दून घाटी से उत्तर दिशा में दूर मसूरी की पहाड़ियों को देख कर भले ही दुनिया को वहां से दिखने वाली मशहूर विंटरलाइन याद आ जाती हो मगर मुझे हमेशा युवा ब्रिटिश कैप्टन यंग के आलू ही याद आते हैं. कहां दुनिया भर में मशहूर मसूरी की विंटरलाइन और कहां हर साग-सब्जी खला मामूली आलू!
(Potato Cultivation Uttarakhand)

मैं दून घाटी में लक्ष्मी भवन होम स्टे की छत से शहर की रोशनियों के उस पार मसूरी की रोशनियों की कतार देख रहा हूं. देर शाम मसूरी से दिखने वाली विंटरलाइन ग़ायब हो चुकी होगी लेकिन घरों और होटलों में लोग रात के भोजन में आलू खा रहे होंगे. कहते हैं विंटरलाइन इस पृथ्वी पर केवल दो जगहों से दिखती है- मसूरी और स्विट्जरलैंड से. और आलू? आलू आज पूरी दुनिया में फैल चुका है.

हां, फैल चुका है अन्यथा पांच सौ साल पहले दक्षिण अमेरिका में इंडीज पर्वतमाला के निवासियों के अलावा कौन जानता था इसे? 1492 में खुद कोलंबस हैरान रह गया था, ज़मीन के भीतर पैदा होने वाली इस नई फसल को देख कर. एक अज़ूबे की तरह ले आया था इसे वह कि देखो उस अनजानी दुनिया के लोग इसे खाते हैं! लोगों ने पूछा- वे कहते क्या हैं इसे? वे कहते थे इसे ‘पापा’. लेकिन, यह तो बटाटा यानी शकरकंद जैसा था. तो, स्पेनी लोग इसे कहने लगे ‘पटाटा’. अंग्रेजों ने अपनी ज़ुबान में इसे नाम दिया ‘पोटेटो’.

सर वाल्टर रेले 1589 में इसे आयरलैंड क्या ले गए कि यह तो वहां छा गया. लोग आलू ही आलू खाने लगे. आलू पर इतना निर्भर हो गए कि जब 1840-50 में वहां आलू का भयंकर अकाल पड़ा तो तकरीबन एक लाख लोग भूख से मौत का शिकार हो गए और कम से कम दस लाख लोग आयरलैंड छोड़ कर विदेश जा बसे. उन्हीं में एक केनेडी परिवार भी था, जिनका पोता जॉन एफ कैनेडी आगे चल कर अमेरिका का राष्ट्रपति बना.

दोस्तो,आयरलैंड से आलू फैल गया पूरे यूरोप में. जर्मन इसे ‘कार्तोफ़ेल’ कहने लगे तो इटली के लोग ‘पटाटा’ और फ्रांस के निवासी ‘पोम-दे-तेरे’ यानी मिट्टी का सेब ! यह नाम मुझे याद था दोस्तो, इसलिए पिछली बार जब पेरिस के एक होटल में शाकाहारी नाश्ता खोज रहा था तो पोम-द-तेरे देख कर बहुत खुश हुआ. नाश्ते में दही के साथ आलू खा लिए!

 अच्छा अब पारमेंतियर का किस्सा सुनिए. आलू की खेती के लिए फ्रांस उसका कृतज्ञ है. वह फ्रांसीसी फ़ौज में फार्मासिस्ट था. जर्मनी और फ्रांस में लड़ाई छिड़ी और जर्मनों ने उसे क़द कर लिया. आलू के शुरुआती दिन थे. उसे कोई खाता नहीं था, लिहाजा जर्मनों ने कहा इसे बस आलू खिलाओ! सात साल तक लड़ाई चली. वे पारमेंतियर को आलू खिलाते रहे. और दोस्तो, पारमेंतियर की ज़ुबान पर आलू का स्वाद चढ़ गया. लड़ाई खत्म होने पर वह फ्रांस पहुंचा और राजा लुई सोलहवें से ज़मीन मांग कर आलू की खेती शुरू कर दी. राजा अपनी रानी एंतोइनेते के साथ उसके फार्म पर पहुंचा. रानी ने आलू के प्यारे-प्यारे फूल अपने बालों में लगा लिए और राजा ने अपने कोट के कॉलर में. बाक़ी आप समझ ही सकते हो दोस्तो कि फिर क्या हुआ होगा. चमचों ने उनकी देखा-देखी आलू के फूलों को सर-माथे लगा लिया. खबर फैली, लोग क्यारियों में आलू उगाने लगे.
(Potato Cultivation Uttarakhand)

