गधेरों से पानी ढोकर न केवल अपना जीवनयापन किया बल्कि लोगों के घरेलू कार्यक्रमों की जीवनरेखा भी बने रहे.

पानी के लिये इस तरह के जीवन संघर्ष से बचने के लिए बाद में सड़क मार्ग के पक्के बन जाने और यातायात के साधनों के उपलब्ध हो जाने से पुल्ला के सरकारी कर्मियों और सुविधा सम्पन्न लोगों ने लोहाघाट से आवागमन शुरू कर दिया. एक अध्यापक श्री के.एन. भट्ट तो जल संघर्ष से बचने के लिये हर हाल में प्रत्येक शनिवार शाम को पिथौरागढ़ चले जाते थे और सोमवार सुबह आते थे.

यूँ तो पुल्ला की पेयजल समस्या को दूर करने के लिये अलग अलग समय पर अलग अलग लोगों, संस्थाओं, संगठनों, और सरकारों ने अपने अपने स्तर पर स्थाई और अस्थायी प्रयास किये. 90 के दशक के प्रारम्भ में गैर सरकारी संस्था एक्सपेरिमेंट्स फ़ॉर रूरल एडवंसमेंट्स (ERA) ने काफी प्रयास किये लेकिन वित्तीय समस्याओं के चलते ERA भी कोई समाधान नहीं निकाल पाई. कस्बे में सन 2002 के जनवरी में 3 मार्क-2 हैंडपम्पों के लग जाने से पानी लाने जाने की दूरी तो निश्चित तौर पर बहुत कम हो गई लेकिन श्रमसाध्यता बनी रही. इसके साथ ही हैंडपम्पों का अनुरक्षण एक चुनौती बना रहा.

सन 2012 में जीतकर आये विधायक पूरन सिंह फर्त्याल ने पुल्ला की पेयजल समस्या को दूर करने के लिये न केवल निजी दिलचस्पी दिखाई बल्कि समस्या को स्थाई तौर पर समाप्त करने की संकल्पशक्ति भी दिखाई. स्थानीय विधायक के प्रयासों से अब पेयजल समस्या स्थाई तौर पर दूर हो गई.

अब न तो नेपाल से ही व्यापार रहा और बाकी जगह भी स्कूलों, बैंकों, दुकानों के खुल जाने और दूरस्थ गाँवों तक सड़कों के पहुँच जाने से रौनक बहुत कम हो गई है. कुल मिलाकर पुल्ला विकसित नहीं हो सका लेकिन अब पानी आ जाने से एक उम्मीद जगी है कि अब पुल्ला अपने अस्तित्व को बचाने में सफल होगा. Pulla Village Champawat

-पवन उप्रेती

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

2 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

2 weeks ago