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धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’

पिछली कड़ी : सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन

संघर्षनामा का ये किस्सा आजादी के बाद का है. ये हमारे हक-हकूकों के छीने जाने, हमको दिए झूठे आश्वासनों, धोखे और विश्वासघात का किस्सा है. चिपको के समय से ही हम दुनिया भर में स्थापित कर चुके हैं कि हमारा और हमारी प्रकृति का भविष्य अलग-अलग नहीं है. यह छद्म बौद्धिकता के सेमिनारों से उत्पन्न चेतना नहीं बल्कि युगों-युगों से ग्रामीण जीवन शैली का मूल मंत्र रहा है.

मैं, धन सिंह राणा पुत्र श्री लाल सिंह राणा, निवासी ग्राम लाता, जिला चमोली इस किताब के माध्यम से अपने इलाके की युवा पीढ़ी का परिचय क्षेत्रीय जनता के संघर्ष के इतिहास से करवाना चाहता हूं. आज गांव में नौजवान बेकारी का अभिशाप झेल रहे हैं, बहुत सारे शहरों को निकल चुके हैं जो घर में रह गये हैं उनके पास जीवनयापन के सीमित विकल्प होंगे. उनके कामकाज पर दुनिया की नजर होगी. गाँव में लोग क्या उगाते क्या खाते हैं? कितना खाते हैं? खाना पकाने को क्या जलाते हैं? जंगल कितनी बार जाते हैं? क्यों जाते हैं? जैसे सवालों का जवाब लेने सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के लोग आते हैं. परियोजनाएँ बनती हैं, डूबती हैं और फिर उनके डूबने पर खोजबीन होती है. हमारी पीढ़ी ने ऐसे कितने षडयन्त्रों को झेला है. हम सब एक बड़े रिश्ते से जुड़े हैं, जमीन के रिश्ते से. इसलिए जब गांव के लोग अपने हक की लड़ाई में जुटे हों तो यह हमारी सामूहिक चिंता का विषय होना चाहिए. मैं उस पीढ़ी से हूं जिसने चिपको आंदोलन भी देखा और धीरे-धीरे कसते हुए सरकारी अजगर को अपने अस्तित्व को निगलते हुए भी महसूस किया.

मैंने अपने जीवन में अनेक पापड़ बेले हैं. अभियान दलों में पोर्टर बन कर अपना खून-पसीना बहाया. गाइड-मेट लोगों की गुलामी झेली तो गांव में खेती बाड़ी भी संभाली. युवक मंगल दल का अध्यक्ष रहा और अब लाता गांव का प्रधान हूं. कविताऐं लिखना, गीत गाना और सांस्कृतिक कार्यक्रम वगैरह ही ऐसे विषय हैं जिनमें शामिल होना मैं दिल से पसंद करता हूं. बाकी रहा झपटो – छीनो का संघर्ष, तो मेरी ही नहीं बल्कि मेरे इलाके के लोगों की परिस्थितियां ही ऐसी रहीं जिन्होंने हमें संघर्ष का रास्ता अपनाने पर मजबूर कर दिया.

चिपको के आम सिपाहियों के लिए चिपको आंदोलन एक किस्सा भर रह गया है. अब जमीनी परिस्थितियां इतनी तेजी से बदली हैं कि जरुरत चिपकने की नहीं बल्कि छीनने और झपटने की पड़ गई है. “झपटो-छीनो” आंदोलन वस्तुतः चिपको का व्यावहारिक पक्ष है. जरुरी हो जाता है कि चिपको के जमीनी इतिहास को समझा जाए और इसके नायक /खलनायकों को भी जाना जाए.

अक्टूबर का महीना था, साल 1973. तब मैं 15 बरस का था. अपने गांव के चबूतरे में मैं अपने दोस्तों पुन्ना, रैणु, रघु, लखणु के साथ और भी बहुत के साथ मुर्गा झपट खेल रहा था. शाम हो चली थी. तभी कुछ लोग आए और अपने हाथ में पकड़े कुछ पर्चे हम बच्चो को भी दे दिए. चैलेंजर माइक जिसके हाथ में था उनका नाम कामरेड गोविन्द सिंह था. पर्चे पर एक गढ़वाली गीत छपा था:

“चिपका पेड़ों पर अब ना काटण द् या 

पहाड़ों की सम्पति अब ना लूटण द् या 

ठेकेदार -मालदार पैसा कमोंदा 

पहाड़ों का छोरा भांडा मजोंदा “

माइक से अब गोविन्द सिंह की आवाज आ रही थी कि गांव है, घास है जहाँ झाड़ियां हैं पेड़ है पानी है जानवर है. जब तक जंगल है समझो सब कुछ है. सरकार हमारे जंगल बेच रही है. ठेकेदार-मालदार इन्हें काट धन बटोर रहे हैं और हमारे लोग उनकी मजूरी कर रहे.उनका माल बोक रहे.पानी ढो रहे. उनके बर्तन मांज रहे. हमें इन जंगलों को बचाने के लिए एक हो जाना है. तब तक लड़ाई लड़नी है जब तक यह ठेकेदारी बंद न हो जाए.

ये भाषण सुन मैं डर सा गया. मैं जंगलों को देखता और अपने दिमाग की तस्वीर में बिना जंगलों के नंगे पहाडों की तस्वीर बनाता और डर जाता. अपने से अकेले में बात करता “बिना जंगलों के तू रहेगा कैसे धौनु? गाय चराने जाएगा तो झूला कहां डालेगा? और जब बारिश होगी तो किसके नीचे खड़ा हो भीगने से बचेगा? मुझे तो अपनी घरवाली की भी चिंता हो गई कि ऐसे में वह घास काटने कहाँ जाएगी. और फिर जब मैं अपना मकान बनाऊंगा तो लकड़ी कहाँ से आएगी. और मेरे जो बच्चे होंगे उनका क्या होगा?

