तब यातायात के साधन सुलभ नहीं थे. उस समय इन दुर्गम पर्वतीय तीर्थों की यात्रा करना अति कठिन कार्य था. तो भी बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन तीर्थों के दर्शन करके धर्म-लाभ करते थे तथा पुण्य के भागी होते थे. वे अपने घरों से एक प्रकार से विदा लेकर ही आगे बढ़ते थे. भगवती गंगा और उसकी सहायक अलकनंदा आदि सरिताओं की घाटियों में मृत्यु पाना मोक्ष के समान समझा जाता था.
(Sultana Daku Baba Kali Kamli)
आठ-नौ दशक पहले तक यहां मोटर मार्ग पूरी तरह विकसित नहीं हुए थे और इन तीर्थयात्राओं में लगभग दो महीनों का समय व्यतीत हो जाता था. हिमालय के कण-कण में, प्रत्येक शिखर पर, प्रत्येक उपत्यका में, प्रत्येक अधित्यका में, सघन वृक्षों में, लताओं में, नदियों की जल-धाराओं में तीर्थयात्री सात्विक दिव्य अनुभूतियों का अनुभव करता हुआ आगे बढ़ता था.
चारधाम पैदल यात्रा मार्ग पर श्रद्धालुओं के लिए सन् 1880 में पहली बार प्याऊ की व्यवस्था कालीकमली वाले बाबा ने की. कुछ सालों बाद उन्होंने चट्टियों को व्यवस्थित करवाया, जहां यात्रियों को मुफ्त कच्चा राशन मिलता.
चट्टी, पैदल मार्ग पर सड़क किनारे एक पड़ाव-स्थल होता था. एक छोटा सा प्लेटफार्म, खुले में रसोई की व्यवस्था, सिर छुपाने के लिए घास-फूस से छाया छप्पर. यात्री पैदल-यात्रा के बाद थक जाते तो वहां आराम करके चूल्हा-चौका करते. भरपेट भोजन करके विश्राम करते, फिर आगे की यात्रा शुरू करते.
ऋषिकेश तक मोटर मार्ग से यात्रा करके लक्ष्मण झूला से तार के पुल से यात्री गंगाजी पार करते. वहां से आगे गंगाजी के तट से होकर देवप्रयाग को पैदल मार्ग चट्टियों से होकर जाता था. गरुड़ चट्टी, फूल चट्टी, महादेवसैण, मोहनचट्टी, बिजनी, कुंड, बंदरभेल, महादेव चट्टी, सेमल चट्टी, कांडी, व्यास घाट, छालुड़ी चट्टी, उमरासू, देवप्रयाग. प्रत्येक चट्टी पर कालीकमली वाले क्षेत्र की धर्मशाला थी.
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देवप्रयाग से टिहरी जाने के लिए मार्ग अलकनंदा-भागीरथी को पार करके भागीरथी के किनारे-किनारे जाता था. इस मार्ग में चट्टियों का विवरण इस तरह से था- देवप्रयाग से खर्साड़ा, कोटेश्वर, बंडरिया, क्यारी, टिहरी. टिहरी के अतिरिक्त प्रत्येक चट्टी पर कालीकमली वाले क्षेत्र की धर्मशाला थी. टिहरी से पीपलचट्टी, भल्डियाणा, छाम, धरासू. इन सब चट्टियों में धर्मशालाएं थीं. भल्डियाणा में कालीकमली वाले क्षेत्र की धर्मशाला थी. सिल्क्यारा, गंगनानी, जगन्नाथ चट्टी, ढंडोला के पास कुंसाला तथा हनुमान चट्टी में कालीकमली वाले की धर्मशाला थी. उत्तरकाशी शहर में कालीकमली वाले क्षेत्र तथा बिरला जी की धर्मशालाएं हैं. वहां से आगे मनेरी, मल्लाचट्टी, भटवाड़ी, सुक्खी, झाला, हरसिल, धराली और गंगोत्री में कालीकमली वाले की धर्मशालाएं थीं. पंवाली और त्रिजुगीनारायण में भी कालीकमली वाले की धर्मशालाएं थीं. अगस्त्यमुनि, गुप्तकाशी, फाटा, रामपुर, गौरीकुंड, रामबाड़ा और केदारनाथ में कालीकमली वाले की धर्मशालाएं थीं. चमोली, पीपलकोटी, गरुड़ गंगा, बलदौड़ा चट्टी, पांडुकेश्वर, लामबगड़, हनुमान चट्टी और बद्रीनाथ में भी कालीकमली वाले की धर्मशालाएं थीं.
