डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया की पुस्तक, “द कुमाऊं हिमालया : आस्पेक्ट्स ऑफ हिस्ट्री, कल्चर एंड इकोनॉमी” कुमाऊं-गढ़वाल क्षेत्र पर लिखे गए निबंधों का संग्रह है. पुस्तक की रुपरेखा में कुमाऊं की प्राचीन से मध्य कालीन सत्ता संरचना, कत्यूरी एवम चंद राजवंश व गोरखा राज तथा 1815 में ब्रिटिश आगमन की पृष्ठभूमि है. सबसे पहले डॉ टोलिया यह स्पष्ट कर देते हैंकि कुमाऊं का इतिहास लगातार राजनीतिक विखंडन और पुनर्गठन का इतिहास है. गोर्खाओं के साथ युद्ध के बाद ब्रिटिश सत्ता ने बिल्कुल नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया. अब कुमाऊं औपनिवेशिक शासन का नरम राज्य प्रयोग या ‘सॉफ्ट स्टेट एक्सपेरिमेंट’ बना. इसी के कारण कुमाऊं में ब्रिटिश शासन लचीला और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बना रहा. यहां कानून कम व प्रशासनिक विवेक अधिक था. ऐसे में ‘नॉन-रेगुलेशन प्रान्त’ की अवधारणा बनी व कमिश्नर प्रणाली लागू की गई.
पहाड़ की भूमि व्यवस्था और राजस्व ढांचे को स्पष्ट करते हुए डॉ टोलिया बताते हैं कि भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व की अवधारणा धीमे-धीमे विकसित हुई. ब्रिटिश अधिकारियों ने राजस्व आगम बढ़ाने के लिए नकद कर लगाए. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ा और यह बाजार से जुड़ने लगी. भूमि के बंदोबस्त और कर प्रणाली के साथ सामुदायिक बनाम निजी स्वामित्व से जीवन निर्वाह पद्धति मौद्रीकृत आर्थिकी में रूपांतरित होने लगी. साथ ही साथ वनों पर राज्य का नियंत्रण प्रभावी किया गया जिससे स्थानीय समुदायों के पारम्परिक अधिकार “हक-हकूक” सीमित कर दिए गए. वन नीति का उद्देश्य अब रेलवे व सैन्य उपयोग के लिए लकड़ी की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ इसकी समर्थ मांग को देखते हुए राजस्व को बढ़ाना रहा. वन अधिनियम व स्थानीय जनता के अधिकारों के हनन की नीति ने औपनिवेशिक उत्पीड़न व स्थानीय सम्पदा के विदोहन को लगातार बढ़ाया.
ब्रिटिश काल की नीतियों से सामाजिक आर्थिक ढांचा बदलने लगा था. आरम्भ में यह परिवर्तन सीमित थे पर बाद में निर्णायक बने. पारम्परिक संरचना पूरी तरह से विखंडित नहीं हुई. कुलियों की भर्ती शुरू हुई. सेना में पहाड़ के युवा की मांग बढ़ी. रोजगार के लिए पहाड़ों से मैदान जाने का सिलसिला बढ़ते गया.इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था बाहरी आय पर अवलंबित होने लगी. वाह्य प्रवास स्थायी प्रवृति बनी. सेना भर्ती के बढ़ने और अन्य रोजगार के लिए पहाड़ से बाहर पलायन होता रहा. मनी आर्डर व्यवस्था पनपने लगी जिसने स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित किया.