फरवरी के महीने की शाम थी, साल 1974. गांव लमताल. वही चैलेंजर माइक की आवाज. लड़कों की टोली के साथ गोविन्द सिंह और उनके साथ श्री चंडी प्रसाद भट्ट, सुदर्शन कठैत, हयात सिंह फरकिया और कामरेड सुदामा. सब इन्दर सिंह मालगुजार के घर पहुंचे. हम लड़कों से कहा कि जाओ ग्राम प्रधान जगत सिंह और महिला मंगल दल की अध्यक्षा मँगुली देवी को बुला कर लाओ और गांव वालों को भी. सब लोग जमा हो गये तो गोविन्द सिंह जी ने जानकारी दी कि कल रैणी इलाके में एक बड़ी बैठक होगी. सबको उसमें आना होगा.

भल्ला ठेकेदार भी होगा वहाँ और उसकी लेबर भी. जिनमें हिमाचली भी थे जिन्हें दो लोग आदेश दे रहे थे. कुछ समझा जता रहे थे और चेहरे उनके डरावने थे. दोनों ने लाल कुरता पयजामा पहना था. ऊपर काली वासकट और कमर पर कसा लाल दुपट्टा. सर पर लाल तुर्रेदार पगड़ी बँधी थी और चेहरे पर दाढ़ी मूछ. भल्ला ठेकेदार का माल ला रहे थे उसके कारिंदे और तल्ली रैणी वालों के घर में भर रहे थे. कुछ सामान मोटर रोड पर तिरपाल से ढका जा रहा था. तमाम हरकत मल्ली रैणी के बासिंदे देख रहे थे कि कैसे स्वार्थ अपनी जड़ जमा रहा, ठेकेदार के आगे बिक रहा. कामरेड सुदामा सिंह ने कहा कि हमें ठेकेदार की लेबर व उनकी हरकतों पर नजर रखनी होगी. यह आंदोलन रैणी गांव से आरम्भ होगा जिसका नेतृत्व करेंगी गौरा देवी. सब खबर कामरेड गोविन्द सिंह को जाती रहेगी. जिम्मेदारी मिली क्षेत्र प्रमुख गोविंद सिंह व हयात सिंह कांग्रेसी कार्यकर्ता , तपोवन के प्रधान वास्वानंद नौटियाल, कामरेड सुदामा सिंह, सुदर्शन सिंह, फते सिंह रावत, कुंदन सिंह रावत, दिलीप सिंह कुंवर और सर्वोदय कार्य कर्ता चंडी प्रसाद भट्ट को.

26 मार्च 1974 वह यादगार तारीख रही जब गौरा देवी के नेतृत्व में चिपको का मोर्चा खुला था जिस दिन उनके साथ गाँव की औरतें थी. गोमती देवी, ऊखा देवी, पुसूली देवी, हरकी देवी, भट्टी देवी, रुपसा देवी, चंद्री देवी, इंद्रा देवी, नागी देवी, उमा देवी, फागुनी देवी, भादी देवी, बाटी देवी, मूसी देवी, गौमा देवी और नौरती देवी के साथ जमघट. रैणी नाम का वन विभागीय इलाका जो चमोली जोशीमठ में पड़ता है. जोशीमठ से अठारह किलोमीटर पर बसा है, एक छोटा सा गांव रैणी पांगी जहां से गुजरते लोग बागों ने सोचा भी न होगा कि एक दिन यह गाँव पूरे देश में मिसाल बन जायेगा. इस गांव की पहाड़ के कष्ट झेल अपने जीवन को जीती अनपढ़ महिलाओं ने स्वतः प्रेरणा से ऐसे साहस और जीवट का परिचय दिया कि अनहोनी हो गई. वह दिन 12 फरवरी 1974 का था. दोपहर के समय अचानक गांव की औरतों ने देखा कि बहुत सारे लोग, वन विभाग के एक अधिकारी के साथ आरे कुल्हाड़े लिए उनके जंगल की ओर बढ़ रहे हैं. अपने सुख दुख के साथी पेड़ों के खतम हो जाने की झसक से वह कांप उठीं. उनके आगे आगे चलने वाली गौरा देवी ने ठान लिया कि इन लोगों को जंगल में घुसने ही नहीं देना है. गौरा देवी और उनके दल ने जंगल का रास्ता रोक दिया. वन अधिकारी और साथ चल रहे मालदार-ठेकेदार के मजदूरों की तमाम जोर जबरदस्ती के बावजूद वह अड़ी रहीं. भल्ला ठेकेदार ने चार लाख इकहत्तर हज़ार रूपये में बोली लगाए दो हज़ार पांच सौ कैल आदि के पेड़ों को काटने के लिए मजदूर भेज दिए. साजो सामान पहुंचा दिया. 7000 फिट की ऊंचाई पर भू स्खलन से पीड़ित इन गाँवों के बासिंदो ने 9000 फिट की ऊंचाई तक फैले जंगल को पूँजीपतियों से बचाने व आजीविका के लिए यहाँ के कच्चे माल का यहीं उद्योग धंधे खोलने की मांग कर धरना प्रदर्शन शुरू कर ही डाला था. स्त्री शक्ति का प्रदर्शन इस आंदोलन का मुख्य अंग बना जिसके चलते ठेकेदार मालदार के आदमी पेड़ों पर हथियार लगाने में सहम गये. पेड़ काटने वाले दल को पेड़ पर घात लगाने से पहले अपनी पीठ पर कुल्हाड़ी चलाने के लिए कह डाला. कुछ भी हो देवदार, सुरई, रांगा-फर, थुनेर का जंगल नहीं कटेगा. पेड़ों पर चिपको, कटने न दो. हार कर जंगल के लुटेरों को वापस लौटना पड़ा. महिलाओं के साहस ने न केवल अपने जंगल को व्यापारी की गिद्ध दृष्टि से बचाया, बल्कि वनों की लूट और वनवासियों के हकों के खातिर शुरू हुए चिपको आंदोलन को अनूठी पहल बना डाला. उसके बाद तो सारे पहाड़ में चिपको की धूम मच गई.

