ललित मोहन रयाल

लोकभाषा में उलटबांसियां

गूढ़ रहस्यों और मर्मस्पर्शी भावों को व्यक्त करने में गढ़वाली बोली कितनी समर्थ है, इसका जायजा लेने की एक छोटी सी कोशिश (Column by Lalit Mohan Rayal) —

लोक-भाषा में भावों को व्यक्त करने की बड़ी गहरी ताकत होती है. इसमें कई बार बातें सीधी-सीधी नहीं कही जाती, अपितु घुमा-फिराकर उल्टी व्यंजना में कही जाती हैं. इन बातों में बड़ा गहरा अर्थ छिपा रहता है. इस दिशा में कुलवृद्धों में विशेष प्रतिभा पाई जाती है. दादियां-नानियां-ताईयां तो इस मामले में अद्वितीय होती है.

अगर उनकी फसल लकदक लहलहाकर आई हो तो कहेंगी,
“खारू भि नीं जामीं, एक दाणिं नीं उब्जि.”

उपलब्धि छिपाने के डर से वे जान-बूझकर ऐसा कहती हैं. एक डर सा लगा रहता है, कहीं हाक-टोक न लग जाए. उपज बुरी नजर से बची रहे. फिर इसमें अपने मुंह बड़ाई वाली बात भी खारिज हो जाती है. कहीं ईश्वर बुरा न मान जाए.

हालांकि जो व्यक्ति उस समाज से गहरे से जुड़ा होता है, वह प्रयोजन समझ लेता है- ताई का इरादा है कि उसकी उपज के उत्पादन का पता अपात्र व्यक्ति को लग गया तो बारगैं में ढिंढोरा पीट देगा.

अगर उनकी दुधारू गाय बर्तन भर-भरके दूध दे रही हो तो कहेंगी,
“बुंद नीं देणु. ये दोखिथैं मिन निल्लाम कन्न.”

अगर गाढ़े दूध पर किसी ने टिप्पणी कर दी तो फिर कहना ही क्या. ताई पर चौतरफा संकट छा जाता है. कैसी-कैसी आशंकाएं घर करने लगती हैं. निवारण के लिए तरह-तरह से पशु के दोषों का बखान किया जाता है- ‘औण कख देंदु’ ‘औछट्ट्या छ’ ‘इकत्त्या छ’ ‘यकुळ्या छ’ जैसे दोषों की लंबी फेहरिस्त गिनाई जाती है, मानो गिनाए गए दोष संभावित खतरे को टाल देंगे.

कुछ भावों को तो बड़े अनूठे ढंग से जताया जाता है. प्रिय भाई को ‘वु खरण्या’ और चपल बालिका को ‘ईं खडारिं’ कहकर इंगित किया जाता है. ‘वैकि डांडकिलि सजेगि होलि’ कहकर कुशल-क्षेम पूछा जाता है. इन संबोधनों से उनके आंतरिक भावों को जानने में कोई संदेह नहीं रह जाता. सामने वाला जान लेता है कि कोई खास ही होगा जिससे इन्हें भारी स्नेह है.

अगर बच्चा होनहार है और वह समाज में लोकप्रिय होता जा रहा है तो परिजनों को अनिष्ट की आशंका सताने लगती है. मजबूरी ये बन आती है कि उसकी प्रतिभा को खारिज भी नहीं किया जा सकता. ऐसी स्थिति में एक नई किस्म का सुभाषित बोला जाता है, “हुणत्याळु च पर येन बचण नीं”

कुटुंब में अगर कोई खुले विचार के साथ व्यवहार भी खुला रखता हो तो उसके लिए ‘स्यू खत्यूं’ संज्ञा तय हो जाती है.

इस बोली में कितनी सरलता और वाक्य-निपुणता है. सहजता से मार्मिक बातें कह दी जाती हैं.

मृतक को ‘वु भग्यान’ कहकर याद किया जाता है तो सामने खड़े जीवित व्यक्ति को ‘यु निर्बगि’ कहकर संबोधित किया जाता है.

ये बातें निर्मूल नहीं होती. इसके दार्शनिक पहलू पर विचार किया जाए तो जिसने अपना कर्मफल पूरा करके मुक्ति पा ली हो वह ‘भग्यान’ ही हुआ. उस दृष्टि से देखें तो मृत्युलोक में संघर्ष करता व्यक्ति ‘निर्बगि’ ही हुआ.

‘कठमाळ्या’ बहुओं को यह सब समझने में गहन चेष्टा करनी पड़ती है लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास के चलते वे भी निपुण हो जाती हैं. कहने का मतलब है भाषा-बोली का बहुत कुछ उसके भाषा-सौंदर्य पर अवलंबित होता है. महाभारत पढ़ने का सही तरीका

उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दूसरी पुस्तक ‘अथ श्री प्रयाग कथा’ 2019 में छप कर आई है. यह उनके इलाहाबाद के दिनों के संस्मरणों का संग्रह है. उनकी एक अन्य पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.

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