डॉ टोलिया के अनुसार उत्तराखंड की पहचान भौगोलिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक कारकों के समन्वय का परिणाम रही. सामाजिक संरचना और जातिगत आधार पर पहाड़ का समाज, “अंशतः परिवर्तनशील जाति व्यवस्था” था जिसमें ब्राह्मण,राजपूत व शिल्पकार जाति व इनके द्वारा संपन्न परंपरागत पेशे थे. जाति व्यवस्था मौजूद थी पर यह कार्य आधारित और अपेक्षाकृत लोचशील थी. यहाँ सामाजिक संरचना में लचीलापन देखा गया क्योंकि जातियां थीं पर उनके बीच के रिश्ते कठोर न थे.यह एक ऐसी जाति व्यवस्था का चित्रण रहा जो भले ही ऊपर से पारंपरिक व मजबूत दिखता था पर व्यावहारिक रूप से पूरी तरह जड़ नहीं था. इसमें समय, परिस्थिति, आर्थिक व सामाजिक दशा का प्रभाव पड़ा. सामाजिक आंदोलनों से निवास कर रहे समुदायों व विविध जातियों के मध्य संबंधों, उनके पदानुक्रम या नियमों में थोड़ा बदलाव या लचीलापन आया. आर्थिक व भौगोलिक कारक यहाँ के विकास में अधिक प्रभावी रहे, तो औपनिवेशिक प्रभाव सीमित थे पर निर्णायक रहे. इससे संरचना तो नहीं टूटी पर विकास की दिशा बदल गई. यहाँ की आर्थिकी व समाज को प्रवास ने क्रमिक रूप से बदला.
डॉ टोलिया की किताब स्पष्ट करती है कि उत्तराखंड एक अनोखा और विशिष्ट सांस्कृतिक क्षेत्र रहा जो न तो उत्तर भारत की तरह था और न ही पूरी तरह अलग. यह संक्रमणकालीन सांस्कृतिक क्षेत्र बना जहाँ अलग-अलग संस्कृतियां आपस में मिलती रहीं और एक दूसरे के लक्षण साझा करतीं रहीं. इसीलिए उत्तराखंड की पहचान भौगोलिक, सांस्कृतिक व ऐतिहासिक घटनाओं से बनी. तदन्तर क्षेत्रीय अस्मिता के लिए अलग राज्य की मांग ने जोर पकड़ा. उत्तराखंड आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं था इसकी बुनियाद में यहाँ की सांस्कृतिक व ऐतिहासिक अस्मिता के पक्ष निहित थे.
कुमाऊं की संस्कृति ‘संस्कृत परंपरा तथा स्थानीय लोक तत्वों’ का मिश्रण रही जिस पर ब्राह्मण प्रभाव तो रहा पर पूर्ण वर्चस्व नहीं. स्थानीय देवी-देवता व लोक आस्था पर सहज विश्वास बने रहे जिनके पीछे चली आ रही लोक परंपराएं, रीति रिवाज व धार्मिक कर्मकांड निहित थे. धार्मिक संस्कार व उन पर टिकी आस्था की भावना से देवी-देवता पूजन व तीर्थ परम्परा का आविर्भाव हुआ. ग्राम देवताओं को पूजने के विधि विधान साथ -साथ चलते रहे. तीर्थ परंपरा विकसित हुई. इस तरह धर्म सम्बन्धी विधि-विधान लोगों के सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग बने. कुल मिला कर डॉ टोलिया की पुस्तक, “द कुमाऊं हिमालय :आस्पेक्ट्स ऑफ हिस्ट्री, कल्चर एंड इकोनॉमी” में पहाड़ की पहचान को उसकी संस्कृति, इतिहास व भौगोलिक दशाओं के दीर्घकालीन संबंधों के परिवेश में देखती है जिसमें ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ प्रशासनिक अनुभव की छाप दिखाई देती है.
