ललित मोहन रयाल

बेईमान भूत और तोतले पंडिज्जी का किस्सा

कई बार भूत बेईमान निकल आता था. पता-ठिकाना पूछने पर गलत-सलत एड्रेस बताने लगता‌. इधर-उधर की बातें करके चकमा देता. काफी समय तो ये पता करने में ही नष्ट हो जाता था कि ये आखिर है क्या बला. वह बढ़ा-चढ़ा आत्मपरिचय देने लगता था. देव, यक्ष, गंधर्व टाइप का कन्फ्यूजन पैदा कर देता.
(Ghost and Priest by Lalit Mohan Rayal)

शुरुआती लक्षण जानकर मंत्रोई जान जाते कि ये हमारे बूते का नहीं. जैसे-तैसे काबू में नहीं आनेवाला, लेकिन इस बात का उसे आभास नहीं होने देते थे. उसका भ्रम बनाए रखते और मंत्र बोलते-बोलते फौरन उसे हायर सेंटर रेफर करने की योजना बना लेते थे.

अब सुपर स्पेशलिस्ट के पहुंचने में थोड़ा-बहुत समय तो लगता ही था‌. तब तक उसे पूजा देने के बहाने बहलाए रहते थे. घेर-घार के रोके रखते. उसे थामने के लिए राम-रक्षा केर बांधते और एक्सपर्ट को बुलाने के लिए हरक़ारा रवाना कर देते थे. जैसे ही बोलते, “जवा रे! छुयाणऽमा…जवा धि रे खडोऽली…”
(Ghost and Priest by Lalit Mohan Rayal)

गांव-विशेष का नाम सुनते ही भूत पर बदहवासी सी छाने लगती थी. वह एकदम से बैकफुट पर आ जाता. जार-जार रोने लगता था. भूत को ये मालूम रहता था कि वो गांव तो जाने-माने सुपर स्पेशलिस्ट का मुकाम है. गांव का नाम सुनते ही, वह औकात में आ जाता था. उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगती. जो भूत अभी तक बड़ी-बड़ी पूजा मांग रहा होता था, खुद के लिए वीआईपी ट्रीटमेंट मांगते हुए देवत्व की मांग कर रहा होता था, एकदम से गियर बदल लेता. गरज ये कि चिकनी-चुपडी बातें करने लगता था.

“मैं जाणु तौं… क्या जरुत्त वख आदिम अटगौणैकि…वु बि खाल्लि परेशान ह्वाल…”

लेकिन मंत्रोई मानता नहीं था. क्या मजाल कि जरा भी उसकी बातों में आता हो. जानता था कि गुरु बाबा का नाम सुनते ही इसने छळ-छद्म धरने शुरू कर दिए हैं.

उसे सुरक्षित घेरे में लेकर मंत्रोई अपना इरादा जता देता, “आज त्वै आण द्योण..जु फेर यना फटकिऽक ना ऐसकि..”

तब तो भूत इस कदर घिघियाने लगता था, कि नाक रगड़-रगड़कर रहम की भीख मांगने लगता, “कुछूऽऽ नी चयेंदु…मैं यना फेर कब्बिनीं दिख्योलु…”

वह भागने के लिए एक सुरक्षित पैसेज की डिमांड करने लगता था, “मेरि यथगासि हात्त जुड़ैछ…बस तुई छैं मेरू सबकुछ…एक ऐसान करदे..मैं सौं घैंटदों, त्वैन केर खोलिनीं.. अर म्यार भागद बार नीं…”
(Ghost and Priest by Lalit Mohan Rayal)

सुपर स्पेशलिस्ट की खासियत होती थी कि प्रथम सूचना पाते ही, वे घर से रवाना हो लेते थे. घर से निकलते ही, गाऽरी मंतरना शुरू कर देते यानी हथियार पे धार देना शुरू कर देते.

उनका नाम सुनते ही भूत हथियार डाल देता था. दुहाई देने लगता, “वैथैं ना बुलाऽन..मि वन्नि चल जांदौंऽ..मि चलग्यों… “

ऐसे ही एक सुपर स्पेशलिस्ट का एक वाकया बताते हैं. एक दिन उनके घर खास मेहमान आए हुए थे, जिन्हें स्पेशल भोज देना बनता था यानी मांसाहार. तभी खबर आ गई. कहीं से उनको बुलावा आ गया. नेकी और पूछ-पूछ.

