Featured

‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है

लोग इसे पहाड़ और पलायन की कहानी की तरह देखेंगे. लोग इसे खंडहर होते जा रहे मकानों, परित्यक्त गांवों और अकेले पड़ते जा रहे बूढ़े मां बाप की टीस की तरह देखेंगे. ज़ाहिरा तौर पर पायर ऐसी ही दिखती है. पर मुझे लगता है पहाड़ माध्यम भर हैं. उस माध्यम से फ़िल्म हमें व्यक्तिगत और सामूहिक मानवीय संवेदनाओं तक पहुंचाने की कोशिश में बुनी गयी है. नए सिरे से बुनी गयी सभ्यता की शायद सबसे पुरानी ह्यूमन रिलेशंस की कथा. फ़िल्म देखते लगा कि कितनी अर्जेंट अटेंशन की बात है यह.

यह इस दौर की विडंबना है कि हमें बहुत मूलभूत संवेदनाओं की तरफ़ बार-बार देखने की ज़रूरत पड़ रही है. हमें मनुष्य के सुख दुःख की बुनावट उलटने-पलटने की ज़रुरत जितनी शिद्दत से आज महसूस हो रही है मुझे मालूम नहीं इसके पहले ऐसा कब हुआ था. हमारी सामूहिकता, सहअस्तित्व और साहचर्य पर हमले चौतरफ़ा हैं. मार ऐसी है कि यह निश्चित कर पाना मुश्किल है कि समाज कितने टुकड़ों में बंटेगा, परिवार रहेंगे या बह जाएंगे और मज़े की बात यह कि एक अकेले व्यक्ति की इमोशनल एक्ज़िस्टेन्स की कितनी किरचें उडेंगी यह जान पाना भी मुश्किल हो चला है!

चारों तरफ से हमें पीसते इस अनोखे वर्तमान से डील करने का एक ज़रिया यह भी हो सकता है कि हम सभ्यता के सबसे अंदरूनी फैब्रिक को टटोल कर देखें यानी मनुष्य के आपसी सम्बन्ध को और उसके बाद यह निर्णय लें कि इस ससुरे समाज का क्या करना है! पायर हमें वहीं ले जाती है!

फ़िल्म 30 अक्टूबर को सिनेमा हॉल में रिलीज़ होने वाली है.

खैर! आपने पहाड़ की पीठ देखी है? आपने उसे दूसरी बार देखा है? आपने उसे बार-बार देखा है? अचल-गंभीर-ठोस पहाड़ की आश्वस्त बैठी पीठ. उसपर पानी है, उस पर हवा है. वह अग्नि भी धारण करती है, उसे आकाश का भी सुभीता है. इन सबकी कोमलता है, इन सबके तांडव हैं! वह शांत है अडिग है वह उठती जाती है. पायर पहाड़ की ठोस पीठ है.

नोट : ‘पायर’ फ़िल्म 30 अक्टूबर को सिनेमा हॉल में रिलीज़ होने वाली है.

अमित श्रीवास्तव

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक प्राचीन शहर जौनपुर में जन्मे अमित श्रीवास्तव भूमंडलीकृत भारत की उस पीढ़ी के लेखकों में शुमार हैं जो साहित्य की विधागत तोड़-फोड़ एवं नव-निर्माण में रचनारत है. गद्य एवं पद्य दोनों ही विधाओं में समान दख़ल रखने वाले अमित की अब तक छः किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- बाहर मैं, मैं अंदर (कविता संग्रह), पहला दख़ल (संस्मरण) और गहन है यह अंधकारा (उपन्यास) , कोतवाल का हुक्का (कहानी संग्रह), कोविड ब्लूज और सिराज- ए-दिल जौनपुर. सम सामयिक राजनीति, अर्थ-व्यवस्था, समाज, खेल, संगीत, इतिहास जैसे विषयों पर अनेक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं/ ऑनलाइन पोर्टल पर प्रकाशित हैं. भाषा की रवानी, चुटीलेपन एवं साफ़गोई के लिए जाने जाते हैं. भारतीय पुलिस सेवा में हैं और फ़िलहाल उत्तराखंड के देहरादून में रहते हैं. 

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’

पिछली कड़ी : सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन संघर्षनामा का ये किस्सा आजादी…

23 hours ago

गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी

गाँव में सब उसे जानते थे. कोई उस के पास सब्जी लेने आता तो वह…

3 days ago

देवदार या देव दारु

देवदार या देव दारुः देवों के वृक्ष मुख्य रूप से हिमालय मे लगभग डेढ़ हज़ार…

1 week ago

कसारदेवी : जहां स्वर्ग के सबसे करीब होने का अहसास होता है

“कसारदेवी या अल्मोड़ा जैसी छोटी सी जगह में ऐसा क्या है जो दुनियाभर से लोगों…

1 week ago

दुर्गम पहाड़ों तक कैसे पहुंचे महाराष्ट्र-गुजरात के पर्व

बचपन में हमें होली-दिवाली और राखी के अलावा मकर संक्रांति, घी त्यार और फूलदेई जैसे उत्सवों…

2 weeks ago

पिथौरागढ़ में स्विट्ज़रलैंड बनने की है पूरी क्षमता

इस बार करीब 9 साल बाद पिथौरागढ़ जाकर एक बात साफ दिखी कि यहां कुछ…

3 weeks ago