हाल ही में मेरी उत्तराखंड यात्रा, हरिद्वार, मसूरी, देहरादून और टिहरी, ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि यह भू-दृश्य अपनी पारिस्थितिक वहन क्षमता (Ecological Carrying Capacity) से कहीं अधिक दबाव झेल रहा है. जिस स्थान को मैं कभी देवताओं के हरे-भरे, प्राकृतिक और सर्वाधिक पूजनीय निवास के रूप में जानती थी, आज वहां बड़े पैमाने पर वनों की कटाई, अव्यवस्थित आधारभूत ढांचा विकास और अनियंत्रित और गैर-जिम्मेदार पर्यटन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है.
हर मोड़ पर इसके निशान मुझे दिखाई दिए, गाद और मिट्टी से भरी गंगा, बार-बार होने वाले भूस्खलन और कई किलोमीटर तक फैला वाहनों का जाम. जिन स्थानों से हिमालय की प्रसिद्ध बर्फ से ढकी चोटियां आसमान को चीरती हुई दिखाई देनी चाहिए थीं, वहां मुझे एक चिंताजनक सच्चाई दिखाई दी, बर्फीली चोटियां गायब थीं. उनकी जगह भीषण गर्मी और बदलते मौसम के कारण उत्पन्न धुंध और धूमिल दृश्य ने ले ली थी.
यह पर्यावरणीय क्षरण अब धीरे-धीरे बढ़ने वाला संकट नहीं रह गया है, यह जलवायु के तीव्र प्रकोप में बदल चुका है. हाल के वर्षों के मानसून ने एक कठोर वास्तविकता सामने रखी है, जिसने दिखाया है कि मानवजनित विनाश किस प्रकार इन आपदाओं को और अधिक गंभीर बना रहा है.
आंकड़े इस सिस्टम की विफलता की भयावह तस्वीर पेश करते हैं. हाल के मानसून सीज़नों में उत्तराखंड बादल फटने और एक हजार से अधिक भूस्खलनों से प्रभावित हुआ. इन घटनाओं में सैकड़ों लोगों की जान गई, महत्वपूर्ण राष्ट्रीय राजमार्ग कई सप्ताह तक बाधित रहे और आधारभूत ढांचे को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ.
इस स्तर की तबाही मानव हस्तक्षेप से और अधिक बढ़ रही है. पर्याप्त सुरक्षा दीवारों के बिना बड़े राजमार्गों के विस्तार के लिए हो रही पहाड़ों की कटाई ने ढलानों की प्राकृतिक स्थिरता को कमजोर कर दिया है, जिससे सामान्य वर्षा भी विनाशकारी मलबा प्रवाह और भूस्खलन में बदल जाती है. दूसरी ओर, नदियों के सक्रिय बाढ़ क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण ने प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बाधित कर दिया है. जब बादल फटते हैं, तो फंसे हुए पानी के पास निकलने का कोई रास्ता नहीं बचता और शांत दिखाई देने वाली नदियां मलबे से भरी विनाशकारी धाराओं में बदल जाती हैं, जो पूरे के पूरे बस्तियों को निगल जाती हैं. हम केवल प्राकृतिक आपदाएं नहीं देख रहे हैं, हम एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र को देख रहे हैं जो अपनी संरचनात्मक सीमाओं के टूट जाने पर तीखी प्रतिक्रिया दे रहा है.
हालांकि, यदि इसे रचनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो मेरा मानना है कि इस विमर्श में संरक्षण और विकास के बीच एक ईमानदार संतुलन आवश्यक है. स्थानीय समुदायों ने मुझसे खुलकर कहा कि आधारभूत ढांचे का विकास उनकी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है. यही विकास लोगों के पलायन को रोकता है, क्योंकि नई पीढ़ी अब पारंपरिक कृषि में रुचि नहीं रखती और अपने घर के नजदीक आधुनिक आर्थिक अवसर तलाश रही है. मेरे अनुसार, असली चुनौती विकास को रोकना नहीं, बल्कि ऐसी सख्त चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) लागू करना है जो पहाड़ों की प्राकृतिक वहन क्षमता की रक्षा कर सके.
