हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था को प्राथमिकता देने वाले कई ब्रिटिश प्रशासक रहे जो औपनिवेशिक शासन की समय अवधि में पहाड़ में तैनात रहे. उन्होंने अपनी खोज बीन, सर्वेक्षण, रिपोर्ट लेखन व प्रशासनिक निर्णयों से पहाड़ की विशिष्टता को उच्च प्रतिमान दिया.

औपनिवेशिक काल में पर्वतीय क्षेत्र में 23 ब्रिटिश व 1 भारतीय कमिश्नर तैनात रहे. 1815 से 1891 तक कुमाऊं नॉन रेगुलेशन प्रान्त था अर्थात सामान्य ब्रिटिश कानून यहाँ पूर्ण रूप से क्रियाशील न थे. स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग प्रशासन व्यवस्था रही. नौकर शाही का कम हस्तक्षेप रहा. न्याय की जटिलता भी कम रही.

आरंभिक स्थापना काल में 1815 से 1817 तक एडवर्ड गार्डनर कमिश्नर नियुक्त हुए और उसके बाद वर्ष 1817 से 1830 तक कुमाऊं में कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल रहे जिन्होंने गोरखा शासन के बाद ब्रिटिश राज स्थापित किया. उन्होंने आंचलिक रीति रिवाजों पर आधारित शासन प्रणाली निर्मित की जिसमें मैदान के लिए बने मापदंडो व कानून का उपयोग लागू न होता. ट्रेल की स्पष्ट संकल्पना रही कि पहाड़ को उसके अपने सामाजिक ढांचे, रीति रिवाज व परंपरा के अनुसार चलना चाहिये. स्थानीय परंपरा व संस्कृति पर अवलंबित होने के कारण ट्रेल को कुमाऊं प्रशासन प्रारूप का जनक माना गया. उन्होंने राजस्व बंदोबस्त किया.

ट्रेल का जन्म 1784 में स्कॉटलैंड में हुआ. ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा में रहते 31 वर्ष की आयु से वह कुमाऊं के आयुक्त पंद्रह वर्ष तक रहे.1815 में अंग्रेजों ने गोर्खाओं को हरा कर पर्वतीय क्षेत्र अपने शासन में लिया. तब प्रशासन की स्थिति डांवाडोल थी व न्याय व्यवस्था पूर्वाग्रह ग्रस्त. राजस्व के अभिलेखीकरण का रिवाज न था. आने जाने के पथ सीमित थे और संचार व्यवस्था दुर्बल. गोरखा युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद ट्रेल की नियुक्ति ब्रिटिश शासन का आधार स्थापित करने के उद्देश्य से की गई. 1815 से 1835 की समय अवधि में प्रशासन प्रकृति अनुकूलन की रही जिसमें प्रशासकों ने स्थानीय रीतियों का सम्मान किया.

1835 से 1884 तक का समय प्रशासन के स्थिरीकरण का रहा जिसमें राजस्व वसूली और ढांचा निर्माण को प्राथमिकता दी गई. इस अवधि में 1850 तक प्रशासन को सुद्रढ़ करने के हर सम्भव प्रयास किये गये जिसमें बैटन नियुक्त हुए. 1856 से 1884 तक हेनरी रामसे रहे जिन्होंने प्रशासनिक स्थायित्व के साथ कई छुटपुट विद्रोहों का दमन किया.

एडवर्ड गार्डनर (1815-17) स्थानीय रीति व मान्यताओं का सम्मान करते थे इसलिए जनता के बीच लोकप्रिय हुए. जॉर्ज विलियम ट्रेल (1817-35) सहानुभूति पूर्ण प्रशासन के कारण सर्वाधिक जनप्रिय रहे. बैटन (~1850) प्रशासन कुशल रहे जिनकी जनता में छवि औसत रही. फिर आए हेनरी रामजे (1856-1884) जो इतने लोकप्रिय हुए कि जनता ने उन्हें अपना संरक्षक माना.

1885 से 1910 की समय अवधि औपनिवेशिक संस्थानीकरण की रही जिसमें प्रशासनिक केंद्रीकरण हुआ. 1885 से 1887 तक एच जी रास ने औपचारिक प्रशासन का आधार बनाया. 1888 से 1889 तक जे आर रीड रहे.उनके बाद कठोर राजस्व नीति लागू करने वाले जी ई अर्सकाइन 1889 से 1892 तक रहे .1892 से 1894 तक डी टी रॉबर्ट्स रहे जिन्होंने सत्ता के केंद्रीयकरण पर बल दिया. 1894 से 1898 तक ई ई ग्रिग ने औपनिवेशिक ढांचे को सुद्रढ़ बनाया. ये सभी प्रशासक जनता में लोकप्रिय नहीं हुए.

1899 से 1902 की अवधि में आर ई हैमिल्टन रहे जिनका दृष्टिकोण संतुलित था. 1903 से 1905 की अवधि में ए एम डब्ल्यू शेक्सपीयर संस्थागत सुधार करने में सफल रहे. उनके काम को जे ई कैंपबेल ने आगे बढ़ाया जो 1906 से 1913 के बीच जनता में लोकप्रिय रहे. 1885 से 1913 का समय औपिनिवेशिक संस्थानीकरण का रहा जिसमें प्रशासनिक केंद्रीकरण की प्रवृति मुख्य रही.

1913 से 1947 का काल औपचारिक नौकरशाही का रहा जिसमें संसाधनों का अपने हित में आवंटन व प्रयोग मुख्य उद्देश्य बना रहा इससे विकास ठहराव की स्थिति में रहा. 1914 से 1924 तक पी विदम प्रशासक रहे जिन्होंने आम जनता से दूरी बनाये रखी. फिर 1925 से 1931 तक एन सी स्टिफ आए जिनका उद्देश्य नौकरशाही को मजबूत करना रहा. औपनिवेशिक नियंत्रण को और मजबूत करने वाले एल एम स्टब्स थे जो 1931 से 1933 तक आयुक्त रहे. 1935 से 1939 तक ए डब्लू इबहोटसन का कार्यकाल सीमित सुधार का रहा तो 1943 से 1947 डब्लू फिनले संक्रमण काल की समस्याओं में उलझे रहे.

ब्रिटिश शासन की आरंभिक अवधि (1815-1850) जन भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता रही जो पहाड़ के अनुकूल व धनात्मक दृष्टिकोण की रही. उसके बाद औपनिवेशिक नियंत्रण (1850-1900) बढ़ा और शासन की नीतियाँ कठोर हुईं. इसके बाद नौकरशाही हावी रही. आरंभ में जो प्रशासक आए उन्होंने पहाड़ी समाज को समझा और बाद में आने वालों की प्राथमिकता औपनिवेशिक आचार संहिता लागू करने पर बनी रही.

जिन्होंने स्थानीय समाज को समझा व जाना, जनता पर कर का भार कम से कम रखना चाहा, पंचायत व परंपरा को मान्यता दी,उनमें ट्रेल, रामजे, गार्डनर व शेक्सपीयर मुख्य थे. तटस्थ प्रशासकों में कैंपबैल, हैमिल्टन, रास व फिनले थे जिनकी नीति “न विशेष हित – न विशेष नुकसान” का नियम पालन रही. शोषक व कठोर प्रशासन वाले अधिकारी जिनके कार्यकाल में राजस्व को बढ़ाने पर जोर रहा उनमें सत्ता का केंद्रीयकरण करने और स्थानीय अधिकार हटाने में अर्सकाइन, रॉबर्ट्स, स्टिफ्फ व स्टब्स मुख्य रहे . पहाड़ के लिए ट्रेल और रामजे संरक्षक की भांति थे, बाद के अधिकारी तो शासक थे, प्रशासन में कठोर थे व लोकप्रिय भी न रहे.

ट्रेल की प्रशासनिक नीति जो उन्हें पहाड़ के प्रति संवेदनशील बना गई स्थानीय परम्परा पर आधारित रही. उन्होंने निर्णय लिया कि वह पहाड़ में मैदान के कानून लागू नहीं करेंगे. उन्होंने स्थानीय पंचायत प्रणाली को मान्यता दी व परंपरागत भूमि अधिकार बनाये रखे. गांव के प्रमुखों को प्रशासन में मुख्य भूमिका दी.

ट्रेल कामकाज में न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप के हिमायती थे. उनका फलसफा बहुत सीधा साधा था कि कम शासन ही बेहतर शासन होता है. इसीलिए उन्होंने बहुत कम कर लगाए व पुलिस की व्यवस्था भी सीमित रखी. वह स्थानीय स्तर पर फैसले लेते. उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह अपने इलाके में खूब दौरे करते व लोगों से मिलते जुलते थे. आम लोगों के साथ पैदल चल घूमते थे और उनके सुख-दुख बाँटते थे. लोग बाग भी उन्हें अधिकारी नहीं बल्कि संरक्षक की तरह सम्मान देते थे. उन्होंने स्थानीय पहाड़ी भी सीख ली थी और पहाड़ की जीवन शैली में रहना उन्हें भा गया. इससे जन -जन से उनका संवाद व बोलचाल रही. आम लोग बाग उनके बारे में कहते कि अंग्रेज होते हुए भी हमारा साब हम पहाड़ियों की तरह रहता है. वह दयालु भी है और न्याय भी करता है. उन्होंने पहाड़ को खास प्रशासनिक इलाके के रूप में संवारा. उनके समय अंग्रेजी शासन सहजता से चला. उन्होंने पहाड़ में आने वाले समय के लिए प्रशासनिक प्रारूप की प्रस्तावना भी रखी.

स्थानीयता व अंचल विशेष की परिस्थितियों को देख समझ उन्होंने पहाड़ की आर्थिक गतिविधियों के लिए सरल नियम बनाए. आपसी विवादों को पंचायत आधारित न्याय प्रणाली अपनाते हुए सुलझाने का रास्ता सही समझा. भूमि के लगान व अन्य कर, चुंगी आदि की दर कम से कम रखी.

पहाड़ की आर्थिकी में उन्होंने स्थाई सुधार किये जिसमें भूमि व्यवस्था मुख्य थी. जमीन का सर्वेक्षण कर उन्होंने भूमि रिकॉर्ड बनाया. राजस्व की दर कम व स्थिर रखी. किसी विवाद के होने पर वह स्थानीय स्तर पर फैसला लेना उचित समझते थे. देख रेख व पहरेदारी के मामले में वह कम से कम पुलिस की जरुरत पर बल देते थे जो सुरक्षा के लिए काफी हो. इन सरल व सहजता भरी कार्य शैली से प्रशासन स्थिर हुआ और कोई विद्रोह नहीं हुआ. यह ब्रिटिश शासन की बड़ी सफलता रही. उनका यह प्रशासनिक दर्शन “ट्रेल सिद्धांत” कहा गया. सरल रूप में उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्र हेतु भिन्न शासन पद्धति की आवश्यकता है क्योंकि यहाँ का भूगोल भिन्न है. सामाजिक ताना बाना विभिन्नताओं से भरा है और आर्थिकी जीवन निर्वाह पद्धति पर आधारित है. इसीलिए विकास की नीति भी मैदानी भागोंसे भिन्न होनी चाहिये. ट्रेल ने कुमाऊं क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था संभाली जिसका केंद्र अल्मोड़ा था.

कुमाऊं और गढ़वाल में ब्रिटिश शासन की अवधि में भूमि का बंदोबस्त व उसका प्रशासन दो स्पष्ट क्रमों में विकसित हुआ जिसमें पहला ट्रेल-काल कहा गया. अगला क्रम बाद के आयुक्तों का रहा. इन दोनों चरणों की नीतियाँ एक दूसरे से अलग थीं,जिन्होंने पहाड़ की आर्थिक सामाजिक संरचना पर गहरा असर डाला.ट्रेल के समय की भू नीति की विशेषता यह थी कि उन्होंने पहाड़ की जमीन को मैदान जैसा न माना और उसके विशिष्ट स्वरूप को देख नियम तय किए. भूमि से प्राप्त राजस्व के आंकलन में ट्रेल ने उस इलाके की स्थानीय परंपराओं व रीति-रिवाजों को प्राथमिक महत्त्व दिया. वह न्यूनतम कर लगाने के पक्षधर रहे. उनकी सोच थी कि यदि कर की दर न्यूनतम रहेगी तो लोग- बाग गांव से बाहर जाने की नहीं सोचेंगे अर्थात पलायन की प्रवृति कम रहेगी. कर की दर का निर्धारण भी उन्होंने भूमि की उत्पादन क्षमता के आधार पर किया.ट्रेल का सिद्धांत था कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह पर अवलंबित है इसलिए कर भी जीविका के अनुकूल होना चाहिये. उनकी आर्थिक व्यवस्था ग्राम समुदाय पर आधारित थी जिसमें उन्होंने गांव को इकाई माना. व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं बल्कि समुदाय के अधिकार को महत्त्व दिया.

ट्रेल ने वन भूमि उपयोग की आजादी दी. ग्रामीण जंगल से चारा, लकड़ी व ईंधन ला सकते थे. ट्रेल कठोरता से काम करने वाले शासक न थे बल्कि पहाड़ के रस्म रिवाज को समझते यहाँ की दिनचर्या व आजीविका की दशाओं के साथ दुरूह भौगोलिक परिस्थितियों को समझ सरल निर्णय लेने वाले प्रशासक रहे. आम जनों से मिल उनकी परेशानियों को समझ वह समाधान करते थे. मूलतः वह नीति निर्देशक रहे. उनका दर्शन था कि स्थानीय समाज ही शासन का आधार होता है.

ट्रेल ने पर्वतीय इलाके के लिए अलग राज्य जैसी अवधारणा का जिक्र नहीं किया बस यह साफ-साफ जताया कि पहाड़ को मैदानी शासन से भिन्न तरीके से चलाना होगा. इतिहासकारों का मत है कि उनकी यह सोच बाद में प्रथक उत्तराखंड राज्य का वैचारिक आधार बनी.

ट्रेल के बाद के कमिश्नरों ने भूमि नीति बदली क्योंकि औपनिवेशिक शासन स्थिर हो चुका था. 1856 से 1884 के मध्य हेनरी रामजे ने प्रशासन के केंद्रीयकरण की नीति अपनाई और आगम बढ़ाने को जरुरी माना. इस काल में मुख्य परिवर्तन यह हुआ कि बंदोबस्त व्यवस्थित हुआ अर्थात जमीन की पैमाइश की गई, नक़्शे बने, इनका रिकॉर्ड रखा गया और राजस्व की दरें तय हुईं. अब राज्य का नियंत्रण बढ़ने लगा था. जंगल भी राज्य के अधीन हुए और ग्रामीण अधिकार सीमित कर दिए गये. भूमि का रिकॉर्ड धारक के नाम के आधार पर रखा गया जिससे सामुदायिक व्यवस्था दुर्बल हो गई.अब व्यक्तिगत स्वामित्व की प्रवृति को प्रश्रय मिला. राजस्व को प्राथमिकता देने का आशय ऐसी नीति को अपनाना था जिससे आगम-आय बढ़े.

ट्रेल की समय अवधि में संरक्षण की नीति रही तो भू स्वामित्व सामुदायिक रहा.कर कम थे और वन अधिकार ग्रामीण अनुकूल रहा. सबसे महत्वपूर्ण था प्रशासन का लचीला बना रहना. उनके बाद के प्रशासक राजस्व की वृद्धि का लक्ष्य ले कर चले. उन्होंने भू स्वामित्व व्यक्तिगत रिकॉर्ड के आधार पर किया तथा करदान क्षमता को अधिक करने के लिए उसकी वसूली कठोर की. वन अधिकार भी शासकीय नियंत्रण में आए और प्रशासन औपचारिक रहा.

पहाड़ की सामाजिक-आर्थिकी पर ट्रेल की उदार नीतियों का यह प्रभाव पड़ा कि उनके काल में पलायन कम हुआ. गाँवों को स्वायत्तता मिली व सामाजिक मेल-मिलाप बढ़ा. बाद के प्रशासन ने कर व लगान की दर बढ़ाई, वनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया. इससे धीरे-धीरे जनता में असंतोष उभरे व सरकार की नीतियों के विरोध में आंदोलन हुए.