धरना मेला चलता रहा जिस दिन असली खेला हुआ तब सिर्फ गांव की औरतें जंगल में थीं जिनने सीधी टक्कर दी सरकार बहादुर के साथ ठेकेदार भल्ला के बाहु बलियों को. अप्रैल 1974, बिख़ौती का दिन. मेला धूम धाम से चल रहा था. इनके बीच खुखरी बांधे लाल कपड़ों में ठेकेदार का एक मुंशी अकड़ दिखाता घूम रहा था ढाक गांव के पधान जगत सिंह करणी से यह सहन न हुआ. लपक के उन्होंने उस मुंशी को वहीं पटेल दिया और गले से पकड़ घसीटते हुए गाँव के चौक पर ले आए जहाँ मुखौटा नृत्य चल रहा था. इन मुंशियों से सब चिढ़े रहते थे जो गांव की सभाओं में आ अपने आकाओं के लिए खुफिया गीरी करते थे. गोविन्द सिंह ने जब यह देखा तो मुंशी को लोगों के गुस्से से बचाया और कहा हमारी लड़ाई बहुत बड़ी है इससे हमारा क्या झगड़ा ये बिचारा तो अपना पेट पालने यहाँ आ रखा है. हमारे भीतर इतनी हिम्मत रहे कि सरकार की काली करतूतों के बारे में आवाज उठाएं और एकजुट हो डटे रहें. अब तो भल्ला के कारिंदे हमें खरीदने भी आने लगे हैं, रुपयों से भरा बैग ले कर. हम मर तो सकते हैं पर बिक नहीं सकते. ठेकेदार के आदमियों से जो गाँव खाली नहीं किया तो आंदोलन हिंसक हो सकता है.हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं. अगर अपने खातिर हमारे पेड़ों पर कुल्हाड़ी मारोगे तो हम भी तुम्हें न छोडेंगे. गोविन्द सिंह की चेतावनी से चिरानी लेबर भयभीत हो गये. 25 अप्रैल से पहले वो गांव खाली कर गये.

औरतों की अगुवाई करने वाली गौरा देवी की जिद व अड़े रहने की मति के पीछे उनके बीते दिनों के कष्ट थे जिन्होंने उन्हें पहाड़ सा ही कठोर व दृढ़ बना डाला था. उनके पति मेहरबान सिंह की भरी जवानी में मौत हो गई थी, तब वह सिर्फ बाइस साल की थीं और गोद में था ढाई साल का चंद्र सिंह. 

रेणी के ऐतिहासिक “चिपको” वन बचाओ आंदोलन ने उत्तरप्रदेश सरकार को वन नीति बदलने को बाध्य किया. अवैध कटान और लीसा गढ़ान ठेकेदारों द्वारा निर्मम रूप से किया जा रहा था उसे पूरी तरह बंद कराना होगा. यहाँ वन आधारित उद्योगों को कच्चा माल मिले. वनों के अंधाधुंध कटान से हर बरस बाढ़ और कभी भीषण सूखे से करोड़ों रूपये की क्षति होती है इसलिए नदियों के जलागम क्षेत्र से वनों का कटान बिल्कुल न हो. पर ऐसा कुछ न हुआ. चिपको की लड़ाई हम जीत कर भी हार गये. भल्ला से बड़ा और विचित्र कानूनों से लैस हो कर वन निगम हमारे यहाँ डाका डालने आ गया. बरस 1982 में नंदा देवी के नेशनल पार्क बनने के बाद हमारे चौमासे की छानियां हमसे छीन ली गईं. हमारे पारम्परिक भेड़ व्यवसाय को जड़ से खतम कर दिया गया. दुबड़ी देवी को पूजने की सदियों से चली आई परम्परा को बंद करवा दिया गया. लाटू का निशाण खड्ग चोरी हो गया. यूँ हमारी आँखों में धूल झोंकने के लिए सरकार ने कुछ वादे भी किये पर इस आड़ में हमारी एकता को तोड़ डालने के लिए निजी स्वार्थी तत्वों को बढ़ावा दिया गया. इन हमलों में चिपको से जन्मे कुछ महंत भी सरकार में शामिल हो गये. गोविन्द और गौरा की मृत्यु का कारण चिपको की हार थी. 

भल्ला की लेबर के वापस लौट जाने के बाद हम सोचते थे कि अब हमारा जीवन अमन चैन से कटेगा लेकिन जन संघर्ष के मंथन से निकले “चिपको” के अमृत को दानव पी गये और उन्होंने दोगुने जोश के साथ हमारे ऊपर फिर हमला बोल दिया.

मैं, धन सिंह राणा पुत्र श्री लाल सिंह राणा कोई अपने शौक से इस संघर्ष में नहीं कूदा. मैं और मेरे जैसे नंदा देवी के हजारों निवासियों के सामने दो ही विकल्प थे. पहला विकल्प तो यह था कि जो हो रहा है होने दो. वन विभाग के भ्रष्ट आचार में शामिल हो जाओ. अधिकारियों बिचौलियों को माँ नंदा का खजाना खाली करने दो. यानी अपने अस्तित्व का आधार अपनी आँखों के सामने मरते हुए चुप चाप देखते रहो या फिर इसका विरोध करो और आज संघर्ष करते हुए अपने भविष्य के के लिए लड़ो. हमने तय किया कि हम लड़ेंगे, हम भले आज ऐसे रह जाएं लेकिन हम अपने बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न होने देंगे.

