पहाड़ों में मौसम का बदलना जीवन की गति को भी बदल देता है. सर्दियों की कड़ाके की ठंड अब ढलान पर है और धूप में हल्की गर्माहट घुलने लगी है. कुमाऊँ क्षेत्र में सदियों से यह मान्यता रही है कि भोजन ऋतु के अनुसार होना चाहिए. सर्दियों में शरीर को अधिक ऊर्जा और गर्माहट की आवश्यकता होती है, इसलिए स्थानीय अनाज, दालें और घी का उपयोग बढ़ जाता है. जब सर्दी ढलने लगती है और बसंत की आहट सुनाई देती है, तब भोजन को ऐसा रखा जाता है जो शरीर को भीतर से संतुलित करे और बदलते मौसम से होने वाली बीमारियों से बचाए. यह परंपरा केवल आस्था पर आधारित नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों के अनुभव और परीक्षण से विकसित हुई समझ का परिणाम है. पहाड़ के लोगों ने प्रकृति के साथ रहकर यह सीखा कि कौन सा भोजन किस ऋतु में शरीर को अनुकूल रखता है. आज विज्ञान भी मानता है कि मौसमी और स्थानीय आहार प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और पाचन तंत्र को संतुलित रखता है.
इन्हीं मान्यताओं के आधार पर आज हम आपको ऐसी दो पारंपरिक रेसिपी बताएंगे जो इन दिनों कुमाऊँ में विशेष रूप से खाई जाती हैं. पहली है गहत का रस और दूसरी है मडुए का हलवा.
Gahat Dal को कुल्थ भी कहा जाता है और इसे सर्दियों के अंतिम दिनों में बेहद उपयोगी माना जाता है. इसमें प्रोटीन और आयरन की अच्छी मात्रा होती है और यह शरीर को गर्म रखने में सहायक माना जाता है. गहत का रस बनाने के लिए एक कप गहत की दाल को रात भर पानी में भिगो दें. सुबह इसे मिक्सर में दरदरा पीस लें. अब एक बर्तन में लगभग चार कप पानी डालकर इस पिसी दाल को पकाएं. जब यह अच्छी तरह उबल जाए तो इसे छान लें. एक अलग पैन में थोड़ा घी गरम करें, उसमें जीरा या जाखिया डालें और चाहें तो हल्की सी हींग मिलाएं. अब इसमें छना हुआ रस डालें, नमक और हल्दी मिलाकर कुछ मिनट उबालें. ऊपर से हरा धनिया डालकर गरमागरम परोसें. यह रस हल्का होते हुए भी पौष्टिक होता है और बदलते मौसम में शरीर को अंदर से मजबूती देता है.
दूसरी रेसिपी है मडुए का हलवा. मड़ुआ पहाड़ का पारंपरिक अनाज है जिसे सर्दियों में शक्ति का स्रोत माना जाता है. इसे बनाने के लिए एक कप मडुए का आटा लें. कढ़ाही में तीन से चार बड़े चम्मच घी गरम करें और धीमी आंच पर आटे को लगातार चलाते हुए भूनें. लगभग दस मिनट में आटे से सुगंध आने लगेगी और उसका रंग थोड़ा गहरा हो जाएगा. दूसरी ओर तीन चौथाई कप गुड़ को दो कप गुनगुने पानी या दूध में घोल लें. जब आटा अच्छी तरह भुन जाए तो धीरे धीरे गुड़ का घोल उसमें डालें और लगातार चलाते रहें ताकि गुठलियां न बनें. मिश्रण गाढ़ा होकर हलवे जैसा हो जाएगा. अंत में इलायची और मेवे डालकर कुछ मिनट और पकाएं. यह हलवा ठंडी शामों में शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देता है.
कुमाऊँ की यह खानपान परंपरा बताती है कि स्थानीय आहार और ऋतु आधारित भोजन केवल स्वाद की बात नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ा संतुलित ज्ञान है जो पीढ़ी दर पीढ़ी संजोया गया है. बदलते मौसम में गहत का रस और मडुए का हलवा जैसे व्यंजन शरीर को नई ऋतु के लिए तैयार करते हैं और पहाड़ की सादगी भरी रसोई की गरिमा को बनाए रखते हैं.
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