पलायन कोई नया शब्द नहीं है; सभ्यताओं का इतिहास ही दरअसल मनुष्य के स्थानांतरण का इतिहास है; कभी भोजन की तलाश में, कभी सुरक्षा के लिए, कभी बेहतर जीवन की आकांक्षा में. लेकिन इक्कीसवीं सदी में पलायन का एक नया, खामोश और खतरनाक कारण उभर कर सामने आया है; जलवायु परिवर्तन. यही वह बिंदु है जहाँ से “जलवायु शरणार्थी” की अवधारणा जन्म लेती है.
जलवायु शरणार्थी वे लोग हैं जिन्हें बाढ़, सूखा, समुद्र-स्तर में वृद्धि, भूस्खलन, अत्यधिक तापमान, या मौसम के असामान्य बदलावों के कारण अपना घर, गाँव या पूरा इलाका छोड़ना पड़ता है. यह विस्थापन अक्सर मजबूरी में होता है; न रोज़गार बचता है, न पानी, न खेती, और न ही सुरक्षित जीवन की संभावना. विडंबना यह है कि “जलवायु शरणार्थी” शब्द आज भी अंतरराष्ट्रीय कानून में आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है; 1951 का संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन शरणार्थी को राजनीतिक, धार्मिक या नस्लीय उत्पीड़न से जोड़ता है, न कि पर्यावरणीय संकट से. परिणामस्वरूप, करोड़ों लोग जो जलवायु आपदाओं के कारण उजड़ रहे हैं, वे कानूनी रूप से “शरणार्थी” नहीं माने जाते; भले ही उनकी स्थिति उससे कम भयावह न हो.
वैश्विक परिदृश्य: डरावने आँकड़े
अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ वर्षों से चेतावनी देती आ रही हैं कि जलवायु परिवर्तन मानव प्रवासन का सबसे बड़ा कारण बनने वाला है; अनुमान है कि 2050 तक 25 मिलियन से लेकर 1 अरब लोग जलवायु-प्रेरित कारणों से विस्थापित हो सकते हैं. हर साल औसतन 2 से 2.5 करोड़ लोग केवल प्राकृतिक आपदाओं—बाढ़, चक्रवात, सूखा—के कारण अपने घर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं. दक्षिण एशिया, अफ्रीका और छोटे द्वीपीय देश इस संकट के सबसे आगे खड़े हैं. बांग्लादेश के तटीय इलाके, प्रशांत महासागर के द्वीप, अफ्रीका का साहेल क्षेत्र; ये सब भविष्य के नहीं, बल्कि वर्तमान के जलवायु शरणार्थी क्षेत्र हैं.
यह भी महत्वपूर्ण है कि इनमें से अधिकांश लोग सीमाएँ पार नहीं करते; बल्कि अपने ही देश के भीतर सुरक्षित समझे जाने वाले क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं. इसलिए यह संकट अक्सर अदृश्य रह जाता है.
कानूनी शून्य और नैतिक संकट
जलवायु शरणार्थियों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वे कानूनी रूप से कहीं फिट नहीं बैठते; न उन्हें शरणार्थी कानून सुरक्षा देता है, न कोई विशेष अंतरराष्ट्रीय संधि. वे सहायता के हकदार तो हैं, लेकिन अधिकारों के नहीं. यह केवल कानूनी समस्या नहीं, बल्कि गहरी नैतिक विफलता भी है; जलवायु संकट के लिए जिन देशों और औद्योगिक व्यवस्थाओं की सबसे बड़ी भूमिका रही है, उसका सबसे भारी बोझ उन समुदायों पर पड़ रहा है जिनका योगदान लगभग नगण्य रहा है. यही जलवायु अन्याय है.
अब यदि हम हिमालय की ओर देखें; खासकर उत्तराखंड; तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है. उत्तराखंड दशकों से पलायन झेल रहा है. पहाड़ के गाँव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर हो रहे हैं, और युवा रोज़गार की तलाश में मैदानों की ओर जा रहे हैं. अब तक इस पलायन को मुख्यतः आर्थिक और सामाजिक समस्या के रूप में देखा गया; रोज़गार की कमी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव. लेकिन अब इसमें एक नया आयाम जुड़ रहा है; जलवायु परिवर्तन.
अनियमित वर्षा, सूखते जलस्रोत, बढ़ते भूस्खलन, और बदलते मौसम चक्र ने पहाड़ की पारंपरिक जीवन-व्यवस्था को कमजोर कर दिया है; खेती पहले ही घाटे का सौदा बन चुकी है. ऊपर से मौसम की अनिश्चितता इसे और अस्थिर बना रही है.
इस वर्ष हिमालय में कम बर्फबारी की खबरें भविष्य का संकेत दे रही हैं. बर्फ नदियों का स्रोत है, खेती का आधार है, और पूरे पारिस्थितिक तंत्र की रीढ़ है. यदि बर्फ कम होगी, तो पानी कम होगा; पानी कम होगा, तो खेती और जीवन दोनों संकट में पड़ेंगे; और जब जीवन असंभव होता है, तो पलायन मजबूरी बन जाता है. यह सोचकर डर लगता है कि कहीं भविष्य में उत्तराखंड के लोग भी यह कहने को मजबूर न हो जाएँ कि “हम अपने घर इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि पहाड़ का मौसम अब रहने लायक नहीं रहा.”
यह सवाल अतिशयोक्ति नहीं है; यदि वर्तमान रुझान जारी रहे; अनियंत्रित विकास, पर्यावरणीय चेतावनियों की अनदेखी, और जलवायु अनुकूल नीतियों की कमी; तो उत्तराखंड में पलायन केवल सामाजिक-आर्थिक नहीं, बल्कि जलवायु-प्रेरित पलायन बन सकता है. अंतर बस इतना होगा कि इसे कोई आधिकारिक नाम नहीं मिलेगा. इसके लिए समय रहते चेतने की ज़रूरत है. जलवायु शरणार्थी भविष्य की समस्या नहीं हैं; वे आज मौजूद हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि हम उन्हें पहचान नहीं रहे. हिमालय, जो सदियों से जीवन देता आया है, अब खुद संकट में है.
उत्तराखंड के लिए यह समय चेतावनी को अवसर में बदलने का है; स्थानीय रोज़गार, जल संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरण-संवेदनशील विकास के ज़रिए. वरना आने वाली पीढ़ियाँ शायद पूछेंगी कि जब संकेत साफ थे, तब हमने कुछ किया क्यों नहीं?
-मंजुल पंत
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