समाज

48 साल पहले आज ही के दिन पिथौरागढ़ महाविद्यालय के छात्रों पर गोली चली थी

पिथौरागढ़ महाविद्यालय को बने अब आठ एक साल हो चुके थे. 1970 में महाविद्यालय ने ईश्वरी दत्त पन्त के रूप में अपने पहले अध्यक्ष को भी चुन लिया था. पर एक सीमांत में बने इस महाविद्यालय में अब भी मैदान से सजा के तौर भगाये अध्यापक ही आते थे. उनको सजा के तौर पिथौरागढ़ महाविद्यालय में नियुक्ति दी जाती थी.
(Pithoragarh Golikand 1972)

साल 1972 का था पूरे पहाड़ में ‘कुमाऊं-गढ़वाल विश्वविद्यालय बनाओ आन्दोलन’ चल रहा था. पहाड़ के महाविद्यालय आगरा यूनिवसिर्टी से जुड़े थे. मार्कशीट में सुधर से लेकर बैक पेपर, डिग्री लाने छात्रों को आगरा जाना होता. इस वर्ष पिथौरागढ़ महाविद्यालय के अध्यक्ष निर्मल भट्ट चुने गये. अध्यक्ष बनने पर उन्होंने अपना काम नाकारा अध्यापकों को हटाने की मांग से शुरु किया.

‘नैनीताल समाचार’ में छपे एक लेख में पिथौरागढ़ के वरिष्ठ पत्रकार पंकज सिंह महर बताते हैं कि इस दौरान छात्र संघ में भूपेन्द्र माहरा उपाध्यक्ष, इकबाल बख्श सचिव और हयात सिंह तड़ागी कोषाध्यक्ष के पद पर थे. छात्र संघ के शिक्षकों को हटाने की मांग पर हुये आन्दोलन के कारण प्रशासन ने कुछ दिन के लिये अध्यापकों को छुट्टी पर भेज दिया और फिर पुनः बहाल कर दिया.   

अध्यापकों की पुनः बहाली पर छात्र उग्र हो गये और उन्होंने छुट-पुट तोड़-फोड़ की. इसी शाम को छात्र नेताओं के नाम वारंट निकाल दिये गये. निर्मल भट्ट प्पद्यौ गांव में नेपालियों के भेष में भूमिगत हो गये जबकि भूपेन्द्र सिंह माहरा, इकबाल बख्श और राजू पुनेडा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तार छात्र संघ के नेताओं को पुलिस अल्मोड़ा ले गई.

दिन 15 दिसम्बर का था छात्रों और जिलाधिकारी के मध्य बहस हो गयी. छात्र कोतवाली का घेराव कर रामलीला मैदान में इकठ्ठा हो गये. सारी स्थिति नियंत्रण में थी पर जिलाधिकारी रोशनलाल सुबह की खुन्नस में बौखलाये हुये थे उन्होंने गोली चलाने का मौखिक आदेश दे दिया. गोलीकांड में 10 से 15 छात्र घायल हो गये.
(Pithoragarh Golikand 1972)

इस गोलीकांड में सज्जन लाल शाह नाम के एक हाइस्कूल के छात्र की मृत्यु हो गयी. निर्मल भट्ट के नेपाली भेष में होने के धोखे में एक नेपाली मजदूर सोबन सिंह की भी गोली लगने से मौत हो गई.

आनन्द बल्लभ उप्रेती अपनी किताब हल्द्वानी का इतिहास में बताते हैं कि गोलीकांड की जांच के लिये फैक्ट फाइडिंग कमेटी गठित की गयी थी. कमेटी के समक्ष छात्रों का पक्ष रखने के लिये नैनीताल से दयाकिशन पाण्डे आये थे. अपनी रिपोर्ट में कमेटी ने कहा कि

प्रशासन की लापरवाही के कारण यह गोलीकांड हुआ और गोली चलाने की कोई आवश्यकता नहीं थी.

गोलीकांड के बाद उ.प्र. सरकार दबाव में आई और जनवरी 1973 में कुमाऊं और गढ़वाल यूनिवर्सिटी का गजट नोटिफिकेशन हो गया. फरवरी से दोनों विश्वविद्यालय शुरू भी हो गये और कुमाऊं यूनिवर्सिटी बनी नैनीताल में.
(Pithoragarh Golikand 1972)

काफल ट्री डेस्क

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

3 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

3 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

3 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago