आजकल पहाड़ को समझना समय को उल्टा पढ़ना हो गया है. पिछले कुछ वर्षों से मैं यह समझने की कोशिश कर रही हूँ कि सदियों से फले फूले हमारे पर्वतीय समाज को अचानक “उजड़ता हुआ” क्यों कहा जाने लगा है. मैं अभी सारी बातें समझ नहीं पाई हूँ, पर कुछ-कुछ समझ आने लगा है, जैसे कि फूड चैन में आई हल्की-सी हलचल भी पूरे परिदृश्य को बदल देती हैं. जब मधुमक्खी पालन कम होता है तो पोलीनेशन घटता है, जब पोलीनेशन घटता है तो जंगली फल कम होते हैं, और जब जंगल का भोजन कम होता है तो जंगली जानवर घरों तक चले आते हैं. फिर हम इसे मानव-वन्यजीव संघर्ष नाम दे देते हैं, जैसे वह कोई अचानक घटित हुई दुर्घटना हो. सड़कों को हमने जीवन रेखा कहा, और सच भी है कि उन्होंने दूरी घटाई, पर उन्होंने जीवन की लय भी बदली, वाटर चैनल तोड़े, बसासतों का ढांचा बदला. कभी-कभी मन में आता है कि क्या भविष्य की कोई साइलेंट एयर मोबिलिटी या छोटे यान/ड्रोन इस निर्भरता का कोई और रास्ता खोल पाएंगे. फिलहाल तो यह सिर्फ एक संभावना है.
आज अचानक कमिश्नर ट्रेल की किताब दिखी. वही ट्रेल जिन्होंने 1851 में कुमाऊं के बारे में लिखा था. उनके शब्दों में दर्ज फलों की सूची पढ़ते हुए लगा जैसे किसी पुराने बगीचे का दरवाज़ा खुल गया हो. उन्होंने Apple, Pear, Apricot, Cherry, Walnut, Pomegranate, Mulberry, Peach, Mango, Guava, Orange, lemon (2 kinds), Citron (4 Kinds), Plantain, Arbutus, Strawberry, Raspberry, Barberry, Grape, Blackberry और Giwain जैसे फलों का उल्लेख किया. साथ ही Bhomora और Chyur जैसे स्थानीय वृक्षों का भी, जिनके बारे में अब हम मुश्किल से बात करते हैं.
मैंने सोचा, क्या उस समय ये फल सचमुच हमारे आस पास थे, या वे किसी खास हिस्से में सीमित थे. या हमने इन्हें इसलिए खो दिया क्योंकि ये बाजार के लॉजिक में फिट नहीं बैठे. आज हमारे फल ट्रकों से आते हैं, एक आकार में, एक स्वाद में, और अक्सर बिना उस सुगंध के जो पहाड़ी हवा में घुली रहती थी.
ट्रेल की सूची पढ़ते हुए मुझे यह भी लगा कि बायोडायवर्सिटी कभी सिर्फ जंगल का विषय नहीं थी. वह घर, बगीचे और जंगल के बीच का संवाद थी. जब मधुमक्खियां कम हुईं तो बगीचे की आवाज धीमी हुई. जब बगीचा चुप हुआ तो जंगल की भूख बढ़ी. और जब जंगल भूखा हुआ तो खेत असुरक्षित हुए. शायद “पलायन” किसी एक घटना का परिणाम नहीं बल्कि छोटे-छोटे छूटे हुए धागों का जाल है.
कमिश्नर ट्रेल के बारे में सोचते हुए मुझे लगा कि मैं एक प्रश्न के साथ चल रही हूँ. क्या हमें वे फल फिर मिलेंगे. क्या Giwain (ग्यूवाईं Elaeagnus angustifolia ) फिर से खुले ढलानों पर उगेगी. क्या तरह तरह के नींबू फिर से गाँवों के पास दिखाई देंगे. क्या जामिर, गलगल को बच्चे नाम लेकर तोड़ेंगे. यह सवाल उदासी का नहीं है, यह इकोलॉजिकल मैमोरी का है. अगर मैमोरी बची रहे तो संपन्नता भी लौट सकती है.
शायद किसी दिन, इसी पहाड़ों पर चलते हुए, हवा में च्यूरे की हल्की गंध होगी और किसी झाड़ी में हिसालू पक रहे होंगे. तब यह प्रश्न इतिहास का नहीं रहेगा, बल्कि वर्तमान का स्वाद बन जाएगा.
-डॉ. लता जोशी

मूलतः गंगोलीहाट की रहने वाली डॉ. लता जोशी, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. फ़िलहाल हल्द्वानी शहर में रह ही, डॉ. लता जोशी, काफल ट्री की नियमित सहयोगी रही हैं.
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