उधर नीदरलैंड में 1885 में महान चित्रकार विन्सेंट वान गॉग ने अपना विश्व प्रसिद्ध चित्र ‘पोटेटो ईटर्स’ बनाया जो एम्स्टर्डम के वान गॉग म्यूजियम में प्रदर्शित है. चलिए, आपको अपनी एक ख्वाहिश भी बता देता हूं. मेरी ख्वाहिश है कि कभी एम्स्टर्डम जाऊं, वहां ‘पोटेटो ईटर्स’ देखूं और उस शाम केवल आग में भुने आलू खाऊं.

 वैसे, प्रिय कवि गीत चतुर्वेदी को भी वह चित्र और वान गॉग खूब याद आते होंगे तभी तो वान गॉग को याद करते हुए उन्होंने अपनी कविता ‘आलू खाने वाले लोग’ में लिखा-

एक सौ दस साल पहले जो लोग
खा रहे थे आलू
वे अब भी खा रहे हैं
अभी-अभी भट्ठी या उपलों की
सुस्त आग से निकले
राख लगे आलुओं का रंग है यह

गीत चतुर्वेदी

माफ़ कीजिएगा, कहां मैं आपको मसूरी में आलू का किस्सा सुना रहा था, और ले चला आलू की दुनिया की सैर पर. चलिए, अब भारत लौटते हैं.

विश्वास कीजिए, पांच सौ साल पहले हमारे देश में भी आलू नहीं था. 20 मई 1498 को कालीकट, मलाबार के तट पर वास्को-डी-गामा उतरा था. उसके पुर्तगाली जहाजियों के साथ 1510 के बाद आलू भारत आया. वह नई फसल सूरत और कर्नाटक में उगाई गई. कहते हैं, 1675 में बादशाह जहांगीर की ओर से आसफ खान ने अजमेर में अंग्रेज राजदूत सर थामस रो को जो दावत दी थी, उसमें आलू भी परोसा गया था.

वह सब कुछ तो ठीक, मगर मसूरी में आलू?

हां दोस्तो, उत्तराखंड के पहाड़ों में खेती युवा कैप्टन यंग ने शुरू की. वह देहरादून छावनी में पोस्टेड था. शिकार के लिए मसूरी की पहाड़ियों में गया. शर्तिया उसे वहां अपनी जन्मभूमि आयरलैंड खूब याद आई होगी. वह जन्म भूमि, जहां खूब आलू होता था! उसे लगा होगा, वहां होता था तो यहां मसूरी की वैसी ही जलवायु में भी ज़रूर होगा. उसने वहां शिकारगाह बनाई. फिर मलिंगर में अपना कॉटेज बनाया. उसके आगे क्यारियों में आलू बोए जो खूब पनपे. वहां बसासत बढ़ी और आलू फैलता गया.

कहते हैं, कैप्टन यंग का ही एक साथी कैप्टन गन मसूरी से आलू कुमाऊं के पहाड़ों में ले गया. लब्बे-लुबाब यह कि इस तरह उत्तराखंड के पहाड़ों में आलू की खेती फैल गई. तो,यह रही आलू की दास्तान दोस्तो.
(Potato Cultivation Uttarakhand)

देवेन्द्र मेवाड़ी

वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

इसे भी पढ़ें: भुट्टे का मैक्सिको की पहाड़ियों से भारत का सफ़र

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