हिमालय की भूमि व निवास कर रहे लोगों पर उनके लेखों का संग्रह “लैंड एंड पीपल ऑफ हिमाल्या” पुस्तक में है जहाँ हिमालय के भूगोल, समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के अंतरसम्बन्धो को समझने का सिलसिला है तो प्रकृति के साथ तालमेल करते मनुष्य की गतिविधियों का लेखा भी. पहाड़ में लोग कैसे अपने परिवेश के बीच सामंजस्य करते वह स्पष्ट करते हैं कि पहाड़ की धरती की खासियत से यहाँ के लोग-बागों की सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक दशाऐं तय हुईं. जल और जंगल से संपन्न होने के बावजूद हिमालय में अन्न उपजाऊ क्षेत्र सीमित है. जोत छोटी है, भूमि असमतल है, विभिन्नता लिए है. मौसम की प्रतिकूलता से प्राकृतिक प्रकोप होते रहते हैं, भौगोलिक बाधाओं से आवागमन प्रभावित होता है. भौतिक बनावट की विविधता अंतरसंरचना को कठिन व जटिल बनाती है. कई इलाके ऐसे सुदूर भंगुर व अलग-थलग पड़े हुए कि जहाँ साल भर टिका रहना व जीवन यापन संभव नहीं. बावजूद इसके मानवीय बसाव व जीवन शैली में पहाड़ में छोटे-छोटे गांव, बिखरी आबादी व आत्मनिर्भर जीवन के दर्शन होते हैं. यह बसाव पर्यावरण के अनुकूलन का परिणाम है. प्रकृति की अनेक बाधाओं के बाद भी यहाँ के निवासियों ने विपरीत परिस्थितियों में जीना सम्भव बनाया है जो पर्यावरण के अनुकूलन का परिणाम है.
पहाड़ी समाज में सामुदायिक सहयोग व पारस्परिक निर्भरता की भावना बनी रही है.इस आधार पर डॉ. टोलिया भूमि व मानव के ऐसे अंर्तसंबंध को रेखांकित करते हैं जहाँ पर्यावरण व परिवेश समाज को आकार देता है तथा समाज पर्यावरण के साथ तालमेल बनाता है. हिमालयी अर्थव्यवस्था में एक ओर प्राकृतिक बाधाऐं हैं तो दूसरी ओर जीवन यापन के संसाधन सीमित हैं जिनसे जीवन निर्वाह के कष्ट बने रहते हैं. पहाड़ में नकदी अर्थव्यवस्था सीमित है. उत्पादन मुख्यतः जीवन निर्वाह के लिए किया जाता है इसी कारण लम्बे समय तक बाजार संपर्क सीमित रहे.जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था प्रमुख तो है पर संवेदनशील, असुरक्षित व कमजोर है. लोग इस पर निर्भर हैं पर मौसम, प्राकृतिक आपदा या किसी भी बदलाव से इसको भारी नुकसान होता है. वह स्पष्ट करते हैं कि हिमालय में भूमि व मानव एक दूसरे को आकार देते हैं. भूमि केवल पृष्ठभूमि नहीं है बल्कि सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक संरचना का निर्धारक तत्व है. अर्थव्यवस्था का स्वरूप इसी कारण स्थिर बना रहता है. स्थानीय निवासियों के लिए वन जहाँ जीवन का आधार हैं तो संघर्ष का कारण भी. लोगों की वनों पर निर्भरता ईंधन, चारा व लकड़ी के लिए बनी रहती है.
औपनिवेशिक काल से वनों पर नियंत्रण की कठोर नीति लागू हुई. लोगों के हक-हकूक छिने. उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा लागू वन नीति को संसाधनों पर नियंत्रण का जरिया बताया जिससे आम स्थानीय निवासियों के हक-हकूक व हितों पर घातक प्रभाव पड़ा व राज्य बनाम समुदाय का संघर्ष सामने आया.स्थानीय संसाधनों की कमी से पलायन का सिलसिला शुरू हुआ. स्थानीय संसाधनों की कमी से प्रवास ने गति पकड़ी. वाह्य आय पर निर्भरता बढ़ी. इस प्रकार प्रवास जीविका रक्षा या उत्तरजीविता की रणनीति बना. अवसंरचना के अभाव, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी व बाजार अपूर्णताओं को दूर करने की नीतियों के अभाव व पहाड़ के लिए विशिष्ट नीति लागू न करने या एक ही व्यापक प्रारूप सब के लिए उपयुक्त है वाली सोच पहाड़ी इलाके में विफल रही.डॉ टोलिया की सोच थी की पहाड़ में मैदानी मॉडल विफल होते हैं जो यहाँ की विशिष्ट संरचना की उपेक्षा करते हैं. यहाँ हिमालय विशिष्ट आयोजन अपनाने पर ही ध्यान दिया जाना चाहिये.