दरअसल हम एक बहुत बड़े षडयंत्र के शिकार बने हैं हमारे हक-हकूक छीने गये, परंपरागत व्यवसाय ध्वस्त किए गए वह इतना बड़ा नुकसान नहीं है जितना कि हमारे सोचने विचारने के मानवीय गुणों का खत्म किया जाना है. कभी नीचे शहरों में जाता हूं तो यह जान कर ऑंखें फटी रह जाती हैं कि ऐसे कितने लोग हैं जो चिपको का बिल्ला लगाए घूम रहे हैं. मैं कहता हूं कि हम तुम्हारे सतही ज्ञान से तंग आ चुके हैं. तुमने हमारे साथ ही नहीं बल्कि हमारे देश के आदिवासियों -ग्रामीणों को सताया है. अंग्रेजों के दमन व शोषण की परम्परा को जारी रखा है. ऐसे पर्यावरण विद व वैज्ञानिक जनता के हितों के खिलाफ नीति बनाने के दोषी हैं.

बरस 1982 में हमारे इलाके को नेशनल पार्क बना दिया गया. 1974 में जो विभाग पुलिस-पीएसी के बल पर हमारे जंगलों को काटने पर तुला था व जिसके लिए जंगल सिर्फ टिम्बर था वह अब जैव-विविधता की बात करने लगा. 16 नवम्बर 1982 को पार्क की स्थापना की विज्ञप्ति शासकीय गजट में प्रकाशित हुई और जून 1983 में उप-वन संरक्षक एच. सी. रायजादा ने हम लोगों को एक पत्र द्वारा पार्क गठन की सूचना व प्रतिबंधों की सूची भी दी. आश्वासन दिया गया कि प्रतिबंधों से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए सरकार अनेक योजनाएं चलाएगी. दिलचस्प बात तो यह है कि चिपको के सिपाहियों से प्रकृति संरक्षक की भूमिका छीन ली गई और सारा जिम्मा उस काले चोर वन विभाग ने ले लिया.

नंदा देवी क्षेत्र में पर्यटन पर प्रतिबंध से पूरे इलाके का रोजगार छिन गया. सबसे ज्यादा क्षति लाता वासियों की हुई. हमारे चौमासे की छानियां हमसे छीन ली गईं. धार्मिक उत्सव बंद करा दिए गये. देवी का खड़ग निशाण तक गायब हो गया. इस इलाके में हरिजनों के पास जमीन न के बराबर थी. हस्तकौशल, काष्ट कला व रिंगाल उद्योग को जड़ से खतम करने का संकट आन पड़ा. परंपरागत पेशों को खतम कर सुनिश्चित रोजगार के नाम पर अफसर व बाबू लोगों के खाने पीने पचाने का नया धंधा खुला. बिचौलियों और शिकारियों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ. अब कोई रोकटोक न रही तो उन्होंने संरक्षित क्षेत्र को आखेट स्थल बना डाला. राष्ट्रीय पार्क का ताना बाना हमारे पुर्नवास के लिए मिले विदेशी कर्जे को हड़पने में मशगूल हो गए. जिसने भी मुंह खोला उसे छोटा मोटा ठेका दे बहला-फुसला लिया जाता. वन विभाग और बिचौलिए दिन रात फलते फूलते रहे. नंदा देवी का कोर क्षेत्र अवैध शिकारियों का संरक्षित क्षेत्र बन गया जहाँ वन्य जीवों का संहार बेरोकतोक होते रहा. कोई पूछ नहीं. बरस 1986 में जो शिकारी पकड़े गए उनका क्या हुआ? बरस 1993 में प्रतिबंधित क्षेत्र में जो हजारों की संख्या में फांसी के फंदे पाए गए वह किसकी शह पर लगे? बरस 1997 में जिन 16 शिकारियों को तोलमा के जंगल से पकड़ स्थानीय लोगों ने वन विभाग को सौंपा वह न्यायालय से कैसे छूट गए? जनवरी 2000 में भिटारतोली के जंगलों में आग कैसे लग गई?

दुनिया भर के लोग न जाने कौन, कब और कहां से पैसा ले, गले में कैमरा लटकाये हम पर शोध करने हमारे इलाके में आ धमकते. एक राष्ट्रीय अखबार की पत्रकार महोदया ने तो यह लिख डाला कि नीति घाटी में रहने वाले तमाम भोटिया समुदाय के लोग अवैध शिकारी हैं और चरस की तस्करी करते हैं. लाता, रैणी, पैँग व तोलमा जहाँ दो दशकों से जनविरोधी नीतियों का विरोध हुआ उन्हीं को माफियाओं का गढ़ बना दिया गया. पार्क बनने के बाद कोर क्षेत्र में जब शिकारियों ने अपने डेरे जमा दिए तो जंगली जानवरों का आतंक सीमांत ग्रामों में बढ़ने लगा. भालू आने लगे. गांवघरों में पली मधुमक्खी के छत्तों के लालच में भालूओं ने अनेक मकान उधेड़ दिए. 1998 में लाता में ही भालूओं ने अनेक गौशाला तोड़ गाय, बैल व बकरियों को मार डाला. वन विभाग से गांव वालों को टका सा जवाब मिला कि भालू ने जो नुकसान किया उसके मुआवजे का प्रावधान नहीं है. ऐसा करते हैं कि भालू का बाघ बना देते हैं.

