कला साहित्य

तिगमुल्या : सूरज से अपनी रोटी के लिये लड़ने वाले भोले पहाड़ी बालक की लोककथा

एक छोटा बालक था. उसकी दादी उसे रोज एक रोटी उसके ज्योज्याग (कमरबन्द) में बांधकर उसे भेड़ चराने भेजती थी. एक दिन भेड़ चराने से पहले उसने अपनी रोटी एक झाड़ी में छिपा दी. वापस आया तो झाड़ी से रोटी गायब थी. गायब तो होनी ही थी उसके साथी जो उसे खा गए थे. उसने अपने साथियों से पूछा तो उन्होंने कहा – तेरी रोटी सूरज खा गया. बालक ने इस पर गुस्सा कर कहा – मैं कल ही सूरज को पकड़ने जाऊंगा.
(Tigmulya Folk Stories Uttarakhand)

दादी ने बहुत समझाया कि सूरज बहुत दूर रहता है. वहाँ जाने में नौ दस दिन तो लग ही जाएंगे पर बालक जिद पर अड़ा रहा. दूसरे दिन वह सूरज को ढूँढ़ने निकल पड़ा. घाटी पर्वत पार कर वह बहुत दूर एक चोटी में पहुंचा तो उसे वहाँ धुआँ दिखाई देने लगा. उसने चिल्ला कर कहा – ओरे ! तुम ये धुआँ उड़ाने वाले कौन हो? वहाँ से आवाज आई – अरे हम नागलोक के लोग हैं. तुम किस लोक के हो, कहाँ जा रहे हो? उसने कहा – मैं मानवलोक का हूँ. सूरज को पकड़ने जा रहा हूँ. मुझे अपने वहाँ एक रात के लिए रहने दोगे?

इस पर नागनाथ ने कहा – ठीक है आ जाओ. फिर उस दिन वह नागलोक में ही रहा. सुबह उसको नाग लोक वालों ने नाश्ता कराया और कहा – सूरज से हमारी तरफ से पूछना हमारी कन्या विवाह योग्य है. कितने ही लोग माँगने आ रहे हैं. ये बताओ किस को देनी चाहिए. बालक ने हाँ कहा और चला गया. इसीप्रकार बालक पंद्रह दिन तक चलता रहा, जहाँ उसे एक के बाद एक राक्षस, नदी, भालू, बन्दरों के लोक मिले. वह सभी के वहाँ एक दिन रहा और सभी लोकवासियों ने उससे सूरज से अपनी लड़कियों को किससे विवाहें, यह पूछने को कहा.

उस दिन सूरज को देर हो गई थी. वह लाठी टेककर तेजी से आ रहा था. बालक ने उसे पकड़ लिया और कहा – जब तक मेरी रोटी नहीं लौटाओगे तब तक मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा. सूरज ने लाख कहा कि उसने उसकी रोटी नहीं खाई पर बालक माना ही नहीं. बालहठ हुआ. मजबूरी में काम में देर हो जाने के डर से सूरज ने उसे एक चक्की दी. जिसे दाएँ ओर घुमाने से खाने की चीज और बाईं तरफ घुमाने से पहनने की चीज निकलती थी, पर वह नहीं माना. तब उसने रस्सी दी जिसे ‘बाँध रस्सी बाँध’ कहने पर वह सबको बाँध देती थी. फिर भी वह नहीं माना तो उसे फिर सूरज ने लाठी दी जिसे टेककर जहाँ भी जाओ वहाँ पहुंचा जा सकता था. फिर बालक ने सभी लोकों के उस सवाल को भी पूछा कि वो अपनी लड़की कहाँ विवाहें. सूरज ने हड़बड़ाहट में कहा – उनसे कहना अपनी अपनी लड़कियों की शादी आदमियों में करो.

वापसी में बालक ने सभी लोकों से सूरज की बात बतलाई कि सूरज ने कहा है कि लड़कियों की शादी किसी आदमी से करो. सभी लोक के लोगों ने सोचा – कहाँ आदमी ढूंढने जाएँ? उसका मिलना तो मुश्किल. यही बालक आदमी लग रहा है, इसलिए बालक से अपनी लड़कियों की शादी कर दें और वह अपनी पाँच औरतों को लेकर घर गया तो उसे पता चला कि सूरज ने पहिले ही उसके घर सोना चाँदी उपहार में भिजवा दिया था. दादी भी खूब हष्ट पुष्ट खाई-पीई-सी हो गई थी. बालक आराम से सोने चांदी के महलों में अपनी रानियों के साथ रहने लगा. चक्की से खूब खाने पहनने का समान निकालता था.