उनका विश्लेषण समग्र था जिसमें भूगोल, समाज और अर्थव्यवस्था का संयोजन था जिससे यह नीति निर्माण के लिए उपयोगी बना. इसकी सीमा यह रही कि पहाड़ की स्थानीय विविधताओं पर ध्यान कम दिया गया, आम लोगों की आवाज मुखर न हो पाई व अक्सर उनकी समस्याओं का अति सामान्यीकरण किया गया था. सार रूप में उनकी पुस्तक समझाती है कि यदि हिमालय को समझना है तो केवल समाज या अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि भूमि-मानव संबंधो की पड़ताल करनी होगी.
डॉ टोलिया की मुख्य रचनाओं, “कुमाऊं हिमालय, उत्तराखंड तथा हिमालय की भूमि व लोग” में एक स्पष्ट वैचारिक ढांचा है. उनकी सैद्धांतिक पृष्ठभूमि मानव -पर्यावरण संबंध पर टिकी है जिसमें वह स्पष्ट करते हैं कि हिमालयी समाज को समझने के लिए भौगोलिक नियत्ववाद और मानव अनुकूलन दोनों को एक साथ देखना होगा. एक ओर पहाड़ का भूगोल है जिसमें सीमित कृषि है, बिखरा बसाव है जो सामाजिक संरचना को निर्धारित करता है. दूसरी ओर समाज है जो सामुदायिक श्रम व प्रवास अर्थात पर्यावरण के प्रति अनुकूलन करने में सहायक है. इस प्रकार उनकी दृष्टि सांस्कृतिक परिस्थिकी पर बनी रहती है. उन्होंने क्षेत्रीय विशिष्टता के रूप में हिमालय को परिभाषित किया व कहा कि हिमालय एक ‘विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र’ है जहाँ सामान्य आर्थिक प्रारूप लागू नहीं होते.उनके अनुसार हिमालयी क्षेत्र की आर्थिकी का आधार जीवन निर्वाह हेतु उत्पादन था जो धीरे धीरे वाह्य घटकों से प्रभावित हुआ जिसमें आपसी लेनदेन में मुद्रा का प्रयोग, भूमि पर लिया जाने वाला लगान, वस्तुओं पर लगने वाला कर. सैनिक भर्ती व गांव से बाहर जा आय के स्त्रोत से आमदनी व प्रशासन द्वारा लिए महसूल, चुंगी व टैक्स इत्यादि थे इनसे आंशिक बाज़ारीकरण हुआ और मनी आर्डर अर्थव्यवस्था पनपने लगी.
पहाड़ में जहाँ प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी बाजार की अपूर्णता व निर्धनता के दुश्चक्र पर जोर देते हुए आर्थिक संरचना पर अवलंबित व्याख्या करते थे वहीँ डॉ टोलिया ऐतिहासिक व परिस्थितिकी के युग्म से बहु विषयक विवेचना करते रहे. उनके विवेचन में पहाड़ की भौगोलिक दशा व अनगिनत ऐतिहासिक कारक जिनने हमेशा ही विकास को बाधित किया. पंडित शिवप्रसाद डबराल ने जहाँ सांस्कृतिक व ऐतिहासिक वर्णन कर जहाँ विश्लेषणात्मक इतिहास प्रस्तुत किया तो डॉ टोलिया ने तथ्यों से आगे की सोच विकसित की. उन्होंने ऐतिहासिक घटना के राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक कारकों की पड़ताल की. इतिहास को केवल याद रखने योग्य तिथियों का संग्रह न मान परिस्थितियों के परिणामों को जाँचने की वैज्ञानिक पद्धति का आश्रय लिया. उन्होंने हिमालयन गजेटियर व बंदोबस्ती रपट का आलोचनात्मक विवेचन किया तथा इसकी सीमाऐं रेखांकित कीं.