सरकारी झूठ के दलदल में फंस जाने का एहसास पक्का हो गया. 31मई 1998 को ग्राम सभा की बैठक में तय हुआ कि अब अगर सरकार समस्या नहीं सुलझाती तो 15 जुलाई 1998 को प्रतिबंधित कोर जोन में प्रवेश कर 1982 की अधिसूचना को रद्द कर एक तरफ़ा जन कार्यवाही के जरिये अपने हक -हकूकों को फिर हासिल किया जाए. वन विभाग की धोखेबाजी के खिलाफ बरसों का दबा आक्रोश एकाएक विस्फोट में बदला और “झपटो-छीनो” आंदोलन ने जन्म लिया. संघर्ष मोर्चा बना. सरकार को ज्ञापन भेजे गए पर कोरा आश्वासन भी न मिला. अखबारों में विस्तार से रिपोर्ट छपने लगीं तो कुछ अधिकारी बहलाने फुसलाने को आऐ. जनता ने उन्हें बैरंग लौटा दिया. हमारे सोलह वर्षों के धैर्य व अहिंसक आंदोलन के जवाब में सरकार ने हथियार बंद पी. ए. सी की टुकड़ियाँ भेज दीं. 15 जुलाई 1998 को लाता से आगे लाठी खर्क तक इनका जमावड़ा हुआ. इन सब के पीछे घर के भेदी भी थे जिनके अपने स्वार्थ अपने राग थे. लाठी खर्क की दिशा से गिरते पड़ते उल्टी करते पी.ए.सी की हथियार बंद टुकड़ियाँ हाई एलटिटयूड सिकनेस से जान बचाते वापस लौटने को मजबूर हो गयीं.

लाठी खर्क में विशाल जन सैलाब देख वन विभाग आश्चर्यचकित था. उनका संदेश आया कि हम तुम्हें रोकने का प्रयास करेंगे तुम हमारी बात का उल्लंघन कर देना. इससे हमारी नौकरी बचे रहेगी और तुम लोगों के कोर जोन में जाने का रास्ता खुल जाएगा. बस इतना नाटक कर देना. लोग भड़क गए. यह अस्तित्व रक्षा का संघर्ष है और इन्हें नाटक करने की सूझी है. वन चौकी का घेराव कर कर्मचारियों को खदेड़ दिया गया. आगे बढ़े, 17 जुलाई को कोर जोन पहुँच देवी की पूजा कर संकल्प लिया कि वन और जन की सुरक्षा के लिए यह आंदोलन जारी रहेगा. आगे 7 सितंबर 1998 को जोशीमठ में रैली हुई. मार्च 1999 में लच्छीवाला में अखिल उत्तराखंड स्तरीय कार्यशाला में समस्त संरक्षित क्षेत्रों की जनता को अपना एक मंच बनाने पर बात बढ़ी. 20 जून 1999 को लाता में संरक्षित क्षेत्रों के प्रतिनिधि जुटे. 10 जुलाई को के राम सिंह रावत ने गोविंद पशु विहार में उत्तराखंड के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ शोध छात्र भी संरक्षित क्षेत्रों की जन समस्याओं में रूचि रखने लगे. प्रेम बहुखंडी ने दुगड्डा खाल, द्वारीखाल और यमकेश्वर विकास खंडो में नरभक्षी बाघों के आतंक पर बैठकों का आयोजन किया. विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बुलाई गई बैठकों से जहाँ मेरा ज्ञान बढ़ा वहीं यह महसूस भी हुआ कि ये संस्थाऐं हमारी भूमिका को सिर्फ कार्यशालाओं तक ही समेट देना चाहतीं हैं. इससे आगे इन्हें हमारी जरुरत नहीं है और हमारा प्रतिनिधित्व भी ये खुद करना चाहते हैं. क्योंकि यदि प्रभावित जनता अपना प्रतिनिधित्व खुद करने लगेगी तो इन संस्थाओं को कुछ करने को बचेगा नहीं. 

मेरा सवाल यह भी है कि दशकों से ये हमारी लड़ाई का अलग अलग मंचो पर नेतृत्व करने वाले बन रहे हैं. इतनी ताकत अगर ये प्रभावित जनता के नेतृत्व के सशक्तिकरण पर लगाते तो यह लड़ाई कब की जीत ली गई होती.. हम तो अपने अस्तित्व की रक्षा की लड़ाई लड़ रहे और चाहते हैं कि यह संघर्ष जल्दी से जल्दी खत्म हों. पर जिनके लिए संघर्ष ही धंधा हो वो भला क्योंकर अपनी दुकान बंद करना चाहेंगे. हम इनके अलग अलग खेमों की भेड़ नहीं बने रहना चाहते. हम एकजुट हो कर अपने संघर्षों को मंजिल तक पहुँचाना चाहते हैं और उन सब महानुभावों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं जो हमारी एकता में आड़े आ रहे हैं. अपनी रोजी रोटी के नाम पर हमारे संघर्षों का बंटाधार मत करो.

ऐसी कई साजिशें बेनक़ाब हुई जिनके कर्ता धर्ता बड़े प्रतिष्ठित लोग रहे. ये लोग यहाँ की नदियों, पर्वतों, बुग्यालों और जीव जन्तुओं से रिश्तेदारी का अति प्रचार प्रसार करते चले आऐ हैं पर यहाँ रह रहे हम ग्रामवासियों को ऐसे देखते हैं जैसे कसाई बकरे को देखता है. हमारे प्रति इनके दिलों में कहीं कोई फांस तो है ही. इन्हें लगता है कि हम दशकों से इनकी बक्शीश पाने के लिए इनके इशारे पर नाचते आऐ हैं. आज भी ये उसी सामंती युग में जी रहे हैं और हमें पर्यावरण का शत्रु बता यहाँ से बेदखल करना चाहते हैं ताकि इनकी कंपनियां अपने पद और ऊँचे सम्पर्कों के बूते हमारे पहाड़ को कब्ज़ा सकें.

