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पहाड़ का वह बूढ़ा पिता

पहाड़ के एक छोटे-से गाँव में एक पिता रहता था. उम्र अब ढलने लगी थी, लेकिन उसकी आँखों में आज भी अपने बच्चों के लिए वही प्यार था, जो कभी उनके बचपन में हुआ करता था. (Old Father from Mountains)

उसने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत में बिता दी. कभी खेतों में काम किया, कभी दूसरों के खेतों में मजदूरी. सर्दियों की ठिठुरती सुबह हो या गर्मियों की तपती दोपहर, वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए मेहनत करता रहा.

उसकी अपनी जरूरतें बहुत छोटी थीं. पुरानी कमीज और घिसे हुए जूते उसके लिए काफी थे, लेकिन बच्चों की पढ़ाई और उनकी जरूरतों में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, यही उसकी कोशिश रहती थी.

वह अपनी पत्नी से अक्सर कहता, “हमने तो जैसे अपने दिन काट लिए लेकिन हमारे बच्चों को हमारी तरह परेशान न होना पड़े.”

धीरे-धीरे बच्चे बड़े हुए. पढ़ाई पूरी की और रोजगार की तलाश में शहर चले गए. पिता बहुत खुश था कि उसके बच्चे अब अच्छी जिंदगी जी सकेंगे. उसे क्या पता था कि जिन बच्चों के भविष्य के लिए उसने अपनी जवानी लगा दी, उनके बिना उसका बुढ़ापा इतना लंबा हो जाएगा.

कुछ समय बाद उसकी पत्नी भी इस दुनिया से उसे अकेला छोड़ कर चली गई.

अब घर में वह अकेला रह गया था. वही घर, जहाँ कभी बच्चों की आवाजें गूँजती थीं, अब शाम होते ही शांत हो जाता था.

सुबह उठकर चाय बनाना, अपने लिए खाना पकाना और फिर पुराने आँगन में अकेले बैठे रहना कभी-कभी गांव के नुक्कड़ पर तास खेलने चले जाते बस यही उनकी दिनचर्या बन गई थी. कभी खेतों की ओर चले जाते, तो कभी अपनी पत्नी की पुरानी तस्वीर देखकर उससे मन ही मन बातें करने लगते.

अब शरीर में पहले जैसी ताकत नहीं थी. कमर दर्द करती थी, घुटनों ने भी जवाब देना शुरू कर दिए थे. फिर भी वह किसी से अपनी तकलीफ नहीं कहते .

कभी-कभी बच्चों का फोन आता.

वे पूछते, “बाबू, कैसे हो?”

वह कहते, “मैं ठीक हूँ बेटा, तुम अपनी सुनाओ.”

वह बताना चाहते थे कि रात को नींद नहीं आती अब, तबीयत ठीक नहीं रहती और घर में अकेले मन नहीं लगता. लेकिन बच्चों की व्यस्तता देखकर अपनी बात मन में ही रख लेते.

फोन कटने के बाद वह देर तक मोबाइल को देखते रहते और भीनी आंखों से अगली सुबह का इंतजार करते रहते और  कहते ननतिनों की इजा तू लिजा अपच दगड़.

उन्हें बच्चों से पैसे नहीं चाहिए थे. वह तो बस इतना चाहते थे कि कभी कोई उसके पास बैठकर दो बातें कर ले. कोई पूछ ले कि बाबू, आज खाना खाया या नहीं? दवाई समय पर ली या नहीं?

त्योहार आते तो उनकी उम्मीदें बढ़ जातीं. वह सोचता, इस बार शायद बच्चे आएँगे. घर में फिर से रौनक होगी. लेकिन कई बार त्योहार भी अकेले ही बीत जाते.

एक दिन पड़ोस के एक आदमी ने पूछा, “दाज्यू, बच्चे नहीं आए इस बार भी?”

वह हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, “क्या करें, काम में लगे हैं. शहर में बहुत जिम्मेदारियाँ होती हैं.”

यह कहते हुए उसने अपनी आँखें दूसरी तरफ कर लीं.

शायद वह नहीं चाहते थे कि कोई उसके मन का दुख देख पाए.

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जिस पिता ने बच्चों को चलना सिखाया था, आज वही लाठी के सहारे चलने लग गये. जिसने उनकी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए अपनी इच्छाएँ छोड़ दी थीं, आज उसे अपने बच्चों के साथ कुछ पल बिताने के लिए भी इंतजार करना पड़ता था.

वह अपने बच्चों से नाराज नहीं थे. पिता का मन आखिर कितनी देर नाराज रह सकता है अपनी ही संतानों से?

उसे आज भी उनके आने की उम्मीद थी.

आज भी दरवाजे पर किसी गाड़ी की आवाज सुनकर वह बाहर झाँकते , आज भी उन्हें लगता था कि शायद कोई बच्चा अचानक आकर कहेगा, “बाबू, हम आ गए.”

लेकिन हर बार रास्ता खाली होता था.

पहाड़ में ऐसे कई घर हैं, जहाँ बूढ़े माता-पिता अपने बच्चों की राह देखते हैं. बच्चे रोजगार के लिए शहरों में बस गए हैं और पीछे छूट गए हैं उनके माता-पिता, पुराने घर और उन घरों में बसी अनगिनत यादें.

यह सच है कि बच्चों की भी अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं. जिंदगी चलाने के लिए कमाना जरूरी है. लेकिन क्या अपने माता-पिता के लिए थोड़ा-सा समय निकालना इतना मुश्किल है?

आखिर जिस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के नाम कर दी, क्या उसके बुढ़ापे में बच्चों के पास उसके लिए कुछ पल भी नहीं होने चाहिए?

पहाड़ का वह बूढ़ा पिता आज भी अपने छोटे-से घर में रहता है. उसके पास पुरानी यादें हैं, पत्नी की एक तस्वीर है और बच्चों के लौटने की उम्मीद है.

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उम्र के इस पड़ाव पर उसे किसी बड़े सहारे की जरूरत नहीं, बस अपनों के साथ की जरूरत है.

क्योंकि पिता जब बूढ़ा होता है, तो उसे धन-दौलत से ज्यादा अपने बच्चों की आवाज अच्छी लगती है.

और कभी-कभी, किसी बूढ़े पिता के लिए बच्चों का घर लौट आना ही दुनिया की सबसे बड़ी खुशी होती है. (Old Father from Mountains)

कुमाऊनी शब्दों के अर्थ: बाबू – पिता, दाज्यू – बडा भाई, ननतिन – बच्चे, आजा – मां, अपच दगड़ – अपने साथ

हल्द्वानी में रहने वाली दीपाली सुयाल तिवारी  ने पी. एन. जी. पी. जी. कॉलेज रामनगर से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है. कविताएँ, कहानियां लिखती हैं.

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Sudhir Kumar

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