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जब रुद्रचंद ने अकेले द्वन्द युद्ध जीतकर मुगलों को तराई से भगाया

अल्मोड़ा गजेटियर किताब के अनुसार, कुमाऊँ के एक नये राजा के शासनारंभ के समय सबसे पहला कार्य बालेश्वर में महादेव की उपासना को पुनः स्थापित करना था. लेकिन स्थितियाँ जल्द ही बदल गईं. राजा के गद्दी पर बैठते ही तराई और भाबर का क्षेत्र मुग़ल सेनापति हुसैन ख़ान तुर्किया के कब्ज़े में चला गया. हुसैन ख़ान पहले लखनऊ का गवर्नर था, पर 1569 ई. के आसपास उसे पद से हटा दिया गया. पद छिनते ही उसने पहाड़ों पर चढ़ाई करने का निर्णय लिया.

हुसैन ख़ान का उद्देश्य केवल मूर्तियों को नष्ट करना ही नहीं था; बल्कि कुमाऊँ के राजाओं के उस खजाने को लूटना भी था, जिसके बारे में माना जाता था कि उसमें अत्यंत धन-संपत्ति छिपी है. उसने तराई से आगे बढ़कर नीचे के इलाकों में भारी लूटपाट की और फिर पहाड़ों के भीतर, डोटी तक पहुँच गया. लेकिन मौसम ने उसका साथ नहीं दिया. भारी वर्षा और कठिन पहाड़ी रास्तों से घिरकर उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से मना कर दिया. लौटते समय उसकी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा.

दिल्ली लौटने पर हुसैन ख़ान को शाहजहाँपुर का गवर्नर बना दिया गया. कुछ वर्षों बाद, 1575 के करीब, उसने फिर कुमाऊँ की ओर दूसरा अभियान चलाया और इस बार पूर्वी दून को लूटा-पाटा. लेकिन कुमाऊँ दरबार द्वारा अकबर तक शिकायत पहुँचने पर उसे दिल्ली बुला लिया गया जहाँ उसकी मृत्यु हो गई.

रुद्रचंद का उदय और मुसलमान अधिकारियों का निष्कासन

मूल विवरण बताता है कि हुसैन ख़ान की मौत के तुरंत बाद, और रुद्रचंद के बालिग होते ही, उसने तराई–भाबर में मौजूद मुग़ल अधिकारियों को कुमाऊँ की सीमा से बाहर निकाल दिया. मुग़ल पक्ष ने इस घटना पर दिल्ली में शिकायत की. तब रुहेलों के गवर्नर की सहायता के लिए सेना भेजी गई.

रुद्रचंद को एहसास था कि मैदान में बड़ी सेना के सामने लड़ना कठिन होगा. इसलिए उसने एक अत्यंत साहसी प्रस्ताव रखा— तराई की दावेदारी एकल युद्ध (Single Combat) से तय की जाए. रुद्रचंद हिन्दू पक्ष का प्रतिनिधि बना और मुग़ल पक्ष का एक प्रमुख योद्धा उसके सामने उतरा. दोनों के बीच खुली धरती पर, भीड़ की मौजूदगी में, एक लंबा और कठिन द्वन्द–युद्ध हुआ. अंततः रुद्रचंद विजयी हुआ. यद्यपि कुछ इतिहासकार इस कहानी को किंवदंती मानते हैं, परंतु यह भी सत्य है कि मुग़ल सेना कभी पहाड़ों पर निर्णायक नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाई थी. इसलिए इस कथा का मूल्य उस मनोवैज्ञानिक विजय में है जिसने कुमाऊँ की प्रतिष्ठा बढ़ा दी.

अकबर का सम्मान और रुद्रचंद की दिल्ली यात्रा

किताब में लिखा है कि द्वन्द–युद्ध में साहस दिखाने और पहाड़ों की स्वायत्तता को बनाए रखने में रुद्रचंद के आचरण से अकबर अत्यंत प्रभावित हुआ. उसने रुद्रचंद को लाहौर बुलाया, जहाँ बादशाह ने उससे भेंट की और पूर्ण सम्मान दिया. मुग़ल राज्य में प्रतिष्ठित मंत्री बीरबील (अकबर के पुरोहित) और चंद वंश के पुराने संबंध भी इस दौर में उभरते हैं. बताया गया है कि रुद्रचंद के बाद भी कुमाऊँ के राजा बीरबल के संबंधों के कारण दिल्ली दरबार में सम्मान पाते रहे.