मई 2001 में राज्य सचिवालय ने मुझे सूचना दी कि नंदा देवी को पुनः पर्यटन के लिए खोलने के लिए हरीश कापड़िया के नेतृत्व में एक अभियान दल हमारे इलाके में आ रहा है और हमें इन्हें यथासंभव सहयोग देना है. उनसे बातचीत हुई, ग्राम सभा लाता द्वारा पास किए लेबर रेट को उन्होंने स्वीकार किया.नंदा देवी के मंदिर में 3 जून 2001 को उनका स्वागत सत्कार किया गया. अभियान दल को स्थानीय समस्याओं से अवगत कराने का ज्ञापन तैयार किया गया. मैंने कापड़िया जी को नीचे सड़क पर ही ग्राम सभा की नियमावली देते हुए ग्राम सभा के रजिस्टर में पंजीकरण करने को कहा तो वह उत्तेजित हो गए और कटुता का माहौल पैदा हो गया.

सबसे पहले तो हरीश कपाड़िया जी ने कह दिया कि वह ग्रामीणों की समस्याएं सुनने नहीं आ रहे हैं बल्कि नंदा देवी कोर जोन का अध्ययन करने आ रहे हैं और अगर उन्हें सहयोग न दिया गया तो वह हैलीकाप्टर से भी जा सकते हैं. हमारे ही बीच के कुछ दलाल अपने लालच में घिर उन्हें दूसरे रास्ते से नंदा देवी कोर जोन में पहुंचा देने की चाटुकारिता भी करने लगे थे. पर वहां मौजूद अलग अलग गाँवो के लोग ग्राम सभा लाता द्वारा पास की गई नियमावली को मानने के लिए प्रतिबद्ध रहे. मैंने श्री कापड़िया से साफ कहा कि वह ऊँची पंहुच वाले हैं और केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए हैं अतः जोशीमठ फोन कर पुलिस बुला सकते हैं पर ग्राम सभा लाता उन्हें अपने इलाके में ग्राम सभा की परम्परा और नियमों के अनुसार ही जाने देगी. ग्राम सभा को शुल्क देने को वह तैयार न हुए कहने लगे कि इससे कई गुना अधिक रकम वह नंदादेवी मंदिर को दान कर देंगे. हमने तर्क दिया कि माँ नंदा को तुम्हारे पैसे की जरुरत नहीं है. आप संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन से परिचित नहीं.अब नवीन पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम सभाओं का सशक्तिकरण किया जा रहा है. वह हमसे पुराने जमाने की अपेक्षाऐं कर रहे थे कि जब वह पहले यहाँ आऐ थे तो ग्रामीण उन्हें लेबर-मजदूरी के लिए सलाम करेंगे. 

आखिर में उन्होंने ज्ञापन उस पर लिख दिया कि बिना पढ़े प्राप्त किया और 2500₹ कि शुल्क राशि देते हुए टिप्पणी भी लिखी कि यह दान के रूप में दी रकम है. हम ग्रामीण यह मानते रहे थे कि नंदा देवी क्षेत्र में रोक अनियंत्रित पर्यटन व पर्वतारोहण के कारण लगा है. वो ही पर्वतारोही वैज्ञानिकों का भेष धर अब नए खेल खेलने आ रहे हैं. यहाँ प्रतिबंध लगा तो ये लोग अपना शौक पूरा करने दूसरे क्षेत्रों में चले गए और परंपरागत पेशों पर जो कुठाराघात हुआ उसने स्थानीय आबादी के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा कर दिया. अब ग्राम सभा की नियमावली से इनका स्वाभिमान छटपटा रहा है. आगे भी इन्होने अभियान दल के स्थानीय पोर्टर कुलियों को बहुत परेशान किया.यहाँ तक की सामान ढो रहे कुलियों के आने तक विकट रास्तों से रोप निकाल दी गई. भुजगढ़ा में इससे हंगामा हो गया. अभियान दल के सदस्यों के बीच भी झगड़ा-फसाद चलता रहा.

हम तो यह मान कर चल रहे थे कि यह कोई उच्च स्तरीय अध्ययन दल है पर भारतीय वन्य जीव संस्थान के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने इस दल के सदस्यों की जाँच कर इन्हें पर्वतारोहियो तथा ट्रेवल कंपनियों का प्रतिनिधि करार दिया. इस दल के गठन की सारी प्रक्रिया ही संदेहास्पद रही. मात्र दो हफ्तों के बीच में ही इस दल को पता नहीं किसने और कैसे मंजूरी दिला दी. जब दल लौट आया तो एक सदस्य श्री रुपिन डांग ने अपनी फिल्म कंपनी के माध्यम से इंडिया हैबिटैट सेंटर में नंदा देवी पर स्लाइड शो व ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में हैली स्कीइंग पर फिल्म दिखाई जो बर्फ़ानी बाघ की प्रतिबंधित स्थली है. हमने सवाल उठाया कि वह इलाके का अध्ययन करने गए थे या अपनी फिल्म कम्पनी के लिए व्यापारिक दृष्टि से फिल्म बनाने? फिर इस दल के कथित वैज्ञानिक सदस्यों का चयन किसने किया? यहाँ मैं श्री चीवांग मोटुप का नाम लेना चाहूंगा. जब यह दल नंदा देवी क्षेत्र के अध्ययन पर गया तो अमेरिका व ब्रिटेन की एक बड़ी ट्रेवल कंपनी ने इंटरनेट पर यह विज्ञापन देना शुरू किया कि भारत सरकार शीघ्र ही नंदा देवी क्षेत्र पर लगे प्रतिबंध को हटाने जा रही है तथा के. ई. एडवेंचर को नंदा देवी में पर्यटन कराने के लिए अधिकृत किया जाता है. कंपनी सन 2002 के बसंत में नंदा देवी में ट्रैक आयोजित कर रही है. चीवांग मोटुप इसी कम्पनी के भारतीय प्रतिनिधि रहे. साफ पता चलता है कि हरीश कापड़िया के तथाकथित अध्ययन दल के रवाना होने से पहले ही दल की संस्तुतियां लिखी जा चुकी थीं और भाई लोग ऊपर ही ऊपर मलाई का हिस्सा लगा भी चुके थे. इस चोरी के बाद भी सीनाजोरी यह कि हम पर और हमारी राज्य सरकार पर यह एहसान भी जता रहे कि पर्यटन द्वारा हमारे क्षेत्र का विकास होगा जबकि हमारी भूमिका सिर्फ पोर्टर तक ही सीमित रखी गई थी. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ये लोग वास्तव में हैं कौन, जो हमारा भविष्य तय करना चाहते हैं और हमारे भविष्य को नीलाम करने की इन्होने क्या कीमत वसूल करनी चाही.

