हिमालय में रहना कभी आसान नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि यहाँ रहने वाले लोगों ने कभी इसे आसान बनाने की ज़िद नहीं की. उन्होंने पहाड़ को बदलने की बजाय खुद को उसके अनुसार ढाला. शायद इसी कारण हिमालयी समाज में घर, रास्ते, खेत और जंगल सब एक-दूसरे के साथ तालमेल में दिखाई देते हैं. आज जब हम पहाड़ों में हर समस्या का हल बड़ी मशीनों और चौड़ी सड़कों में खोजते हैं, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे पूर्वज और पहले के योजनाकार सच में “कम जानते” थे, या फिर वे बस पहाड़ को ज़्यादा ध्यान से सुनते थे.
हिमालयी क्षेत्रों में पारंपरिक आवासों को बाखली (बाख़ली) कहा जाता था. ये घर आज की तरह ऊँचे, गहरे और संकरे नहीं होते थे, बल्कि फैलाव में चौड़े होते थे — लगभग एक रेलगाड़ी के डिब्बे जैसे. इसका कारण कोई वास्तुशास्त्रीय फैशन नहीं था, बल्कि ज़मीन और ढलान की समझ थी. पहाड़ों में गहराई में जाने वाला निर्माण जमीन पर अधिक दबाव डालता है, जबकि चौड़ा फैलाव उस दबाव को संतुलित करता है. यही कारण है कि बाखली जैसी संरचनाएँ भूकंप, भूमि धंसाव और ढलान खिसकने की स्थितियों में अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती थीं. पत्थर, लकड़ी, मिट्टी और चूने जैसी सामग्री इसलिए नहीं चुनी जाती थीं कि और कुछ उपलब्ध नहीं था, बल्कि इसलिए कि ये सामग्री लचीली थीं और पहाड़ के स्वभाव के साथ काम करती थीं, उसके खिलाफ नहीं.
यही समझ रास्तों और सड़कों में भी दिखाई देती थी. दिलचस्प तथ्य यह है कि हिमालय में ब्रिटिश इंजीनियरों द्वारा बनाई गई कई सड़कें आज भी मौजूद हैं और भूस्खलन से अपेक्षाकृत कम प्रभावित हैं. इन सड़कों की एक सामान्य विशेषता है, वे संकरी हैं, पहाड़ के कंटूर के साथ चलती हैं और ज़रूरत से ज़्यादा कटिंग नहीं की गई है. अंग्रेज़ इंजीनियरों की सीमाएँ अलग थीं. उनके पास आज जैसी भारी मशीनें नहीं थीं, लेकिन इसी सीमा ने उन्हें पहाड़ के साथ समझौता करना सिखाया. वे एक ही जगह पर पहाड़ को ज़्यादा नहीं काटते थे, बल्कि रास्तों को घुमावदार रखते थे ताकि ढलान की प्राकृतिक मजबूती बनी रहे.
इसके ठीक उलट, आज की चौड़ी सड़कें पहाड़ को सीधा काटती हैं. सड़क जितनी चौड़ी होती है, उतनी ही ज़्यादा ऊँचाई और गहराई तक पहाड़ का कंधा हटाना पड़ता है. इससे न केवल ढलान सीधी और अस्थिर होती है, बल्कि प्राकृतिक जलनिकासी भी टूट जाती है. बारिश का पानी, जो पहले धीरे-धीरे बहकर नीचे चला जाता था, अब कटे हुए ढलानों में जमा होता है और वही पानी धीरे-धीरे पूरे पहाड़ को कमजोर कर देता है. यही वह प्रक्रिया है जो भूस्खलन को जन्म देती है.
यूरोप के पर्वतीय क्षेत्रों, विशेषकर आल्प्स में किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि सड़क निर्माण और ढलान कटाई भूस्खलन के सबसे बड़े मानव-जनित कारणों में से एक हैं. यूरोपीय आयोग के Joint Research Centre के अनुसार, जहाँ सड़कें ढलानों के बहुत पास और गहरी कटिंग के साथ बनाई जाती हैं, वहाँ भूस्खलन की घटनाएँ कहीं अधिक पाई जाती हैं. (https://esdac.jrc.ec.europa.eu/themes/landslides)
भारत में उत्तराखंड के ऋषिकेश–जोशीमठ राष्ट्रीय राजमार्ग पर किए गए अध्ययन भी इसी बात की पुष्टि करते हैं. शोध में पाया गया कि सड़क चौड़ीकरण के बाद इस पूरे क्षेत्र में भूस्खलनों की संख्या तेज़ी से बढ़ी. विशेष रूप से वे स्थान अधिक संवेदनशील पाए गए जहाँ ढलानों को सीधा और ऊँचा काटा गया था. (https://nhess.copernicus.org/articles/24/3207/2024/index.html)
इसी तरह, अन्य अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी सामने आया कि पहाड़ की कटाई, भूस्खलन का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, यानी पहाड़ जितना अधिक सड़क के लिए काटा गया, जोखिम उतना ही बढ़ा. (https://www.nature.com/articles/s41598-025-08774-w)
इन वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर यूरोप के कई पर्वतीय देशों ने यह नीति अपनाई कि एक बहुत चौड़ी सड़क बनाने के बजाय; दो या अधिक, संकरी सड़कें और वैकल्पिक मार्ग बनाए जाएँ. इससे पहाड़ पर किसी एक स्थान पर अत्यधिक दबाव नहीं पड़ता, प्राकृतिक जलप्रवाह बना रहता है और किसी एक मार्ग के क्षतिग्रस्त होने पर पूरा क्षेत्र ठप नहीं होता. यह दृष्टिकोण न केवल तकनीकी रूप से व्यवहारिक है, बल्कि पारिस्थितिक रूप से भी अधिक सुरक्षित है.

विडंबना यह है कि हमारे पूर्वज और पहले के योजनाकार बिना आधुनिक शब्दावली और सॉफ्टवेयर के यही बात पहले से समझते थे. उन्होंने घर चौड़े बनाए, रास्ते संकरे रखे और विकल्प हमेशा खुले छोड़े. आज जब विज्ञान उसी दिशा में इशारा कर रहा है, तब असली सवाल यह नहीं है कि चौड़ी सड़कें बन सकती हैं या नहीं — सवाल यह है कि क्या वे हिमालय के लिए सही हैं?
हिमालय में विकास का अर्थ तेज़ रफ्तार नहीं, बल्कि संतुलन होना चाहिए. क्योंकि यहाँ के हर अतिरिक्त कट, हर अनावश्यक चौड़ाई और हर जल्दबाज़ी को, पहाड़ देर से सही, लेकिन लौटाकर ज़रूर देता है.
-डॉ. लता जोशी

मूलतः गंगोलीहाट की रहने वाली डॉ. लता जोशी, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. फ़िलहाल हल्द्वानी शहर में रह ही, डॉ. लता जोशी, काफल ट्री की नियमित सहयोगी रही हैं.
इसे भी पढ़ें : किन हिन्दू ग्रंथों में आता है कैलाश मानसरोवर का जिक्र?
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें


