डॉ टोलिया ने औपनिवेशिक राज्य की द्वैधप्रकृति को स्पष्ट रूप से सामने रखा व निष्कर्ष निकाला कि ब्रिटिश शासन उदार प्रशासन व संसाधन दोहन पर अवलंबित रहा. यहाँ ऐसे आयुक्त रहे जिन्होंने स्थानीय परंपराओं व रीति रिवाजों को समझा व परोपकारी स्वभाव का परिचायक बना.इसके अनुसार प्रशासनिक निर्णय लिए. इनमें जॉर्ज विलियम ट्रेल व हेनरी रैम्जे मुख्य रहे जो दीर्घकालीन स्थिरता चाहते थे. दूसरी तरफ इसी ब्रिटिश शासन ने वन अधिनियम व राजस्व प्रणाली विकसित की जिसका लाभ सरकार को मिलता.इससे आम जन की तकलीफें बढ़ी, उनके हक हकूक छिने. यह उनके सामाजिक व आर्थिक कल्याण के स्तर में कमी कर गया.
डॉ टोलिया की क्रियाविधि अभिलेखीय आधार लिए थी. प्रशासनीय रिपोर्ट के साथ आई ए एस अधिकारी के फील्ड अनुभव के साथ ऐतिहासिक घटनाओं, समाज के ढांचे की पकड़ व पहाड़ की आर्थिकी के अंतर विषयक समन्वय संयोजन ने उन्हें नीति उन्मुख इतिहासकार बनाया.उनका सबल पक्ष भूमि -समाज व अर्थव्यवस्था पर नजर रखते हुए हिमालय की विशिष्टता को प्रकट करता है. औपनिवेशिक इतिहास के पुनरावलोकन में ब्रिटिश शासन के प्रति सहानुभूति उनके विवेचन में साफ दिखती है जहाँ शासन के परोपकारी स्वभाव पर अधिक जोर दिया गया है. विवेचक के रूप में सिद्धांत व अकादमिक सन्दर्भ में उनका लेखन अधीनस्थ वर्ग के शोषण तथा राजनीतिक व सामाजिक सन्दर्भ में उपेक्षित या हाशिये पर पड़े समाज के शोषण व उत्पीड़न की बात नहीं करता. आम खेतिहर, मजदूर, शिल्पकार व औरतों की दशा व परेशानियों समस्याओं का जिक्र सीमित ही रहा है.