काली कमली वाले बाबा को उत्तराखण्ड के तीर्थयात्रा के रास्तों पर धर्मशालाओं के निर्माण के लिए विशेष तौर पर याद किया जाता है. भूखे लोगों, साधु-संतों को रोज भोजन करवाना, जब यात्रा सीजन न हो तब भी साधु-संतों और बुभुक्षुओं के लिए चारधाम यात्रा मार्ग पर अनवरत लंगर चलते रहते हैं. मौजूदा समय में सभी यात्रा मार्गों पर मुख्य कालीकमली धर्मशालाएं हैं. कुछ चट्टियां अभी भी अपने स्वरूप में मौजूद हैं.
काली कमली वाले बाबा के बारे में कहा जाता है कि इनका जन्म 1831 में पकिस्तान के गुजरांवाला क्षेत्र के कोंकणा नामक गाँव में हुआ था. परिवार भिल्लांगण शैव सम्प्रदाय से ताल्लुक रखता था. ये लोग भगवान शिव की तरह काला कम्बल धारण किया करते थे.
इन्हें श्री 1008 स्वामी विशुद्धानंद जी महाराज काली कमली वाले बाबा के नाम से भी जाना जाता है. इनके विशुद्धानंद बनने के पीछे यह कहानी बताई जाती है कि जब ये पहली दफा हरिद्वार आये तो इनके मन में संन्यासी बनने की इच्छा बलवती हो गयी. इन्होंने अपने घरवालों के सामने यह इच्छा जाहिर की तो इसकी अनुमति नहीं मिली, लेकिन कुछ समय बाद ये बनारस पहुँच गए और वहां पर स्वामी शंकरानंद से संन्यास-दीक्षा लेकर स्वामी विशुद्धानंद बन गए.
एक दिन अपने गुरु से आज्ञा लेकर विशुद्धानंद उत्तराखण्ड की चारधाम यात्रा के लिए निकल पड़े. इस यात्रा में उन्होंने देखा कि तीर्थ यात्रियों और साधु-संतों आदि के भोजन, पेयजल, आवास और चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है. इन वजहों से तीर्थ यात्रा और भी ज्यादा कठिन हो जाती है. उन्होंने यात्रा की कठिनाइयों को करीब से जाना. उन्होंने तीर्थों के महत्व को अनुभव से समझा था. यात्रा की कठिनाइयों का उन्होंने स्वयं अनुभव करके इनको दूर करने का गंभीर प्रयत्न किया. उन्होंने ठान लिया कि जो साधु-संत, महात्मा और यात्री चारधाम की यात्रा करते हैं, उनके लिए कुछ ठोस किया जाना चाहिए. विशुद्धानंद ने काली कमली ओढ़कर पूरे देश की यात्रा शुरू की. उन्होंने धार्मिक लोगों से यात्रा मार्ग के लिए संसाधन जुटाने का आह्वान किया. सबसे पहले उन्होने प्याऊ खोला और उसके बाद अन्न-क्षेत्र. यात्रियों की सुविधा के लिए स्थान-स्थान पर आवास और भोजन-प्रसाद की व्यवस्था करवाई.