उसकी रानी के नाखून काटने एक ब्राह्मण आता था. एक बार वह बन्दर रानी के नाखून काट रहा था तो वह मांस सहित कट गया और उसमें दूध आ गया. उसने फिर सभी रानियों के नाखून काटे. वह मांस से काटने लगा तो उसने पाया सब रानियों के नाखून से दूध निकलता है. वह ब्राह्मण चुपचाप एक दुष्ट राजा के पास आकर बोला – राजा जी ! आपकी रानियों के नाखून से अगर मांस काटा जाए तो खून निकलता है पर एक राजा ऐसा है जिसकी रानियों के नाखून से मांस काटने पर दूध निकलता है.
(Tigmulya Folk Stories Uttarakhand)

राजा ने यह सुनकर बालक को बुलाया और कहा – मैं इस मकान के बराबर चिता चुनता हूँ अगर तू आग लगाने पर जल गया तो तेरी सारी रानी मेरी. नहीं जला तो तेरी ही. बालक मान गया. उसने घर जाकर यह बात रानियों से कही और पूछा क्या करूँ तो बन्दर रानी ने कहा – तेरा सर. अरे! अपनी लाठी ले जा. राजा ने दूसरे दिन बालक को खूब खिलाकर चिता में बिठाया और आग लगा दी. खूब धुआँ रातभर होता रहा, आग के साथ. बालक तो अपनी लाठी टेककर घर निकल गया.

दूसरे दिन राजा ने बालक के घर अपने आदमी भेजे यह सोचकर कि उसकी सारी रानियाँ मेरी, पर बालक को घर में देखकर वह घबरा गया. फिर उसने दूसरी शर्त रखी तेरी मेरी लड़ाई होगी जो जीतेगा उसकी ही रानी होगी. इस पर बालक की सारी रानियाँ अपने मैके गई और सब अपने भाई-पिताओं को ले आईं. बालक के सारे मकान को नाग, नदी, शेर, भालुओं और अन्त में बन्दरों ने घेर लिया. बालक मकान के सबसे ऊपर बैठ गया.
(Tigmulya Folk Stories Uttarakhand)

सबसे पहिले राजा ने सौ आदमी भेजे. वो सब घेराबन्दी देखकर ही भाग गए. फिर राजा ने सारी पलटन भेजी तो बालक ने सूरज की रस्सी से बाँध-बाँधकर जमकर उनकी धुनाई की. अन्त में राजा खुद आया उसने हाथ जोड़कर कहा – आगे से ऐसा नहीं करूँगा. बालक ने उसे खूब पीटा और फिर वह बालक के वहाँ नौकर के रूप में अपनी रानी के साथ रहने लगा.

वही भोला बालक आगे चलकर राजा बना. जनता को उसे वह अपना संरक्षक सा लगता था.

कथा पूरी हुई. जाग तूड. पूज्यू.

(डॉ. ताराचन्द्र त्रिपाठी की पुस्तक-11 वर्ष से पिथौरागढ़ के दारमा ब्यास चौदास के लोक कथाकार भास्करसिंह भौंत से साभार )

यह लोककथा प्रभात उप्रेती की किताब उत्तराखंड की लोक एवं पर्यावरण गाथाएं से ली गयी है.
(Tigmulya Folk Stories Uttarakhand)

किसी जमाने में पॉलीथीन बाबा के नाम से विख्यात हो चुके प्रभात उप्रेती उत्तराखंड के तमाम महाविद्यालयों में अध्यापन कर चुकने के बाद अब सेवानिवृत्त होकर हल्द्वानी में रहते हैं. अनेक पुस्तकें लिख चुके उप्रेती जी की यात्राओं और पर्यावरण में गहरी दिलचस्पी रही है.

यह भी पढ़ें: पॉलीथिन बाबा का प्रभात

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