समाज

नैनीताल में 1880 का भू-स्खलन

वृहस्पतिवार 16 सितम्बर 1880 ई. को जोर की वर्षा शुरू हुई और वह रविवार को 19 तारीख की शाम तक लगातार चलती रही. इस बीच में तैंतीस इंच वर्षा हुई, जिसमें से बीस से पच्चीस इंच शनिवार की शाम के पहले वाले चालीस घण्टों में हुई. वर्षा के साथ पूर्व की ओर से बड़ी जबर्दस्त हवा चली. सड़कें टूट गयीं, नाले भर गये. उत्तरी पर्वत श्रेणी ढीले पत्थरों और मिट्टी से ढंकी है, उसके भीतर पानी खूब भर गया. नये मकानों को बनाने के लिए वहाँ बहुत से जंगलों को पिछले साल काट दिया गया था और बनाने वालों ने स्वाभाविक जलप्रणालियों की गड़बड़ी को ठीक करने की ओर ध्यान नहीं दिया था.
(Nainital 1880 Landslide Atkinson Book)

कितनी ही जगहों पर पानी पहाड़ की खोखली जगहों में स्माकर नया रास्ता ढूँढ़ने के लिए मजबूर किया गया. 1866 ई. में वर्तमान स्थान में कुछ पश्चिम में एक छोटा-सा भू-पात हुआ था, जिससे पुराना विक्टोरिया होटल नष्ट हो गया. 1869 ई में उसे बढ़ा दिया गया. 1880ई. में जहाँ भू-पात हुआ, वहीं विक्टोरिया होटल और उसके कार्यालय थे. होटल के नीचे और ताल के किनारे पर, जहाँ बेल की दुकान के नजदीक नैनादेवी का मन्दिर था और आगे ताल के किनारे एसेम्बली रूम थे.

शनिवार के 10 बजे सुबह विक्टोरिया होटल के पीछे की पहाड़ी के एक मागमें भू-पात हुआ, जिससे होटल के और होस, तथा उसका पश्चिमी पार्श्व नीचे बह गया और उसी के नीचे एक अंग्रेज बचा, उसकी आया और कुछ देशी नौकर दब गये तुरन्त सहायता मँगायी गयी और मिस्टर ल्योनार्ड टेलर सी० एस०, ओवरसियर मार्गेन तथा डिपो से आयी सैनिकों और अफसरों की टुकड़ी ने दबे हुए लोगों को खोदकर निकालने का काम शुरू किया. इसी बीच में होटल के सभी निवासियों को यहाँ से सुरक्षित स्थान में हटा दिया गया, किन्तु कर्नल टेलर (आर०ई.) होटल के नीचे के एक अलग-थलग कमरे में चले गये, जिसे अधिकतर बिलियर्ड रूम के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था. मेजर और श्रीमती मर्फी सहायता के लिए आयी हुई श्रीमती टर्नबुल के साथ एसेम्बली रूम में चली गयीं.
(Nainital 1880 Landslide Atkinson Book)

सभी लोग घर छोड़ने की तैयारी कर चुके थे क्योंकि अब और कुछ करना सम्भव नहीं था. प्रायः 1 बजकर 20 मिनट पर मैं होटल से बाजार की ओर जा रहा था, जब कि मिस्टर राइट ने एक आवाज सुनी और देखा कि ऊपरी शिला से एक भारी चट्टान होटल की ओर गिरी. मैं उसका कुछ ख्याल न कर आगे बढ़ गया. दस मिनट और बीते, इसी समय भू-पात हुआ.

“सारा पर्वत-पार्श्व अर्धतरल अवस्था में था, उसे गति देने के लिए बहुत कम शक्ति की जरूरत थी. वह चालक शक्ति भूकम्प का एक धक्का था, जो कि इन पहाड़ों में साधारण सी बात है. उसे नीचे भावर में और स्वयं नैनीताल में देखने वालों ने अनुभव किया.

नैनीताल 1885. फोटो: ब्रिटिश लाइब्रेरी

“नगर में बहुतों ने थरथराहट की आवाज उसी तरह सुनी जैसे कि भारी परिमाण में मिट्टी के गिरने से सुनाई देती है. भू-पात की तरफ जिन लोगों को देखने का अवसर मिला, उन्होंने वहाँ से धूलका एक विशाल बादल साफ उठते देखा. साफ दिखाई दिया कि होटल के पीछे के पहाड़ का एक बड़ा भाग बड़े तीव्र वेग और भीषणता के साथ नीचे की ओर खिसका और वह होटल को पूरी तरह से दबाते अरदली-रूम, दूकान और असेम्बली रूम का सत्यानास करता नीचे चला गया. यह सारी दुर्घटना कुछ ही सेकेण्डों में हुई, इसलिए भू-पात के रास्ते में पड़े किसी के लिए बच निकलना मुश्किल था.
(Nainital 1880 Landslide Atkinson Book)

“मृत और लुप्त आदमियों की संख्या 151 रही, जिनमें 43 यूरोपीय और एंग्लो-इण्डियन थे. इन्हीं में कर्नल-टेलर, मेजर मर्को, कप्तान बल्डरस्टोन, कप्तान गुडरज, कप्तान हेन्स, लेफ्टिनेण्ट हलकेट, ल. सलीवन, ल. कार्माइकल, ल. राबिन्सन, टेलर (सी. एस.) पादरी ए. रबिन्सन, डा. हन्ना और नोड, बेल, नाइट, मोज, रक्कर, 2 मोर्गन, 4 शेल्स, ड्रिउ, 5 नानकमीशण्ड आफिसर, 9 गोरे सिपाही, श्रीमती मर्फी, श्रीमती टर्नबुल और दो बच्चे थे. 108 नेटिव (देशी) भी थे. कमिश्नर हेनरी रामजे ताल के पूर्वी छोर के काम की निगरानी कर रहे थे. वह मलबा के कारण उठी भारी लहर में पड़कर ताल में फेंका गए  और एक बार छाती तक पानी में हो किसी तरह ऊपरी रास्ते की सुरक्षित जगह में पहुँचने में सफल हुए.
(Nainital 1880 Landslide Atkinson Book)

सचिवालय के मिस्टर वाकर कन्धे तक कीचड़ में दबकर भी बच निकले. एक सैनिक और देशी लड़का ताल में फेंका गए थे, वहाँ से वह तैरकर बचे. मिसेज नाइट और मिसेज ग्रे बेल की दुकान के ऊपरी तलपर थीं, जो मकान के साथ नीचे चली गयी, किन्तु वे अक्षतशरीर निकली. भू-पात के तुरन्त बाद पहाड़ के भीतर से पानी के फुहारे निकलने लगे.

शनिवार की रात को अब भी वर्षा हो रही थी और चट्टाने पहाड़ से नीचे की ओर गिर रही थीं इसलिए कोई निश्चय नहीं था कि कब फिर भू-पात हो. जगह-जगह बड़ी-बड़ी दरारें पैदा हो गयी थी. ‘दरारें भूकम्प के कारण हुई थीं जिनसे अलमा और चीना शिखरों की ढलानों को उसी तरह हानि पहुँची, जैसी घाटी के भीतर. हेनरी रामजे ने बिलकाक (सी.ई.) और लाडर (सी. ई.) दोनों इञ्जीनियरों के साथ तुरन्त काम शुरू कर दिया और सड़कें, नालियाँ पहले से भी अच्छी हालत में कर दी गयीं. (Nainital 1880 Landslide Atkinson Book)

(एटकिंसन ‘हिमालयन गजेटियर’)

एटकिंसन

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