इस नाजुक और अत्यधिक दबाव झेल रहे पारिस्थितिकी तंत्र का संकट मुझे सबसे स्पष्ट रूप से मसूरी में दिखाई दिया. लंबे समय से “पहाड़ों की रानी” कहलाने वाली मसूरी में तेजी से फैलते कंक्रीट निर्माण ने मेरे मन में एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया, हरियाली कहां है? मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह पर्वतीय नगर पानी और संसाधनों की मांग तथा उपलब्धता के बीच बढ़ते अंतर से जूझ रहा है. कंक्रीट का फैलाव और लगातार बढ़ता पर्यटन दबाव शहर की भौतिक सीमाओं को बार-बार तोड़ रहा है.
मसूरी से थोड़ी दूरी पर स्थित धनौल्टी ने मुझे एक अलग और प्रेरक उदाहरण दिखाया. भारी संख्या में पर्यटकों के आने के बावजूद, मैंने देखा कि धनौल्टी ने सुव्यवस्थित इको-पार्कों के माध्यम से अपने घने वन क्षेत्र और स्थानीय वनस्पतियों को संरक्षित रखा है. यह मॉडल मेरे लिए इस बात का प्रमाण है कि यदि मानव गतिविधियों और भीड़ के घनत्व को नियंत्रित किया जाए, तो पर्यटन और संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं. यह अपने अधिक भीड़भाड़ वाले पड़ोसी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सीख है.
मुझे ऐसी ही नियंत्रित क्षमता का अनुभव टिहरी झील के स्वच्छ नीले जल में भी हुआ. अत्यधिक भीड़ से मुक्त और अपनी भौतिक सीमाओं के भीतर संचालित होती हुई टिहरी मेरे लिए ऐसे दुर्लभ पर्यटन स्थलों में से एक प्रतीत हुई, जिसने अब तक अपना संरचनात्मक संतुलन बनाए रखा है. हालांकि, मैं यह भी स्वीकार करती हूं कि इस आधारभूत विकास की कीमत मानवीय स्तर पर बहुत भारी रही है. टिहरी की शांत नीली जलराशि के नीचे पुरानी टिहरी का अस्तित्व दबा हुआ है, एक ऐतिहासिक नगर, जो विकास की प्रक्रिया में पूरी तरह जलमग्न हो गया. स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान मुझे महसूस हुआ कि विस्थापन का वह दर्द आज भी उनकी सांस्कृतिक स्मृति में एक गहरे घाव की तरह मौजूद है. लेकिन इसके साथ ही मैंने यह भी पाया कि इस दुख के समानांतर अनुकूलन और संघर्ष से उबरने की एक प्रेरणादायक कहानी भी मौजूद है. विस्थापित परिवारों में से अनेक देहरादून में बस गए और उन्होंने सरकारी सेवाओं तथा शहरी कृषि से जुड़कर अपने जीवन को सफलतापूर्वक फिर से स्थापित किया.
जैसे-जैसे मानव, आधारभूत ढांचा विस्तार कर रहा है, मैं आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को उसकी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए देख रही हूं. हरित क्षेत्र के तेजी से नष्ट होने से वन्यजीवों के प्राचीन आवागमन मार्ग (वाइल्डलाइफ कॉरिडोर) टूट गए हैं, जिसके कारण जंगली जानवर अपने पुराने आवासों की ओर लौटने को मजबूर हो गए हैं. पर्वतीय गांवों में जंगली जानवरों की मौजूदगी की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानव और वन्यजीवों के बीच घातक संघर्ष भी बढ़े हैं. यह स्थिति भी इस बात का संकेत है कि पारिस्थितिक वहन क्षमता की सीमा का उल्लंघन हो चुका है.
यह पारिस्थितिक टकराव सिस्टम की उस गंभीर विफलता को उजागर करता है, जिसे मैं पर्यटन से जुड़ी नागरिक जिम्मेदारी के पूर्ण अभाव के रूप में देखती हूं. मैंने स्थानीय प्रशासन को अपनी ओर से भरसक प्रयास करते देखा, सार्वजनिक स्थानों पर बड़ी संख्या में कूड़ेदान लगाए गए थे और गीले तथा सूखे कचरे के पृथक्करण को अनिवार्य बनाया गया था. लेकिन मैंने यह भी देखा कि नागरिक अनुशासन की कमी के कारण इन प्रयासों का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है.
