गाँव में सब उसे जानते थे. कोई उस के पास सब्जी लेने आता तो वह रास्ते भर की खबर भी पूछ लेती. किसी के घर बच्चा बीमार हो तो सब से पहले हाल-चाल लेने पहुँच जाती. किसी की बेटी मायके आती तो उसके लिए अपने घर से कुछ न कुछ जरूर भेजती. (Story by Deepali Suyal)
बहुत सीधी थी वह. इतनी सीधी कि कभी-कभी लोग उसकी इसी सादगी का फायदा भी उठा लेते.
लेकिन गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी. उस की खुशियाँ भी तो बहुत छोटी थीं. शाम को जब वह घास का गट्ठर लेकर लौटती और रास्ते में बुरांश के फूल खिले दिखाई देते, तो कुछ पल ठहर जाती. फूलों को देखती और मुस्कुराकर कहती—
“तू भी कितना सुंदर खिलता है… बिना किसी से पूछे.” फिर अपना गट्ठर उठाती और घर की ओर चल देती.
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उसकी अपनी जिंदगी में भी कुछ सपने थे. कभी वह सोचती थी कि एक दिन अकेले शहर जाएगी. अपनी पसंद की साड़ी खरीदेगी. किसी दुकान में बैठकर गरम चाय पिएगी और बिना किसी जल्दी के खिड़की से बाहर देखेगी. लेकिन फिर घर की आवाज आती—
“गौरा… जरा इधर आना.” और उस के सपने फिर किसी कोने में रख दिए जाते.
एक दिन उसकी बेटी ने अचानक उससे पूछा—
“ईजा, तू अपने लिए क्या चाहती है?” गौरा कुछ पल चुप रही. फिर हँस कर बोली—
“मैंने कब कुछ चाहा है?”
बेटी ने उसका हाथ पकड़ कर कहा—
तूने चाहा होगा ईजा… बस बताया नहीं होगा कभी किसी को.”
उस दिन गौरा बहुत देर तक चुप रही. शायद पहली बार किसी ने उस से पूछा था कि वह खुद क्या चाहती है. उस ने खिड़की से बाहर देखा.
दूर पहाड़ बिल्कुल शांत खड़े थे. गौरा मुस्कुराई. उसे लगा, शायद वह भी इन पहाड़ों जैसी ही है. सालों से सब का बोझ उठाती हुई, चुपचाप खड़ी… लेकिन भीतर से उतनी ही मजबूत.
पहाड़ की स्त्री ऐसी ही तो होती है— भोली-भाली, सरल और सहज. लेकिन उस के भीतर एक पूरा पहाड़ बसता है. (Story by Deepali Suyal)
हल्द्वानी में रहने वाली दीपाली सुयाल तिवारी ने पी. एन. जी. पी. जी. कॉलेज रामनगर से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है. कविताएँ, कहानियां लिखती हैं.
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