इनकी प्रेरणा से चारधाम यात्रियों के लिए सुविधाएँ और साधन जुटने शुरू हो गए. कालीकमली वाले बाबा की प्रेरणा से हिमालयी नदियों पर पुलों का निर्माण किया जाने लगा. श्रद्धालुओं के लिए साधन जुटने शुरू हो गए. उनके प्रयत्नों से ऋषिकेश तक रेल मार्ग का निर्माण हुआ. लक्ष्मण झूला के पुल का पुनर्निर्माण और स्थान-स्थान पर यात्रा मार्गों का प्रबंध संपन्न हुआ.
ये उस समय की बात है जब यात्रामार्ग निरापद नहीं थे. संयुक्त प्रांत और उसके आसपास के इलाकों में सुल्ताना डाकू का भारी आतंक था. वह रॉबिनहुड शैली का डकैत था, जो बाकायदा चिट्ठी लिखकर धावा बोलता था. कालीकमली वाले बाबा के पास चढ़ावे की कोई कमी नहीं थी. धनिकों ने उन्हें जी भरकर दान दिया जिसका सारा का सारा सदुपयोग उन्होंने यात्रियों के हित में किया. स्वयं एक खुरदरा सा काला कंबल ओढ़े रहते थे.
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सुल्ताना डाकू को इस बात की भनक लगी तो उसने उनके यहां भी धावा बोला. बाबा ने नकदी और सारे खजाने का ब्यौरा बताते हुए उससे कहा कि यह सब तो ऊपर वाले ने दिया है और धर्म-कारज में ही खर्च होना है. अब तुम्हें ले जाना हो तो ले जाओ. सब ऊपर वाले की मर्जी. बताते हैं कि सुल्ताना डाकू बाबा की निस्पृहता से इतना प्रभावित हुआ कि पांच सौ रुपए चढ़ावा देकर विदा हुआ.
स्वामी विशुद्धानंद ने 33 सालों तक अथक रूप से मानव सेवा का कार्य किया. 1937 में उन्होंने ऋषिकेश में धार्मिक व परोपकारिणी संस्था ‘काली कमली वाला पंचायत क्षेत्र’ की स्थापना की. इस क्षेत्र द्वारा ऋषिकेश,उत्तरकाशी, बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, प्रयागराज आदि स्थानों पर प्रतिदिन हजारों जरुरतमंदों को भोजन कराया जाता है. संस्था द्वारा ऋषिकेश व रामनगर में पूर्ण विद्यालयों का सञ्चालन भी किया जाता है. यहाँ छात्रों के भोजन व आवास की निःशुल्क व्यवस्था है.
1953 में विशुद्धानंद जी कैलाश यात्रा के लिए निकले. इसके बाद उन्हें फिर से नहीं देखा गया. उनके पश्चात् बाबा रामनाथ इस संस्था के उत्तराधिकारी हुए. उनके बाद बाबा मनीराम ने संस्था का कार्यभार संभाला. सत्यनारायण मंदिर को उन्होंने यात्रा मार्ग की पहली चट्टी घोषित किया. उन्होंने एक बड़ा काम यह किया कि संस्था को रजिस्टर्ड कराकर ट्रस्ट बना दिया. संस्था द्वारा कई लोकोपकारी कार्य किए गए-
साधु-महात्माओं के लिए सदावर्त, हजारों व्यक्तियों के लिए भोजन-वस्त्र आदि का दान, ऋषिकेश में कुष्ठ आश्रमों के लिए अन्नदान, गौशालाओं का संचालन, अपाहिज गौऔं की प्राण-रक्षा, ऋषिकेश में पुस्तकालय तथा वाचनालय, संस्कृत विद्यालय, सत्संग भवन, अनाथालय, आत्मविज्ञान भवन, 85 धर्मशालाएं, आठ औषधालय, आयुर्वेद विद्यालय, अनेक मंदिर. बाबा काली कमली वाला पंचायत क्षेत्र ऋषिकेश की एक वृहद् और पुरानी संस्था है.
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उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दूसरी पुस्तक ‘अथ श्री प्रयाग कथा’ 2019 में छप कर आई है. यह उनके इलाहाबाद के दिनों के संस्मरणों का संग्रह है. उनकी एक अन्य पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.
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