क्या आप जानते हैं कि मानसरोवर झील का उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों में कितनी बार और किन-किन संदर्भों में आता है? क्या यह केवल एक भौगोलिक झील है, या भारतीय परंपरा में इसका अर्थ कुछ और भी है? और यदि यह इतना पवित्र माना गया, तो प्राचीन काल में वहाँ तक पहुँचने का मार्ग कौन-सा था—किस रास्ते से ऋषि, साधक और यात्री मानसरोवर की ओर बढ़ते थे? इन प्रश्नों के उत्तर हमें मानसरोवर यात्रा के पौराणिक महत्व को समझने में मदद करते हैं.
भारतीय ग्रंथों में मानसरोवर का उल्लेख सबसे पहले एक दिव्य सरोवर के रूप में मिलता है. इसका नाम ही इसकी उत्पत्ति की ओर संकेत करता है. मानस अर्थात मन से उत्पन्न. स्कंदपुराण के हिमवत्खंड में स्पष्ट कहा गया है कि यह सरोवर ब्रह्मा के मन से उत्पन्न हुआ और सभी सरोवरों में श्रेष्ठ है—
मानसं सरसां श्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा.
तत्र स्नात्वा नरो याति शिवलोकमनुत्तमम्॥
यह श्लोक मानसरोवर को सीधे मोक्ष की अवधारणा से जोड़ता है. यहाँ स्नान करना केवल शारीरिक शुद्धि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना गया है. इसी कारण मानसरोवर का महत्व किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा.
वाल्मीकि रामायण में मानसरोवर का उल्लेख एक ऐसे स्थान के रूप में आता है जहाँ देवता और ऋषि निवास करते हैं. उत्तरकाण्ड में इसका वर्णन इस प्रकार है—
ततो मानसरोवरं नाम सरः पुण्यमुत्तमम्.
हंसकारण्डवाकीर्णं देवर्षिगणसेवितम्॥
यह वर्णन मानसरोवर को तप, साधना और ज्ञान का केंद्र सिद्ध करता है. यहाँ प्रकृति और अध्यात्म एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं—पक्षी, जल और ऋषि, तीनों मिलकर इस स्थान को विशिष्ट बनाते हैं.
महाभारत में मानसरोवर का नाम सीधे-सीधे कम आता है, लेकिन वन पर्व में कैलास क्षेत्र और उससे जुड़े पवित्र सरोवरों का वर्णन मिलता है. पांडवों की उत्तर दिशा की यात्रा के प्रसंग में कहा गया है कि कैलास के आसपास स्थित सरोवरों में स्नान से पापों का नाश होता है और उच्च लोक की प्राप्ति होती है—
ततो कैलासमासाद्य सरांसि विविधानि च.
स्नात्वा मुच्यन्ति पापेभ्यः सत्यलोकमवाप्नुयुः॥
परंपरा इन “विविध सरोवरों” की पहचान मानसरोवर से ही करती है. इस प्रकार महाभारत में भी मानसरोवर एक पवित्र लक्ष्य के रूप में उपस्थित है.
शैव परंपरा में मानसरोवर और कैलास को अलग-अलग नहीं देखा गया. शिवपुराण में कैलास को शिव का नित्य निवास बताया गया है. मानसरोवर उसी कैलास क्षेत्र का पवित्र जल है, जहाँ शिव के समीप पहुँचने से पहले साधक शुद्ध होता है. इस दृष्टि से मानसरोवर यात्रा शैव साधना की तैयारी मानी गई.
अब प्रश्न उठता है कि प्राचीन काल में मानसरोवर की यात्रा किस मार्ग से की जाती थी. आधुनिक समय में हम इसे सीमाओं और सड़कों के माध्यम से देखते हैं, लेकिन पौराणिक काल में मार्ग की पहचान राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भौगोलिक थी. ग्रंथों और परंपराओं से यह संकेत मिलता है कि उत्तराखंड का कुमाऊँ–गढ़वाल क्षेत्र मानसरोवर यात्रा का प्रमुख द्वार रहा है.
स्कंदपुराण में बदरिकाश्रम, हिमालय और उत्तर दिशा को एक क्रम में रखा गया है. बदरिकाश्रम से आगे तपोभूमियों और कैलास क्षेत्र की कल्पना की गई है. इसी परंपरा से आगे चलकर बदरी–केदार–कुमाऊँ–तिब्बत का पौराणिक मार्ग विकसित हुआ. यह मार्ग आज के लिपुलेख और आदि कैलास क्षेत्र से मेल खाता है.
लोकपरंपराओं और बाद के यात्रावृत्तों में भी यह मार्ग दिखाई देता है. कुमाऊँ क्षेत्र को “उत्तर का द्वार” कहा गया, जहाँ से साधक कैलास–मानसरोवर की ओर बढ़ते थे. यही कारण है कि आदि कैलास, कुटी, नाबी और गुंजी जैसे स्थान मानसरोवर यात्रा की स्मृति से जुड़े रहे.
बौद्ध परंपरा में मानसरोवर को अनवतप्त झील कहा गया है. बौद्ध ग्रंथों में भी यह झील चार महान नदियों के स्रोत के रूप में वर्णित है. यह दिखाता है कि मानसरोवर की पवित्रता केवल हिंदू ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे हिमालयी सांस्कृतिक क्षेत्र में साझा रही.
इस प्रकार मानसरोवर यात्रा का पौराणिक संदर्भ केवल एक झील तक सीमित नहीं है. यह यात्रा ब्रह्मा की सृष्टि-कल्पना, शिव के निवास, ऋषियों की तपस्या और उत्तर दिशा की पवित्रता—इन सभी को जोड़ती है. ग्रंथों में मानसरोवर का बार-बार आना इस बात का संकेत है कि भारतीय चेतना में इसे सृष्टि के केंद्र के रूप में देखा गया.
इसलिए मानसरोवर जाना केवल एक कठिन यात्रा नहीं, बल्कि उस मार्ग पर चलना है जिसे हमारे ग्रंथों ने उत्तर की ओर जाने वाला आध्यात्मिक पथ कहा है. यही कारण है कि सदियों बाद भी मानसरोवर यात्रा जीवित परंपरा बनी हुई है.
-काफल ट्री फाउंडेशन
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