उनमें पूरे हिमालय को एक मानने की प्रवृति दिखाई देती है जिसमें क्षेत्रीय विविधता, कुमाऊं बनाम गढ़वाल बनाम हिमाचल कम उकेरा गया है.साथ ही उनके विवेचन में राजनीतिक अर्थव्यवस्था का सीमित विश्लेषण हुआ है अर्थात वर्ग विश्लेषण कम रहा. डॉ टोलिया के लेखन से जो समग्र समझ विकसित होती है उसमें हिमालयी विकास का असमंजस तो स्पष्ट होता है जहां संसाधन हैं पर विकास सीमित जिसका कारण वह यहां के भूगोल व औपनिवेशिक विरासत से संबंधित करते हैं. उन्होंने प्रशासन, भूमि व्यवस्था व अभिजात संरचनाओं को मुख्यतः ध्यान में रखा. आम जन,, कृषक, शिल्पकार व महिलाओं की समस्याओं को कमतर आँका. खेतिहर और मजूर संबंधों में बेगार, राजस्व दबाव व जीविका संकट पर उनका लेखन संकुचित ही रहा. उदाहरण के लिए औपनिवेशिक वन नीति केवल संसाधन नियंत्रण नहीं बल्कि ग्रामीण प्रतिरोध का कारण बना जिस पर उन्होंने लेखनी नहीं चलाई. फिर हिमालयी आर्थिकी का आधार स्त्री शक्ति रही. परिवार की जरूरतें पूरी करने, पानी भरने, जानवरों का चारा व ईंधन के लिए जंगल से लकड़ी जैसे अनगिनत कामों में उनकी संलग्नता निर्विवाद रही. रोजगार व आय प्राप्ति हेतु परिवार के आदमियों द्वारा प्रवास किए जाने के बाद कृषि का स्त्रीकरण हुआ. अब पारिवारिक स्तर पर औरतों की बढ़ती भागीदारी व जिम्मेदारी बढ़ती गई. घर के काम के साथ खेती का बोझ भी बढ़ा. ऐसे कई प्रसंग उनके लेखन से अनुपस्थित हैं. ऐसे ही सेवा आधारित जाति व्यवस्था व आर्थिक निर्भरता में शिल्पकार व अन्य निम्न जातियों का प्रचुर योगदान था पर उन्होंने वर्ण, जाति व वर्ग की दशाओं व योगदान पर चर्चा नहीं की.वर्ग संरचना में भूमिधारक बनाम खेतिहर तथा सवर्ण उच्च जाति बनाम निम्न जाति को वह स्पष्ट वर्ग संघर्ष के रूप में नहीं देखते जबकि हिमालयी समाज में विभिन्न वर्गों के बीच ऐसे छिपे संबंध विद्यमान रहे जो धन व शक्ति से निर्धारित हो शोषण का कारक बनते हैं व आसानी से दिखाई नहीं देते. छिपे हुए वर्गीय संबंध या वर्ग संरचना में भूमिधारक बनाम कृषक व उच्च जाति बनाम निम्न जाति को वह स्पष्ट वर्ग -संघर्ष के रूप में नहीं लेते जबकि छिपे हुए वर्गीय संबंध या छिपे हुए सामाजिक रिश्तों की उपस्थिति पहाड़ी प्रदेशों में दिखाई देती है.
उनके द्वारा वर्णित हिमालयी ढांचा उपयोगी है पर इसे अधीनस्थ -पारिस्थितिक -राजनीतिक अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में विस्तरित किए बिना हिमालय की वास्तविकता अधूरी लगती है. उनके विवेचन की आधारभूत पर्त में भूगोल व संरचनात्मक पर्त में औपनिवेशिक नीति का सम्यक विवेचन दिखाई देता है पर वाह्य पर्त में जन प्रतिरोध, पारिस्थितिक गतिशीलता, संसाधनों के अवक्षय,संवह नीयता, व राज्य में बाजार अपूर्णता व वर्ग संबंध के पक्ष स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं है.
शोध स्तर के संश्लेषण में यह देखना होगा कि हिमालयी राज्यों में अर्ध विकास की प्रवृति अनौपचारिक व आकस्मिक रहती है. वह मात्र भूगोल नहीं बल्कि औपनिंवेशिक उत्पीड़न, समाज में विभिन्न वर्गों के मध्य संबंधों,पारिस्थितिकीय क्षरण जैसे कारकों से उत्पन्न व प्रभावित होता है. रोजगार व आय के सन्दर्भ में अर्ध आकस्मिक श्रम जैसे दिहाड़ी पर रखे श्रम, अनुबंध पर रखा जाना,अनियमित रूप से प्राप्त आय, सामाजिक सुरक्षा के अभाव की दशाऐं आकस्मिक रहती हैं जो खेती, छोटे उद्योग धंधे, व व्यापार में दिखाई देतीं हैं जिन पर शासन का कोई कड़ा नियंत्रण नहीं रहता. शासन -प्रशासन की नीति भी ढुलमुल रहती है. अर्ध विकास की ऐसी परिस्थिति में अनौपचारिक रोजगार व कार्य संस्कृति का बोलबाला रहता है.प्रवास परिवार के जीवन यापन व निर्भरता का कारक बन जाता है . जिसके सिवा जीवनयापन का कोई अवसर दिखाई नहीं देता.छोटी जोत की भूमि के बंदोबस्त, लगान के बढ़ने व जंगल में हक हुकूक के छिनने के सिलसिले से प्रवास का निर्णय मज़बूरी भी बना और वाह्य स्त्रोत पर निर्भर रहने का निर्णय भी.