वे उस गांव के लिए रवाना हो गए. पहुंचते-पहुंचते अच्छी-खासी रात हो गई. उनींदे थे. पिछली रात कहीं से बड़ा तगड़ा भूत भगाकर आए थे. अन्यमनस्क से थे. उंघते जा रहे थे. तीन-तीन बार के मंतर पढ़ दिए. देखने वालों को लगा कि मंतर मिसफायर होते जा रहे थे.
(Ghost and Priest by Lalit Mohan Rayal)

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, “भूत औतन्युई निछ. भौत देर ह्वैग्ये, पर भूत नीं ऐंछेईऽ..”

सुबह के तीन बजने को थे. तब तक थकान उतर गई होगी. झाड़कंडी चैतन्य हो गए. उन्होंने अपना कुर्ता उतारा और बगल में एक लड़के को थमा दिया.

बकौल आईविटनेस, “गाड़िऽ वैन रूप..अर मारिऽऽ किड़ग्ताळ. बणग्याई वु घोर बेताळ. अर वैन द्यखद-द्यखद अफरि बंडिकि चिर्खि-मिर्खि मचै दिनिन…”

उनका विकराल रूप देखकर, भूत से लेकर तीमारदार तक सभी दहशत में आ गए. सब बुरी तरह डर गए. भूत ने सोचा, ये तो मेरी भी चिंदी-चिंदी उड़ा देगा. गिड़गिड़ाने लगा और ‘जांदुऽ..जांदुऽ…’ रट लगाने लगा.

वहीं पर मालूमात हुई कि इसी केस में दो दिन पहले उनके बिरादर ने भी हाथ आजमाया था, लेकिन भूत भागा नहीं. उनसे भाग ही नहीं पाया.

दरअसल बिरादर से इनकी कड़ी स्पर्धा चलती थी. बिरादर की शिकायत थी कि बंटवारे में इन्होंने मालदार आसामी अपने हिस्से रख लिया और दरिद्र-दुखियारे उसे दे दिए. ऊपर से खबर ये थी कि बिरादर तुतलाहट का शिकार था, जिससे उसके बोले हुए मंतर बेअसर साबित होते थे. खुद भूत बंकिम मुस्कान के साथ शिकायत करते थे, “वु बामण त मंतर बोळ्द बगत तोतलांदुऽ.”

बताया जाता है कि भूत भगाने की जोर-आजमाइश में, आखिर में उससे वचन लिए जाते हैं. उससे एक करार लिया जाता है. तुतलाने वाले पंडित जी यहीं पर गच्चा खाते थे. कहते थे, “बाचा ओऽ बाचा पोऽ जु अफई कौयसि फयकि वु हयामखोय..” (मुराद ‘बाठा ओर बाठा पोर’ से रहती थी.)

इस पद्धति में कमी ये रह जाती थी कि भूत को संदेश स्पष्ट नहीं हो पाता था. ऐसे में कोई भी भूत बॉण्ड साइन करने से मना कर देता. अनुबंध ही नहीं बन पाता था और भूत भागने से इंकार कर देता.

इधर इनका बनियान फाड़ने के अलावा एक आखिरी स्टंट और होता था, जिसे वे विरलतम मामलों में इस्तेमाल में लाते थे. अगर कोई बहुत ही बड़ा डिप्लोमेट भूत निकल आता, जो कांपने से इंकार कर देता हो. कोई भी तरीका आजमा लो, किसी भी तरह से बातचीत में शामिल न होता हो तो झाड़कंडी दहकते अंगारे ले आता और भूत से शर्त लगाता, “कित तु खाऽ, निथर मैं खौलु”

भूत ऐसी ‘बैट्’ सुनकर भौचक्का रह जाता. उसकी तो इज्जत पर बन आती थी. अब वो कैसे कहता कि “मि नि खांदुऽ या मि नि खै सकऽदु..”

उसके पास एक ही रास्ता बचता था, “मिं जांदु..”

लावे जैसे दहकते लाल अंगारे देखकर कोई भी समझदार इंसान तो यही कहेगा, “बहुत देर हो गई. अच्छा अब मैं चलता हूं..”

(Ghost and Priest by Lalit Mohan Rayal)

उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दूसरी पुस्तक ‘अथ श्री प्रयाग कथा’ 2019 में छप कर आई है. यह उनके इलाहाबाद के दिनों के संस्मरणों का संग्रह है. उनकी एक अन्य पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.

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