नंदा देवी क्षेत्र जो गढ़वाल-कुमाऊं की सर्वोच्च आराध्य स्थली है में अनियंत्रित पर्यटन के कारण वर्ष 1982में पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया था. स्थानीय जनता की आय बंद हुई, पार्क क्षेत्र में धरांसी, दुबड़ी घेर में स्थित लाता निवासियों को पारम्परिक छानियां भी छोड़नी पड़ी. दुबड़ीघेर में स्थित दुबड़ी देवी को नंदाष्टमी पर चढ़ाए जाने वाले फूलों की परम्परा भी बंद हो गई. कुल मिला कर गाँववालों को अपनी धार्मिक  व लोक थात से जुड़ी परंपराओं से काट दिया गया.

1962 के बाद भारत-तिब्बत व्यापार बंद होने के बाद यहाँ की भोटिया जनजाति समुदाय की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी. सरकार द्वारा पार्क से विस्थापन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए जो योजनाएं चलाई जाती रहीं वह भ्रष्टाचार की अंधेरगर्दी से भरी हैं. अब बड़े औद्योगिक घरानों व कुछ पर्वतारोहियों के निहित दबाव व स्वार्थोँ के चलते दो दशक की स्थानीय यातना झेलने के बाद नंदा देवी बायोस्फेयर रिजर्व को फिर से खोलने की बात चल पड़ी है. ऐसे में नंदा देवी को पर्यटन हेतु खोला जाए तो स्थानीय जनता को उनकी चौमासे की छानियां भी वापस दी जाएँ. ऐसा इसलिए कि नंदा देवी प्रतिबंध अनियंत्रित पर्यटन के कारण लगाया गया था न कि स्थानीय निवासियों की पारिस्थितिकी परक जीवन शैली के कारण. पर्यटन से हुए विनाश के कारण लगाए गए प्रतिबन्ध का सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय निवासियों पर पड़ा है.

एकांतिक वैज्ञानिक संस्तुतियों को आदिवासियों पर थोपने का यह पहला उदाहरण नहीं है. प्रकृति पुत्र आदिवासियों की पारिस्थितिकी परक जीवन शैली को प्रकृति विरोधी बताने व उनके पारम्परिक हक -हकूकों को छीनने की कार्यवाही आज भी जारी है.ऐसे प्रतिबंध के कारण स्थानीय जनता पर पड़े व्यापक प्रभाव का भी व्यापक अध्ययन होना चाहिये ताकि अभिशाप झेल रहे आदिवासियों को न्याय मिल सके. प्रकृति पर हमारी पूर्ण आत्मनिर्भरता रही तो प्रतिबंधों से हमारी पूरी अर्थव्यवस्था, हमारा आहार, हमारी औषधि -जड़ी बूटियां, हमारा भेड़ व्यवसाय, ऊन का परंपरागत धंधा, हमारा हस्तशिल्प और हमारा पारम्परिक ज्ञान सब इतिहास बन गया.

हम जनजाति समुदाय से हैं पर इतने अनजान नहीं कि नंददेवी बायोस्फेयर रिज़र्व के पर्यटन हेतु खुलने से व्यवसाय के आर्थिक पक्ष को न समझते हों. इसके खुलने से पूरी दुनिया के पर्यटक हमारे इलाके में आएंगे. विडंबना तो यह है कि पर्यटन व्यवसाय पर एकाधिकार करने वालों की नजर में हमारी हैसियत बोझा ढोने वाले कुलियों -मजदूरों से अलग कुछ भी नहीं है. पर्यटन के द्वारा अर्जित धन जितना महत्वपूर्ण है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हमारी दृष्टि में उस धन का बंटवारा है.

हमारी आराध्य नंदा देवी के पवित्र क्षेत्र को पारिस्थितिकी पर्यटन की दृष्टि से समुन्नत किया जाए ताकि स्थानीय जनता की इस भू भाग के संरक्षण व पर्यटन में पूर्ण भागीदारी हो. अपनी प्रदेश सरकार, स्वयं सेवी संस्थाओं व इंटरनेट के माध्यम से स्थानीय जनता अपना मार्केटिंग नेटवर्क खड़ा कर सकती है व बिचौलिया कंपनियों को हटा कर हमारे इलाके में आने वाले पर्यटक अतिथियों का यात्रा बजट भी कम कर सकती है. जिससे पर्यटकों को भी लाभ होगा और वह अधिक संख्या में आ यहाँ के नयनाभिराम सौंदर्य व लोक जीवन से परिचित हो सकेंगे. पडोसी देश नेपाल के अन्नपूर्णा क्षेत्र में पारिस्थितिकी पर्यटन का प्रयोग चल रहा है. हम भी अपनी स्थानिक विशेषताओं के अनुसार प्रारूप बना रहे हैं. ग्राम सभा लाता ने इस सन्दर्भ में एक विस्तृत नियमावली विकसित की है जिसे आमसभा ने पारित किया गया है. यह प्रकट अधिमान रहे कि अपने इलाके के पर्यटन व्यवसाय पर स्थानीय जनता का पूर्ण अधिकार हो. प्रथक राज्य निर्माण की मांग का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा है.