ट्रेल ने पहाड़ की प्रकृति समझ कर राजकाज चलाया जबकि बाद के प्रशासन ने पहाड़ को राजस्व स्त्रोत मान संसाधनों का विदोहन किया. ट्रेल का शासन “पर्वतीय प्रशासन मॉडल” था जबकि बाद में “औपनिवेशिक राजस्व प्रारूप” विकसित हुआ. नीति विश्लेषकों का मत है कि पहाड़ी राज्यों के विकास के लिए आज भी ट्रेल प्रेरित दर्शन उपयोगी है जो स्थानीय स्वशासन, संसाधन अधिकार व क्षेत्र विशिष्ट नीति का आधार लेता है.

ट्रेल का प्रशासनिक काल कुमाऊं गढ़वाल के इतिहास में इसलिए विशेष माना जाता है क्योंकि उन्होंने स्थल व जनता के बीच जा वह नतीजे निकाले जो विस्तृत रिपोर्ट, नोट्स, राजस्व अभिलेख व प्रशासनिक टिप्पणियों के रूप में मौजूद हैं.

ट्रेल के प्रशासनिक दस्तावेजों में राजस्व रिपोर्ट उल्लेखनीय हैं जिनमें भूमि-कर की दरें, गाँव वार उत्पादन व भिन्न-भिन्न प्रकार की जमीन की श्रेणियों का वर्णन है. ट्रेल ने भू-राजस्व का निर्धारण स्थानीय उत्पादकता के आधार पर किया न कि ऊपर से आए औपनिवेशिक मानक पर. ट्रेल संसाधन संतुलन सिद्धांत पर चले जिसमें राजस्व नहीं गांव की आबादी की स्थिरता बने रहना प्राथमिक था. आजीविका के लिए जंगल और जमीन का उपयोग होता रहे.

ट्रेल के दस्तावेजों का नीतिगत दर्शन सर्वप्रथम “स्थानीय अनुकूलन सिद्धांत” पर आधारित था जिसमें उनकी प्राथमिकता यह रही कि प्रशासन जनता के अनुसार ढले, जनता प्रशासन के निर्देश के अनुरूप नहीं. वह “न्यूनतम हस्तक्षेप सिद्धांत” पर विश्वास करते थे जिसमें गांव स्वशासित रहें व राज्य का हस्तक्षेप कम से कम रहे. ट्रेल ने स्थानीय विवादों के समाधान व पंचायत आधारित फैसलों के लिए न्यायिक रजिस्टर बनाये और मौखिक परंपराओं का रिकॉर्ड रखा. कानून थोपने के बजाय स्थानीय स्तर पर न्याय व फैसला लेने की प्रणाली अपनाई.

ट्रेल ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को व्यवहार संबंधी निर्देश दिए तो स्थानीय भाषा बोली सीखने व बात करने का सुझाव दिया. उनका लोक थात से जुड़ाव पहाड़ की संस्कृति के प्रति सम्मान था. खोज बीन व समंकों पर टिके उनके निर्णय प्रशासन को वैज्ञानिक आधार पर समुन्नत कर गये. वह हमेशा सरल -सहज आत्मीय व्यवहार करते रहे जिसमें औपनिवेशिक कठोरता न थी.वह चाहते थे कि सरकार जनता से संवेदना पूर्ण व्यवहार करे.

ट्रेल ने पहाड़ी समाज पर नोट्स लिखे जिनमें पहाड़ी समाज की जातीय संरचना,खेती व पशुपालन आधारित आर्थिकी का विवेचन है . उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि आखिर किन कारणों से लोग बाग गांव छोड़ना चाहते हैं. इस आधार पर उन्होंने पलायन का कारक जीवन निर्वाह स्तर से सह संबंधित किया.

