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हमारी राजनीति के असली सरोकार आसानी से मिलने वाली सत्ता की तिकड़में हैं

अनिल यादव

वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव बीबीसी के ऑनलाइन हिन्दी संस्करण में नियमित लिखते हैं. अनिल भारत में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले स्तंभकारों में से एक हैं. यात्रा से संबंधित अनिल की पुस्तक ‘वह भी कोई देश है महराज’ एक कल्ट यात्रा वृतांत हैं. अनिल की तीन अन्य पुस्तकें भी हैं.

बच्चों के बीच पॉपुलर कार्टून सीरीज ‘टॉम एंड जेरी’ में अक्सर ऐसा होता है कि घात लगाए, सदा के दुश्मन बिल्ली और चूहा एक दूसरे की परछाईयों से डरते हैं, खुद के भय को गच्चा देने के लिए एक दूसरे की नकल करने लगते हैं, इसी भ्रमित मनःस्थिति में धोखे से आपस में टकराते हैं और जिधर रस्ता मिले पतली गली से निकल लेते हैं. इस हास्यजनक स्थिति में एक एपिसोड खत्म होता है. इन दिनों सत्ता और विपक्ष के कार्टून कैरेक्टर उर्फ भारतीय लोकतंत्र के नेतागण इसी तरह की पैंतरेबाजी कर रहे हैं. जहां उन्हें टकराना है, वहां लाखों पोलिंग बूथ होंगे. देश बचाने के नाटकीय हाहाकार के बीच 2019 का आम चुनाव हो रहा होगा.

 

इस उलटबांसी की और क्या व्याख्या हो सकती है कि नाथूराम गोडसे को पूजने वाली पार्टी की सरकार, उसकी गोली से मारे गए महात्मा गांधी को 150 वीं जयंती के बहाने एक साल तक अहिंसा, ग्राम स्वराज्य, कौमी एकता, अछूतोद्धार वगैरह का कपटजाप करते हुए एक साल तक दुलराएगी. मॉब लिंचिंग के जमाने में कायरता समझे जाने वाले ‘नरम हिंदुत्व’ के व्यावहारिक पैरोकार अटल बिहारी बाजपेयी की फोटो और राख की फोटोकापियों से भरे लोटों को गद्गद् भाव से देश भर में घुमाया जा रहा है. प्रधानमंत्री मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक-हलाला जैसी बुराईयों से निजात दिलाने और लोकतंत्र की हिफाजत के लिए चिंतित हैं.

 

दूसरी तरफ विपक्ष, मोदी और आरएसएस को गोधरा के बाद गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार की जिम्मेदारी से बरी कर क्लीन चिट दे रहा है, पंजाब में कांग्रेस की सरकार ईशनिंदा करने वालों को दंडित करने का कानून ला रही है और सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में भगवान विष्णु का भव्य मंदिर बनाने के मंसूबे जाहिर किए जा रहे हैं. इस नजारे के बीच दलितों की नेता मायावती की नजर विपक्ष के लगभग तय गठबंधन में ज्यादा से ज्यादा सीटें हथियाने पर लगी है. अगर बात नहीं बनती तो उन्हें शायद कुछ दिन का प्रधानमंत्री बनने के लिए एक बार फिर भाजपा से हाथ मिला लेने में कोई एतराज नहीं होगा.

 

1984 में सिखों के नरसंहार की घटना के लिए, इक्कीस साल के असमंजस के बाद माफी मांगने वाली कांग्रेस के नेता राहुल गांधी दुनिया को बता रहे हैं कि अजी! उस घटना में कांग्रेस का हाथ नहीं था. अगर इंदिरा गांधी नामक बड़ा पेड़ गिरने के बाद धरती हिलाने में जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार और कमलनाथ का हाथ नहीं था तो गोधरा की प्रतिक्रिया में गुजरात में मुसलमानों के कत्लेआम में नरेंद्र मोदी का हाथ कैसे हो सकता है. वह कांड भी कानून की अंधी आंखों से महफूज किन्हीं रहस्यमय शक्तियों ने किया होगा, आगे भी करती रहेंगी.

 

पंजाब में कांग्रेस की सरकार पहले से खंचिया भर कानूनों के होते हुए भी गीता, कुरान, गुरूग्रंथ साहिब और बाइबिल की रक्षा के लिए ईशनिंदा का नया कानून ला रही है. मकसद सिर्फ यह जताना है कि कांग्रेस भाजपा और अकाली दल से बड़ी धर्मरक्षक पार्टी है.

 

यूपी के समाजवादी अखिलेश यादव कंबोडिया के अंकोरवाट की आश्चर्यजनक वास्तुकला पर मुग्ध नहीं हैं. वे जताना चाहते हैं कि भाजपा राममंदिर का सत्ता के लिए सिर्फ इस्तेमाल करती है, हम सत्ता में आएंगे तो चंबल के बीहड़ में सचमुच बनवा देंगे. उन्होंने हिंदुत्व के क्षीरसागर में लेटकर अपनी समझ से बहुत महीन राजनीति खेली है, भगवान विष्णु ‘टू इन वन’ हैं, राम और कृष्ण दोनों उन्हीं के अवतार हैं, राम मंदिर के लिए तड़पते भाजपा समर्थक तो साथ आएंगे ही यदुवंशी कृष्ण को अपना पूर्वज मानने वाला, विरासत में मिला यादवी वोट बैंक भी अखिल भारतीय स्तर पर फूलेगा फलेगा.

 

इस विपक्ष को मॉब लिंचिंग, गौरक्षा की आड़ में मुसलमानों की हत्याओं, नकली राष्ट्रवाद (जनता को हत्यारी भीड़ में बदलने के चलन), लोकतांत्रिक संस्थाओं की बर्बादी, विराट आर्थिक घपलों, बेराजगारी के मजाक और संविधान की हिफाजत के लिए लड़ना था लेकिन वह भाजपा से डरकर हिंदुत्व की बहती गंगा में गोता मारने कूद पड़ा है. वह वही सुख हासिल करना चाहता है जो भाजपा तीन तलाक खत्म करने की प्रक्रिया में पा रही है. मुसलमानों, देखो हमने तुम्हारे पवित्र समझे जाने वाले धार्मिक कानून में सुराख करके तुम्हारी अय्याशी पर रोक लगा दी और औरतों के कल्याण का यश बोनस में अर्जित किया. यहां खुद को बड़ा हिंदू साबित कर भाजपा की प्राचीन धार्मिक नौटंकी के ऊबे हुए दर्शकों को अपने तंबू में बुलाने की बिसात बिछायी जाने लगी है. देश में चलता विध्वंसक धार्मिक गृहयुद्ध विपक्ष को चिंतित नहीं करता, युवाओं को बर्बर और जंगली बनाया जाना भी चिंता की बात नहीं क्योंकि असली सरोकार, आसानी से मिलने वाली सत्ता की तिकड़में है.

 

जो भी राजनीति में गहरे जाता है एक दिन खतरनाक नास्तिक हो जाता है. वह जान जाता है कि कैसे धर्म और ईश्वर का इस्तेमाल लोगों की मति फेरने और प्रतिद्वंदी से कुर्सी छीनने के लिए किया जाता है. इस प्रक्रिया में आम लोगों की कुछ हजार लाशें गिरती हैं तो गिरें क्योंकि वह धर्म की राजनीति का बाईप्रोडक्ट है. ऐसा करने में न पाप लगता है न ईश्वर किसी को दंडित करता है. इस अर्थ में मोदी, राहुल, अखिलेश, मायावती, ममता समेत सभी नेता नास्तिक हैं.

(मीडिया विजिल से साभार)

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