आने वाला समय हमारे लिए सम्भावनाओं भरा है जिन्हें जगाने में नीति घाटी की ग्रामीण जनता की बड़ी भूमिका रही. समुदाय आधारित संरक्षण व इको पर्यटन का ऐसा प्रारूप क्रमिक रूप से विकसित होना है जिसमें पर्यटन से विकसित आय का न्यायोचित बंटवारा हो व जैव-विविधता बनी रहे. नीति घाटी के पर्यटन पर किसी का एकाधिकार न हो. ये जो हमारे प्रदेश के पर्यटन सलाहकार हैं इनकी प्राथमिकताओं में स्थानीय जनता की भूमिका कहीं भी दिखाई नहीं देती. ऐसे में सरकार कहीं से भी ऋण ले कर कोई परियोजना ले लेगी और हम एक बार फिर उनकी लाभार्थी सूची में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए आपस में लड़ना शुरू कर देंगे, बस घूस और भ्रष्टाचार का बोलबाला आरम्भ हो जाएगा. निगम व अन्य संस्थाऐं भी इकोटूरिज्म के नाम पर हमारे इलाके में घुसपैठ करेंगी. इसके नाम पर परियोजनाओं के अंतर्गत यदि विविध गतिविधियों को स्थान न दिया गया तो यह अंकल चिप्स और कोला बेचने के खोके भर रह जायेंगे और यह समग्र पर्यटन का अंत होगा.

भावी रणनीति के दो पहलू हैं : पहला, कोर जोन क्षेत्र में पर्वतरोहण व ट्रैकिंग व्यवसाय व दूसरा, अधिक महत्वपूर्ण समूची नीति घाटी में समुदाय आधारित पर्यटन व्यवसाय को ले कर है. हमें नीति घाटी पर्यटन विकास प्राधिकरण का प्रारूप राज्य सरकार को देना होगा जिसमें 80% स्थानीय जन प्रतिनिधियों का नेतृत्व हो, 10% सरकार व 10% में विभिन्न स्त्रोत संस्थाऐं व विशेषज्ञ रहें. प्राधिकरण स्वयं पर्यटन व्यवसाय न चलाने लगे बल्कि स्थानीय निवासियों, विशेषत: बेरोजगार युवकों को उद्यमी बनाने व पर्यटन की गुणवत्ता बनाए रखने का कार्य करे. अनेक प्रवासी उत्तराखंड वासी व पर्वत प्रेमी इस सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हैं. 

नीति घाटी में परिवारों के पास एक से अधिक आवास हैं. यात्रा सीजन में अनेक गाँव प्रायः खाली रहते हैं. यहाँ यदि अंतरसंरचना व इंटरनेट, स्न्नानागार व शौचालय के साथ अन्य सुविधा दे दी जाएं तो पर्यटन का एक विकेंद्रित ढांचा तैयार हो जायेगा. रॉक क्लाइम्बिंग के प्रशिक्षण से स्थानीय युवा प्रशिक्षक के रूप में कार्य कर सकते हैं तो अन्य साहसिक पर्यटन, ट्रेकिंग, बाईसिकल पर्यटन, वन्यता व जैव विविधता अनुभव, धार्मिक व सांस्कृतिक पर्यटन का विस्तार संभव है. जिन गाँवों में पर्यटन विकास प्राथमिकता पर न हो वहां स्थानीय पर्यटन खपत हेतु दूध, सब्जी व मुर्गी पालन के साथ ट्रॉउट मछली पालन की योजना संभव है. साथ ही अपने क्षेत्र का हस्तशिल्प व सांस्कृतिक विशेषताएं पर्यटन विकास का सबल पक्ष है ही. इनका सम्मिलित प्रभाव यहाँ के बेरोजगार युवाओं को आत्मनिर्भरता का गुर भी देगा. इलाके में भाईचारा, सामूहिक निर्णय लेने की परंपराओं को सबल बनाते हुए ऐसे सांस्कृतिक-सामाजिक वातावरण की सोच बने जहाँ दुनिया भर के सैलानी अपने को सुरक्षित अनुभव करें व हमारी संस्कृति व लोक थात से प्रभावित हो कर बार बार आएँ.

नारायण, बस यहीं अपनी कलम को विराम दे रहा हूं. हमारे संघर्षों के अनुभव, नये युग की नई सम्भावनाओं और उत्तराखंड के शुभचिंतकों के सकारात्मक सरोकारों की वसीयत अपनी भावी पीढ़ी के नाम कर रहा हूं. अब जब मैं अपने इलाके, अपने गांव के भविष्य की तस्वीर अपने दिमाग में बनाने की कोशिश कर रहा हूं तो एक अकेले अपने घर या अपने लाटू की कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं बन पा रही है. जो तस्वीर मेरे दिमाग में उभर रही है वह हँसते-नाचते क्षेत्र वासियों की तस्वीर है और उन्हीं के बीच कहीं मेरा लाटू भी नाच रहा है.

–प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल

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