पहाड़ के संसाधनों में जंगल राज्य बनाम समुदाय तथा इकोलॉजी व इकोनॉमी के मध्य शक्ति संतुलन की तरह उभरा.डॉ टोलिया ने पर्यावरण को इलाके के विकास हेतु प्रभावकारी घटक कहा पर पारिस्थितिकी संकट व संवहनीयता, स्थिरता, निरन्तरता या वहनीयता पर चर्चा नहीं की जिनसे सतत विकास संभव बनता है वस्तुतः प्राकृतिक संसाधनों का इस प्रकार उपयोग होना जरुरी था कि वर्तमान की जरूरतें पूरी हों व भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधन सुरक्षित रहें.ब्रिटिश राज व आजादी के बाद भी संसाधनों पर सरकार का नियंत्रण बना रहा. वन अधिनियम ने वनों पर समुदाय के हक की सीमा रेखा खींच दी. औपनिवेशिक राज ने सामूहिक संपत्ति के अधिकार का निजीकरण कर डाला. वनों की कटाई, मिट्टी का क्षरण, जल संकट सब परिस्थिकीय ह्रास के पक्ष हैं जिन पर सीमित चर्चा की गई. इसी प्रसार लोक ज्ञान में पारम्परिक खेती व जल प्रबंधन की अनेक विधियां व तरीके विकसित थे जिन्हें डॉ टोलिया ने आंशिक रूप से ही ध्यान में रखा जबकि वह मानते थे कि सतत विकास के लिए पारम्परिक ज्ञान का उपयोग किया जाना आवश्यक है.
राजनय-आर्थिकी में टोलिया अर्थव्यवस्था के घटक विविध चर व अचर का विवेचन करते हैं पर शक्ति संबंधों का निर्वाह अनुपस्थित दिखाई देता है जबकि राज्य व पूंजी के गठजोड़ से ही वन संसाधन, रेलवे व सेना एवम बाहरी बाजार से जुड़ाव से औपनिवेशिक राज्य निष्कर्षणवादी या शोषक राज्य के रूप में उभरे. ब्रिटिश राज ने देश के संसाधनों, धन व जनता की कमाई को जनता के विकास व सामाजिक कल्याण के स्तर को बढ़ाने में व्यय करना प्राथमिकता में नहीं रखा बल्कि राज्य के हित में संसाधनों को निचोड़ने वाली व्यवस्था बना दिया.डॉ टोलिया का लेखन संरचनात्मक व प्रशासनिक आधार पर पुष्ट है जिसका सार यह था कि पर्वतीय भूगोल सामाजिक एवम आर्थिक संरचना को प्रभावित करता है. औपनिवेशिक प्रशासनिक दृष्टिकोण या पारंपरिक इतिहास लेखन की प्रवृति से हट कर उन्होंने अपने लेखन को ऐसे बहुविषयक दृष्टिकोण से संपन्न किया जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं, तत्कालीन सामाजिक दशाओं और अर्थतंत्र के असमंजस का समन्वय मुख्यतः संरचनात्मक एवम प्रशासनिक आधार पर किया गया.
(जारी)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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