समाज

हल्द्वानी की सब्जी मंडी का इतिहास

आज उत्तराखण्ड की प्रमुख मण्डी के रूप में हल्द्वानी स्थापित है. पूर्व में यहां मण्डी का कारोबार मंगल पड़ाव, मीरा मार्ग (पियर्सनगंज), रेलवे बाजार, महावीर गंज में था. महावीरगंज को रहीम गंज कहा जाता था. मण्डी के विस्तार को देखते हुए 1983 में इसे बरेली रोड स्थित नवीन मण्डी स्थल में स्थापित कर दिया गया. आलू-फल आढ़ती व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष जीवन सिंह कार्की और कोषाध्यक्ष नीरज प्रभात गर्ग बताते हैं कि मण्डी के पुराने करोबार में घोड़ों में सब्जी, फल, गुड़, अनाज व अन्य सामान व्यापारी लाते थे.
(History of Haldwani Sabji Mandi)

भीमताल के समीप खुटानी बैंड में पहाड़ से आने वाले व्यापारियों के रुकने का पुख्ता इन्तजाम था. पुराने जमाने में जब व्यापारी कई दिन की यात्राओं के बाद हल्द्वानी पहुंचते थे तो खुटानी में उनका पड़ाव होता था और उस क्षेत्र के लोग राहगीरों के लिये भोजन, उनके घोड़ों के लिये घास तथा रहने की व्यवस्था करते थे. व्यापारी और काश्तकार आते समय अनाज, सब्जी और हल्द्वानी से जाते समय गुड़ व अन्य सामान मददगारों को देते थे. वस्तु विनिमय के साथ होटल के स्थान पर घर की जैसी व्यवस्था खुटानी बैंड पर थी.

पहले व्यापारी अपना वार्षिक लेखा-जोखा दीपावली के दिन से आरम्भ करते थे लेकिन कई लोग इस बसन्त पंचमी के दिन से भी शुरू करते थे. सरकारी कामकाज के हिसाब से मार्च से लेखा माना जाता है लेकिन आज भी पुरानी फर्मों में सरकारी तौर पर बही-खाते तैयार करने के अलावा बसन्त पंचमी के दिन शगुन के रूप में गुड़, आम की बौर, धनिया का प्रसाद बांटते हैं.

मण्डी के कारोबार को व्यवस्थित रूप देने और व्यापारियों का एक संगठन बनाने के लिए 1976 में आलू-फल आढ़ती व्यापारी एसोसिएशन गठित की गई जिससें प्रमुख व्यापारी गोपीनाथ शर्मा महावीर गंज वाले, प्रेमशंकर महेश्वरी, हरदत्त दुम्का, कासिम अली, इद्रलाल गुप्ता, प्रयाग दत्त सुयाल, मुसद्दीलाल, गोविन्दराम, प्रताप सिंह, धनगिरी गोस्वामी, सुरेश चन्द्र अग्रवाल थे. समय के साथ कई उतार-चढ़ाव से गुजरी इस एसोसिएशन ने अपनी परम्पराओं को बनाया हुआ है. इसके सक्रिय सदस्यों में श्यामलाल, भुवन तिवारी, नीरजप्रभात गर्ग, जीवन सिंह कार्की, केशवदत्त पलड़िया, लक्ष्मी चन्द आसवानी, नन्दलाल तेजवानी, रमेश चन्द्र जोशी, सुदीप भंडारी इत्यादि हैं.

हल्द्वानी की पुरानी फर्मों की बात करें तो प्रेमराज गणेशी लाल, रामदयाल रामशरण दास, मंगतराम रामसहाय, खड़क सिंह चन्दन सिंह, जयदत्त लक्ष्मी दत्त, रेवाधर भैरवदत्त, चन्द्र बल्लभ बुद्धिबल्लभ, मस्तान खान-तसब्बर खान, दयाराम सुरेश चन्द्र भण्डारी, जगदीश प्रसाद कासिम अली, तारादत्त जोशी एण्ड सन्स, गिरीश चन्द्र दीप चन्द्र, लक्ष्मण सिंह प्रताप सिंह, हिन्द ट्रेडर्स, हयात सिंह देवेन्द्र सिंह, नरसिंह जमन सिंह हैं. इन पुरानी फर्मों को अपनी परम्परा के साथ इनके उत्तराधिकारी चला रहे हैं. कम्प्यूटर के इस युग में नये उपकरणों और बात व्यवहार के अलावा अपने संस्कारों को भी इन फर्मों ने बनाया हुआ है. आज भी मुनीम, स्याही कलम से लेखे-जोखे का रिवाज, आवाज लगाने का ढंग, गद्दी में बैठने का तरीका देखा जा सकता है.
(History of Haldwani Sabji Mandi)

नई मण्डी में दुकानों के साथ व्यापारियों की भीड़ और ट्रकों की भरभार है और अनजान चेहरों की बड़ी जमात भी जुटती है लेकिन पैदल यात्रा के पथ में तपते हुए जिनके पूर्वजों ने अपने कारोबार को जमाया था वह आज भी अपनी लीक पर बने हुए हैं. प्रताप भैया के पिता आन सिंह जी जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे, की रेलवे बाजार में आलू की आढ़त हुआ करती थी. दूसरे मंगल पड़ाव के चौराहे पर लाला शंकरलाल साह की आढ़त थी. नैनीताल एवरेस्ट होटल उन्होंने ही बनवाया था. आलू-फल आढ़ती व्यापारी एसोसिएशन के अध्यक्ष जीवन सिंह कार्की कहते हैं कि उत्तराखण्ड का सेब बाजार में बाहर से आने वाले सेबों के मुकाबले सुस्त हो चुका है. पहले से अपना आकार-प्रकार और खुशबू के बल पर छा जाने वाला पहाड़ का सेब मण्डी में नहीं दिखाई दे रहा है. जो फल आ रहा है वह बाहर से आने वाले सेब के मुकाबले नहीं ठहरता है. वे कहते हैं कि सेब की उन्नत खेती को बढ़ाने के उपाय किये जाने जरूरी है.
(History of Haldwani Sabji Mandi)

स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी- स्मृतियों के झरोखे से’ के आधार पर

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