मैंने कई बार पर्यटकों को खाली पड़े कूड़ेदानों के ठीक बाहर प्लास्टिक की बोतलें फेंकते हुए और सार्वजनिक सड़कों पर खुलेआम थूकते हुए देखा. इस प्रकार पूरा पर्यावरणीय बोझ मेजबान क्षेत्र पर डाल दिया जाता है. यात्री यहां की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते हैं, लेकिन पीछे पर्यावरणीय क्षति छोड़ जाते हैं, मानो यह संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्र कोई अस्थायी मनोरंजन स्थल हो. इस प्रशासनिक कमी के जवाब में, मैंने पाया कि स्थानीय आतिथ्य उद्योग ने अपने स्तर पर समाधान विकसित करने शुरू कर दिए हैं. यह समझते हुए कि “उपयोग करो और फेंक दो” वाली अर्थव्यवस्था टिकाऊ नहीं है, कई होटलों ने एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पादों को पूरी तरह समाप्त कर दिया है और उनकी जगह बड़े रीफिलेबल शैंपू और साबुन डिस्पेंसर स्थापित किए हैं.
जल संकट से निपटने के लिए मैंने यह भी देखा कि कई होटल और अन्य प्रतिष्ठान अब ग्रे-वॉटर (प्रयुक्त जल) के उपचार और पुनः उपयोग की प्रणालियों को अपनाने लगे हैं. इससे स्थानीय जल स्रोतों पर उनके परिचालन का दबाव कम हो रहा है.
उत्तराखंड जिस संरचनात्मक संकट का सामना कर रहा है, वह वास्तव में एक वैश्विक प्रवृत्ति का क्षेत्रीय रूप है. वेनिस जैसे विश्वप्रसिद्ध पर्यटन स्थल और स्पेन के अत्यधिक भीड़भाड़ वाले तटीय क्षेत्र पहले ही अपनी वहन क्षमता की सीमा तक पहुंच चुके हैं. इन क्षेत्रों को अंततः यह स्वीकार करना पड़ा कि अनियंत्रित पर्यटन उस आकर्षण को ही नष्ट कर देता है, जिसे देखने के लिए लोग वहां आते हैं.
इसके जवाब में इन स्थानों ने पर्यटकों की संख्या पर कड़ी सीमा, रात्रि-विश्राम कर (Tourist Tax) और सख्त ज़ोनिंग कानून लागू किए हैं, ताकि पर्यावरणीय संतुलन को पुनः स्थापित किया जा सके. उत्तराखंड के संदर्भ में, मेरा दृढ़ विश्वास है कि आगे का रास्ता केवल पर्यटकों की नैतिक जिम्मेदारी पर आधारित अपीलों या प्रशासन की निष्क्रिय उम्मीदों पर नहीं छोड़ा जा सकता. राज्य को अनियंत्रित दोहन के मॉडल से निकलकर कड़े नियामकीय संरक्षण के मॉडल की ओर बढ़ना होगा. यदि “पहाड़ों की रानी” मसूरी और उसके आसपास की घाटियों को भविष्य में सुरक्षित रखना है, तो पर्यटन की सफलता को केवल आगंतुकों की संख्या से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय अनुपालन के आधार पर मापना होगा.
सीमाओं के बिना विकास, प्रगति नहीं बल्कि मिटाव (Erasure) है. मेरे दृष्टिकोण से उत्तराखंड को वह राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी, जिसके माध्यम से प्रवेश कोटा लागू किया जाए, पर्यावरणीय उल्लंघनों पर कठोर दंड लगाया जाए और पारिस्थितिक वहन क्षमता को कानूनी रूप से लागू किया जाए, इससे पहले कि पहाड़ स्वयं हमारे लिए अपनी सीमा निर्धारित कर दें.
नोट : अंग्रेज़ी भाषा में सोनल देसाई का यह लेख ESG news.earth वेबसाइट में छपा था. काफल ट्री के लिए इस लेख का अनुवाद मंजुल ने किया है. सोनल देसाई अन्य के लेख आप दिए गए लिंक में पढ़ सकते हैं. लेखिका के अन्य लेख.
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