रुद्रचंद की प्रशासनिक दक्षता और तराई की स्थायी व्यवस्था

‘अल्मोड़ा गैज़ेटियर’ का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि रुद्रचंद केवल युद्धवीर ही नहीं था, बल्कि उसने भाबर और तराई को वास्तविक रूप से अपने शासन में संगठित किया. उसने राजस्व वसूली की व्यवस्था बनाई, बस्तियाँ बसाईं, पहाड़ और तराई को जोड़ने वाले मार्ग सुधारे, स्थानीय जनजातियों को बसाकर खेती आरंभ करवाई, भटकते जनजातीय समूहों को व्यवस्थित ढंग से शासन के अधीन किया. इसके कारण कुमाऊँ का पूर्वी और दक्षिणी मैदान कुमाऊँ राज्य के स्थायी नियंत्रण में आ गया. किताब में उल्लेख है कि तराई–भाबर क्षेत्र को “चौरासी माल” या “नौलख्या” कहा जाता था. यह लगभग 84 कोस लंबा था और हर साल लगभग 9 लाख की आय देता था—इसी से ‘नौलख्या’ शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है.

दक्षिणी दबाव, जंगलों की कटाई और कुमाऊँ का विस्तार

गैज़ेटियर बताता है कि 11वीं सदी में यह भूमि घने जंगलों से ढकी थी और उसमें चरवाहे रहते थे. 12वीं सदी में जब क्षत्रिय कुल यहाँ बसे तब इस इलाके को “कत्यूर” कहा गया. इसके बाद दक्षिण से बढ़ते मुस्लिम दबाव ने स्थानीय लोगों को रामगंगा पार तक खिसकने पर मजबूर किया.

13वीं सदी में मुस्लिम आक्रमणों से हिंदू जनजातियों को भारी नुकसान हुआ. लेकिन कुमाऊँ के चंदों ने धीरे–धीरे अपना नियंत्रण मजबूत किया और 16वीं सदी तक यह पूरा क्षेत्र रुद्रचंद के अधीन आ गया. रुद्रचंद ने विभिन्न परगनों में प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त किए और कई नए बसाए गए नगरों में व्यवस्था स्थापित की. अल्मोड़ा लौटकर उसने भूमि-प्रबंधन में सुधार किए और स्थायी बसावट को बढ़ावा दिया. उसके शासनकाल में कुमाऊँ राज्य मजबूत और संगठित बन गया.

‘अल्मोड़ा गैज़ेटियर’ में वर्णित रुद्रचंद की यह कथा केवल युद्ध और संघर्ष नहीं बल्कि कुमाऊँ की राजनीतिक चतुराई, सामरिक कौशल और प्रशासनिक क्षमता का जीवंत साक्ष्य है. एक ओर उसने तराई–भाबर को मुग़ल प्रभाव से मुक्त कराया, दूसरी ओर वह दिल्ली दरबार तक सम्मानित हुआ और कुमाऊँ राज्य की सीमाओं व आय को स्थायी रूप से स्थापित किया. रुद्रचंद का द्वन्द–युद्ध, प्रशासनिक सुधार और दिल्ली दरबार में प्रतिष्ठा, ये सब मिलकर उसे कुमाऊँ के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण शासक बनाते हैं.

नोट : यह लेख H. G. Walton द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक “Almora Gazetteer” के Chapter–4 (Administration) में वर्णित ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित है. प्रस्तुत लेख उसी सामग्री को सरल और स्पष्ट हिंदी में रखता है ताकि पाठक उस समय के राजनीतिक संघर्ष, रुद्रचंद के साहस, और तराई–भाबर क्षेत्र के इतिहास को आसानी से समझ सकें.

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