हैडलाइन्स

राज्य के सर्वश्रेष्ठ प्रधानाचार्यों में एक महावीर सिंह चौहान नहीं रहे – असामयिक निधन

देहरादून के सर्वाधिक छात्रसंख्या वाले सरकारी माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य का असामयिक निधन हो गया है. बात इतनी-सी ही नहीं है. बात ये है कि प्रदेश के वर्तमान में कार्यरत सर्वश्रेष्ठ प्रधानाचार्यों में से एक महावीर सिंह चौहान का निधन हो गया है. राजकीय इण्टर कालेज हरबर्टपुर में पिछले चार साल से कार्यरत रहते हुए उन्होंने विद्यालय को उस मुकाम पर पहुँचाया जिसे आदर्श का बहुत करीबी कहा जा सकता है. (Dynamic Principal Mahavir Chauhan Passes Away)

राष्ट्रीय स्तर पर कबड्डी और वालीबाल खेल चुके चौहान ने अपना करियर व्यायाम अध्यापक के रूप में शुरू किया था पर उनकी ख्याति ऐकडमिक उपलब्धियों और प्रयासों के लिए अधिक है. विद्यालय अनुशासन हो, सौन्दर्यीकरण या शैक्षिक वातावरण सभी में विद्यालय को उन्होंने अनुकरणीय बनाया. विभाग में सीएसआर के जरिए संसाधन जुटाने की योजना से बहुत पहले ही वे अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से विद्यालय के लिए फंड-रेज़िंग किया करते थे. यही कारण है कि आज ये  विद्यालय पूर्णतः संसाधन-सम्पन्न है. फंड-रेज़िंग में उनकी ईमानदार छवि भी सहायक रही. (Dynamic Principal Mahavir Chauhan Passes Away)

शिक्षणेतर गतिविधियों में भी उनका विद्यालय कहीं पीछे नहीं था. विद्यालय स्तर के साथ-साथ ब्लाक, जनपद व प्रदेश स्तर की शिक्षणेतर प्रतियोगिताओं का भी उनके निर्देशन में सफल आयोजन होता रहा है. शांत और मृदुभाषी चौहान किसी आयोजन की जिम्मेदारी से कभी पीछे भी नहीं हटे. इसके लिए अक्सर उन्हें छुट्टी के दिन भी कार्य करना पड़ता. कल भी जीवन के अंतिम दिन, छुट्टी के बावजूद वो विद्यालय में काम निपटाते रहे. एक ऐसे प्रधानाचार्य के रूप में उन्हें सदैव याद किया जाएगा जिनसे बच्चे, शिक्षक, अभिभावक और अधिकारी सभी प्रसन्न रहते थे. शायद ही कोई हो जो उनके विद्यालय से कुछ न कुछ सीख के न गया हो. (Dynamic Principal Mahavir Chauhan Passes Away)

विद्यालय में गत माह सम्पन्न जनपदीय क्रीड़ा प्रतियोगिता में विजेता छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के साथ दिवंगत प्रधानाचार्य महावीर सिंह चौहान

देहरादून जिले में जहाँ निजी व संस्थाओं के विद्यालय मशरूम की तरह उगते जा रहे हैं एक सरकारी विद्यालय अपनी छात्रसंख्या हजार से ऊपर रोकने में सफल है तो इसके पीछे महावीर सिंह चौहान जैसे संस्थाध्यक्ष का ही योगदान है. गौरतलब है कि आज की तिथि में  देहरादून में मात्र तीन सरकारी माध्यमिक विद्यालय हैं  जिनकी छात्रसंख्या चार अंकों  में है. हजार के आसपास छात्रसंख्या वाले विद्यालयों की अपनी कुछ विशेष चुनौतियां भी होती हैं पर इनके संस्थाध्यक्षों के पास अलग संसाधन नहीं होते, अलग प्रशिक्षण भी नहीं होता यहाँ तक कि इनके हिस्से के उप-प्रधानाचार्य भी इनके पास नहीं हैं. ऐसे में इतने अधिक मानव संसाधन को व्यवस्थित तरीके से नियंत्रित कर अपेक्षित आउटपुट देने का एक ही रास्ता रह जाता है और वो है खुद को तन-मन-धन से समर्पित कर देना. यही दिवंगत प्रधानाचार्य महावीर सिंह चौहान ने भी किया और अच्छी कद-काठी, स्वस्थ शरीर और परोपकारी स्वभाव के बावजूद शिक्षा के महायज्ञ में असमय अपने प्राणों की आहुति दे गए. शिक्षा में, शिक्षा के लिए शहीद होना यही है.

एक सवाल भी यहाँ उठता है कि महावीर सिंह चौहान जैसा प्रतिस्थानी क्या विद्यालय को मिल पाएगा? बिल्कुल मिलेगा अगर पोस्टिंग, दावेदारों की कार्ययोजना और विज़न के परीक्षण के आधार पर की जाए तो. हरबर्टपुर ही नहीं  बल्कि 700 से अधिक छात्रसंख्या वाले सभी विद्यालयों के लिए ऐसा ही किया जाना चाहिए.

आज यमुना-तट कालसी में दिवंगत प्रधानाचार्य के अंतिम संस्कार में ऐतिहासिक भीड़ थी. जौनसार से, पछवा दून से और देहरादून शहर से इतने लोग एकत्र हुए कि सड़क पर जाम लग गया. कहते हैं कि आदमी ने ज़िंदगी में क्या अर्जित किया ये उसके जीवन की अंतिम बेला से पता चलता है. महावीर सिंह चौहान की असमय मौत का सबको अफसोस है. पर ये भी कहा गया है कि मौत वही जिसका ज़माना करे अफसोस…..

अलविदा चौहान सर. जहाँ भी आपकी तैनाती रही आपकी उपस्थिति उन विद्यालयों में सदैव महसूस की जाएगी.

देवेश जोशी

(इनपुट व फोटो भास्कर रावत के सौजन्य से)

इसे भी पढ़ें: रौशनी के बिना शिक्षा की लौ नहीं जलती

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago