खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया विचरती रही है—एकदंत गजराज. अब वह इस अंचल की लोककथाओं का जीवंत पात्र बन चुके हैं. उनके एक ही दाँत होने के पीछे भी एक लोककथा प्रचलित है. कहा जाता है कि कभी वे किसी मठ के महंतों की सेवा में रहते थे. एक दिन भारी बोझ ढोते समय उनका एक दाँत टूट गया और उसके बाद उनका जीवन ही बदल गया. (A Memoir of the Village)
जब वे उपयोगी नहीं रहे, तो आवारा पशुओं की तरह उनके मालिक उन्हें जंगल में छोड़ गए. किंतु वर्षों तक मनुष्यों के बीच रहने की स्मृतियाँ शायद आज भी उनके मन में बसी हुई हैं. स्थानीय लोग मानते हैं कि इसी कारण संध्या ढलते ही उनके कदम अनायास आबादी की ओर मुड़ जाते हैं और भोर की पहली किरण के साथ वे फिर जंगल की शरण ले लेते हैं. खड़कमाफी और उससे लगे गाँवों में उनका यह दैनिक आवागमन अब एक परिचित दृश्य बन चुका है.
मकई, गन्ना, आम और केले की मिठास उन्हें दूर से ही अपनी ओर खींच लेती है. विशालकाय शरीर की भूख भी उतनी ही विशाल होती है. भोजन की तलाश में वे खेतों का रुख अवश्य करते हैं, किंतु आश्चर्य यह है कि उनके व्यवहार में अनावश्यक आक्रामकता कम ही दिखाई देती है. राहगीरों को रास्ता देते हुए उन्हें अनेक लोगों ने देखा है. मानो वे मनुष्यों के साथ सह-अस्तित्व का कोई पुराना अनुबंध अब भी निभा रहे हों.
अंग्रेज़ी में एक कहावत है—Elephants never forget. गजराज की स्मृति सचमुच विलक्षण होती है. वर्षों पहले जिस खेत में कभी गन्ना, मकई या केले की खेती हुई हो, भले ही किसानों ने हाथियों के भय से अब वहाँ वह फसल बोनी बंद कर दी हो, गजराज समय-समय पर वहाँ की टोह लेने अवश्य पहुँच जाते हैं. स्मृति की यह अद्भुत क्षमता उन्हें बार-बार उन्हीं पगडंडियों तक ले आती है.
इसे भी पढ़ें : सिनेमा का शौक और शब्दभेदी वरदान
अपनी फसलों की रक्षा के लिए किसानों ने खेतों के चारों ओर दीवारें खड़ी कर ली हैं. किंतु आम, केला, गन्ना या मकई का आकर्षण गजराज को उन खेतों तक पहुँचा ही देता है. वे दीवारें तोड़ने का कोई इरादा लेकर नहीं आते; पर जब उनके मार्ग में कोई दीवार आ खड़ी होती है, तो उनके भारी-भरकम पैरों की हल्की-सी आहट और स्पर्श भी उसे ढहा देने के लिए पर्याप्त होता है. दोष न दीवार का होता है, न गजराज का—बस प्रकृति के विराट आकार और मनुष्य की सीमित संरचनाओं का सहज टकराव होता है.
आज स्थिति यह है कि भयवश अनेक लोगों ने अपने घरों और आबादी से लगे खेतों में मकई बोना ही छोड़ दिया है. गजराज अब केवल जंगल का जीव नहीं रहे; वे इस पूरे भूभाग की स्मृतियों, आशंकाओं और लोकविश्वासों का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं—एक ऐसे मौन यात्री, जो हर रात जंगल और मनुष्य की दुनिया के बीच अपनी पुरानी राह पर चलता रहता है. (A Memoir of the Village)
उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दूसरी पुस्तक ‘अथ श्री प्रयाग कथा’ 2019 में छप कर आई है. यह उनके इलाहाबाद के दिनों के संस्मरणों का संग्रह है. उनकी एक अन्य पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online
इसे भी पढ़ें : लोकप्रिय सिनेमा में ऋषिकेश
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
हाल ही में मेरी उत्तराखंड यात्रा, हरिद्वार, मसूरी, देहरादून और टिहरी, ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि…
रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के…
चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये…
2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब 'मेरी यादों का पहाड़' छापकर सराहनीय…
नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी…
देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत…