आज की तेज रफ्तार जिंदगी में इंसान सबसे ज्यादा जिस चीज से दूर होता जा रहा है, वह है शांति. दिन भर की भागदौड़, काम का दबाव, आर्थिक चिंताएं और लगातार शोर हमारे मन को थका देता है. ऐसे समय में अगर कोई जगह है जहां इंसान खुलकर सांस ले सकता है, अपने मन की बात सुन सकता है और खुद से जुड़ सकता है, तो वह है प्रकृति.
प्रकृति केवल पेड़, पहाड़ और नदियों का नाम नहीं है; यह इंसान की सोच को आज़ाद करने वाला एक खुला संसार है. जब कोई व्यक्ति हरे-भरे वातावरण में अकेले समय बिताता है, तो वह समाज द्वारा तय की गई पहचान और अपेक्षाओं से कुछ देर के लिए बाहर निकल आता है. वहां वह यह सोच पाता है कि वह वास्तव में कौन है और उसे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. इसी अर्थ में प्रकृति इंसान को स्वतंत्रता का अनुभव कराती है; क्योंकि आज़ादी केवल विकल्प होने का नाम नहीं, बल्कि खुद को चुनने की क्षमता भी है.
प्रकृति इंसान को प्रेरणा भी देती है. किसी पुराने पेड़ की मजबूती, पहाड़ों की ऊंचाई या खुले आकाश की विशालता मन के भीतर नई कल्पनाओं को जन्म देती है. इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई महान विचार, दर्शन और रचनाएं प्राकृतिक वातावरण में ही आकार ले पाईं. प्रकृति में रहकर मन की जकड़न धीरे-धीरे खुलती है; और सोच को नया विस्तार मिलता है.
इसके साथ ही प्रकृति मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए भी एक सुरक्षित आश्रय की तरह काम करती है. आज के समय में तनाव, अवसाद और अकेलापन आम समस्याएं बन चुकी हैं. इन सबका एक बड़ा कारण यह है कि इंसान प्रकृति से कट गया है. खुले वातावरण में समय बिताने से मन हल्का होता है; चिंता कम होती है और शरीर में नई ऊर्जा महसूस होती है.
हेनरी डेविड थोरो; प्रकृति और आज़ादी की खोज
अमेरिकी दार्शनिक और लेखक हेनरी डेविड थोरो ने प्रकृति को इंसान की आज़ादी से जोड़कर देखा. उनका मानना था कि आधुनिक समाज और भौतिक जीवनशैली इंसान को प्रकृति से दूर कर रही है; और इसी के साथ उसकी स्वतंत्र सोच भी सीमित हो रही है.
थोरो ने कुछ समय जंगल के पास एक झील के किनारे अकेले रहकर बिताया, ताकि वह यह दिखा सकें कि सादा जीवन भी संभव है. उनके अनुसार प्रकृति में रहकर इंसान यह समझ पाता है कि जीवन केवल पैसा कमाने और उपभोग करने तक सीमित नहीं है. वहां इंसान अपने डर, अकेलेपन और बेचैनी का सामना करता है; और धीरे-धीरे उन्हें पार भी कर लेता है. प्रकृति थोरो के लिए वह जगह थी, जहां इंसान सच में स्वतंत्र बन सकता है.
होजे मार्ती; प्रकृति एक उपचारक के रूप में
क्यूबा के विचारक और स्वतंत्रता सेनानी होजे मार्ती प्रकृति को एक उपचारक की तरह देखते थे. उनके अनुसार प्रकृति न केवल इंसान को प्रेरणा देती है; बल्कि उसे मानसिक और नैतिक रूप से मजबूत भी बनाती है.
होजे मार्ती का मानना था कि जो समाज प्रकृति से कट जाता है, वह धीरे-धीरे असंतुलित हो जाता है. जंगल, पेड़ और खुला वातावरण इंसान के भीतर भरोसा, धैर्य और संतुलन पैदा करते हैं. उन्होंने प्रकृति को ऐसा स्थान बताया, जहां इंसान टूटने के बाद खुद को फिर से जोड़ सकता है. उनके लिए प्रकृति इंसान को सुकून देने वाली, संभालने वाली और भीतर से मजबूत करने वाली शक्ति थी.
फ्रेडरिक नीत्शे; प्रकृति और विचारों की ऊर्जा
जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे का मानना था कि इंसान की सोच उसके आसपास के वातावरण से गहराई से प्रभावित होती है. उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा शांत और प्राकृतिक स्थानों पर बिताया; ताकि वे स्वस्थ और गहरी सोच विकसित कर सकें.
नीत्शे के अनुसार जलवायु, स्थान, भोजन और वातावरण जैसी चीजें विचारों की गुणवत्ता को तय करती हैं. पहाड़ों और झीलों के बीच रहते हुए उन्हें अपने सबसे महत्वपूर्ण विचारों की प्रेरणा मिली. उनके लिए प्रकृति केवल सुंदर दृश्य नहीं थी; बल्कि वह विचारों को जन्म देने वाली ऊर्जा थी, जो इंसान को भीतर से झकझोर देती है.
आज के समय में जब तनाव, अवसाद और अकेलापन आम हो चुके हैं; तब प्रकृति का महत्व और भी बढ़ जाता है. यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति जंगल या पहाड़ों में ही जाए. शहरों के पार्क, बगीचे और खुले स्थान भी वही काम कर सकते हैं. ये स्थान इंसान को कुछ देर रुकने, सोचने और खुद से मिलने का अवसर देते हैं.
कुछ लोग यह मान सकते हैं कि गहरी सोच कहीं भी संभव है; लेकिन प्रकृति में जो खुलापन, शांति और स्वीकृति है, वह अन्य जगहों पर दुर्लभ है. प्रकृति इंसान को आंकती नहीं; वह उसे वैसा ही स्वीकार करती है जैसा वह है. यही कारण है कि वहां जन्मे विचार अधिक सच्चे और व्यापक होते हैं.प्रकृति केवल देखने की चीज नहीं है; वह सोचने, समझने और स्वस्थ रहने का माध्यम है. जब इंसान प्रकृति से जुड़ता है, तो वह खुद से जुड़ता है. आज के जटिल और थकाने वाले जीवन में प्रकृति की ओर लौटना कोई विलास नहीं; बल्कि मानसिक संतुलन, रचनात्मकता और मानवीय संवेदनाओं को बचाए रखने की एक वास्तविक जरूरत बन चुका है.
-काफल ट्री फ़ाउंडेशन
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