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देवदार या देव दारु

देवदार या देव दारुः देवों के वृक्ष मुख्य रूप से हिमालय मे लगभग डेढ़ हज़ार मीटर या अधिक ऊँचे स्थानों पर ही पाये जाते हैं. अपनी विशालता और उदारता को समेटे हुए इन विराट वृक्षों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं. इन्हें ठंडी और शुद्ध जलवायु पसंद है. (Memoir by Sindhuja Chaudhari)

पर देखो! किसी माली की चतुराई, उस ने इसे बोन्साई बना गमले मे लगाकर नुमाइश मे खड़ा कर दिया है. नुमाइश मे आया हर व्यक्ति जो इसकी तरफ देखता है या इसे अनदेखा करता है, देवदार के लघु वृक्ष को इस क्षुद्रता पर लज्जा आती है.

पर माली गर्व की अनुभूति में फूले नहीं समा रहा है, की कैसे विराटता को उसने लघुता में जकड़ दिया है.

इस मेले के बाद,घर पहुँचने पर माँ का कॉल आया. उन्होंने पूछा, “घर कब आओगे?”

दशक बीत जाने पर भी ये शहर पराया लगता है. मेरे लिए घर का मतलब आज भी अल्मोड़ा है.

“माँ ! दशहरे में छुट्टी नहीं है. मैं दीवाली मे आऊँ शायद”.

एक पल की खामोशी ने बूढ़ी आँखें नम कर  दी.

इसे भी पढ़ें : सिंधुजा की कविता : स्मृति यात्रा

मैंने दोहराया, “दीवाली में पक्का आऊँगा. आप चिंता मत करियेगा.”

उन्होंने कहा, “हाँ, अब ताकत और उत्साह दोनों कम हैं. पर तुम लोग आते हो तो ताक़त अपने आप आ जाती है और त्यौहार की तैयारी करने का मन करता है |  ”

फर्श उखड़ रहा है, मकान भी पुराना हो चला है.

सोच रहे हैं की  फर्श ठीक करवा लेते  है.

फोन रखने के बाद ऑफिस की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने रूधे गले को सामान्य किया.

जब कॉलेज से घर आता था, तो दादी बरामदे मे लगी खाट पर बैठी मिलती थीं.

हांफते हुए दादी चिल्लाते हुए लगता था, जैसे अबोध बालक बन गया हूँ.

दादी ने भी मुझे वैसे ही दुलारा.

“तू तो कमजोर हो गया है.”

शायद अगर मेरा वजन 100 भी होता तो भी दादी यही कहती.

अचानक लगा जैसे मेरी माँ भी दादी जैसे ही दिखने लगी है. झुकती कमर, चेहरे पर शांत मुस्कान और वही आत्मीयता वो मेरे बच्चे को दिखाती है.

मेरी जड़े इस शहर में जम ही नहीं पा रही हैं कोशिश करने पर भी गहरी नहीं होती.

माँ पिताजी के बाद वो घर और शहर भी पराया हो जाएगा.जहाँ पहुँचने की मुझे हमेशा चाह है.

ये विचार हृदय चीर देते हैं की उस घर पर लटका ताला और सूना आँगन कितने भयानक लगेंगे. और इस शहर की आपाधापी मे अपनापन कभी नहीं पनप पायेगा .

शायद मे भी कई हज़ार फीट पर उगने वाला वृक्ष हूँ. जो उसी शुद्ध जलवायु मे ही पल्लवित होता है.

ये अपार्टमेंट की चाहरदीवारी, सँकरी बालकनी मुझे गमले सी लगती है.

जहाँ मेरी लघुता को ऊँची इमारत के दो कमरों से टटोला जाता है.

जहाँ मेरी लघुता को ऊँची इमारत के दो कमरों से टटोला जाता है. (Memoir by Sindhuja Chaudhari)

तपोवन, देहरादून की रहने वाली सिंधुजा चौधरी कर्नाटक इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन से बी-टेक हैं. सिंधुजा ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ ट्वेंटे, नीदरलैंड से जियो इंफ़ॉर्मैटिक्स में मास्टर्स डिप्लोमा किया है. साहित्यिक अध्ययन, लेखन में विशेष रुचि रखती हैं.

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Sudhir Kumar

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