ललित मोहन रयाल

खड़कमाफी के जीवन में एक दशक से विचरते एकदंत गजराज

खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया विचरती रही है—एकदंत गजराज. अब…

2 days ago

पुस्तक समीक्षा – भंवर: एक प्रेम कहानी

भंवर: एक प्रेम कहानी- अनिल रतूड़ी का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास है. उपन्यास में लेखक ने लोक-जीवन से भरपूर…

4 years ago

जब सुल्ताना डाकू ने कालीकमली वाले बाबा को पांच सौ रुपए चढ़ावा दिया

तब यातायात के साधन सुलभ नहीं थे. उस समय इन दुर्गम पर्वतीय तीर्थों की यात्रा करना अति कठिन कार्य था.…

4 years ago

ललित मोहन रयाल का नया उपन्यास ‘चाकरी चतुरंग’

व्यावहारिक- सामाजिक सन्दर्भों में 'व्यवस्था' का दृश्य-अदृश्य जितना व्यापक प्रभाव है साहित्यिक-सामाजिक विमर्श में ये उतना ही सामान्यीकृत पद है.…

5 years ago

खलंगा युद्ध: जिसमें पहाड़ियों ने अंग्रेजों की रूह कंपा दी

‘खलंगा’ नेपाली भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ छावनी या कैंटोनमेंट होता है. अंग्रेज इतिहासकारों ने अपनी भाषिक समझ के…

5 years ago

मिले सुर मेरा तुम्हारा…

संगीत का जादू सर चढ़कर बोलता है  लोक का जादुई प्रभाव होता है. इन कथनों की सच्चाई दूरदर्शन के एक…

5 years ago

दानै बाछरै कि दंतपाटी नि गणेंदन्: मातृभाषा दिवस विशेष

ऊंकू बामण बिर्तिकु काम छाई. कौ-कारज, ब्यौ-बरात, तिरैं-सराद मा खूब दान मिल्दु छाई. बामण भारि लद्दु-गद्दु बोकिक घौर लौटद छा.…

5 years ago

लेखक ललित मोहन रयाल से उनके साहित्यिक सफर पर बातचीत

ललित मोहन रयाल ने हिंदी साहित्यिक जगत में अपनी पूर्व प्रकाशित दो पुस्तकों 'खड़कमाफी की स्मृतियों से' तथा 'अथ श्री…

5 years ago

बेईमान भूत और तोतले पंडिज्जी का किस्सा

कई बार भूत बेईमान निकल आता था. पता-ठिकाना पूछने पर गलत-सलत एड्रेस बताने लगता‌. इधर-उधर की बातें करके चकमा देता.…

6 years ago

लोकभाषा में उलटबांसियां

गूढ़ रहस्यों और मर्मस्पर्शी भावों को व्यक्त करने में गढ़वाली बोली कितनी समर्थ है, इसका जायजा लेने की एक छोटी…

6 years ago