ट्रेल के शासन का प्रभाव यह रहा कि उनके काल में शांति व स्थायित्व की दशा बनी रही. शासन के विरुद्ध कोई अप्रिय आवाज नहीं उभरी और आम जनता ने उन्हें लगातार सहयोग दिया. इसकी दीर्घकालिक परिणति पहाड़ के प्रशासन के उस प्रारूप के रूप में सामने आई जो ब्रिटिश भारत में पहाड़ को “विशेष क्षेत्र” की अवधारणा दे गया. ट्रेल के दस्तावेज स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने क्षेत्रीय नीति को अपनाया न कि मैदान के लिए तय नीतियों को पहाड़ की समस्याओं के सुलझाने के लिए अपनाया.

वर्तमान सन्दर्भ में प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान ट्रेल के प्रारूप को आदर्श व विशिष्ट उदाहरण मानते हैं. उनका योगदान क्षेत्र आधारित नीति की प्रस्तावना बना जिनसे बाद में माइक्रो प्लानिंग व कैचमेंट एरिया स्टडी व कैचमेंट डेवलपमेंट किए गये. यह विकेंद्रीकरण की आरंभिक अवधारणा थी जो संवेदनशील प्रशासन का अप्रतिम उदाहरण बनी. यदि पहाड़ की नीति ट्रेल के आधार भूत सिद्धांतों पर अवलंबित की जाती तो पलायन व प्रवास की विकराल समस्या उत्पन्न न होती.

ट्रेल का मूल सिद्धांत था कि पहाड़ एक अलग प्रशासनिक क्षेत्र है जिसमें एक समान कानून लागू नहीं होने चाहिये. स्थानीय परंपरा ही प्रशासन का आधार हो –

“These hills cannot be governed by the same rules as the plains; their customs must be the guide.”

यह भारत में क्षेत्र विशेष नीति का सबसे आरंभिक सिद्धांत रहा. राजस्व नीति पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि पहाड़ में खेती कठिन है जिससे सीमित उत्पादन प्राप्त होता है, इसलिए कर कम होना चाहिये वरना किसान टूट जायेगा –

“Assesment must be light, for the cultivator here labours against nature itself”

यह वर्तमान की नीति भाषा में जलवायु संवेदनशील कर नीति है. ट्रेल का विश्वास था कि ग्रामीण पंचायत समस्याएं सुलझाने में सक्षम है. बाहरी हस्तक्षेप से व्यवस्था बिगड़ती है –

“Village communities in Kumaun are capable of managing their own concerns if left undisturbed.”

ग्रामीण स्वायत्तता पर यह विचार आधुनिक विकेंन्द्रीकरण सिद्धांत से मिलता है. ट्रेल ने जंगल को संसाधन नहीं बल्कि जीवन माना जो ईंधन, चारा, औषधि व निर्माण सामग्री प्रदान करता है –

“Forests here are not merely timber-they are life to the people.”

इसी कारण उन्होंने आरम्भ में वन अधिकार सीमित नहीं किए. ट्रेल की सीमा यह रही कि उनके दस्तावेज व्यक्तिगत शैली पर आधारित रहे जिनसे औपचारिक कानून का ढांचा दुर्बल पड़ा. उनके बाद के अधिकारियों पर औपनिवेशिक दबाव अधिक रहे जिसमें ट्रेल का मॉडल नियमित न रह पाया. समग्र रूप से ट्रेल के प्रशासनिक दस्तावेज मात्र सरकारी रिकॉर्ड न थे उनमें पूर्ण पर्वतीय शासन का दर्शन आधार था. ट्रेल एक ब्रिटिश अधिकारी कम व क्षेत्रीय प्रशासक अधिक थे. औपनिवेशिक अधिकारी होते हुए भी उनकी सोच स्थानीय थी. यह पहाड़ के लिए दुर्लभ नीति बनी. उन्होंने राजस्व से अधिक समाज पर ध्यान दिया जो एक अनोखा प्रयोग था. वह क्षेत्रीय प्रशासन सिद्धांत पर चले जो एक अग्रणी पहल रही. उनका दर्शन था कि शासन जनता के अनुकूल होना चाहिए न कि जनता शासन के अनुसार चले.

ट्रेल के उद्धरणों में विद्यमान संवेदना पहाड़ की सम्यक विकास नीतियों का आधार बनती हैं जो स्थानीय निर्णय, कम कर, संसाधन अधिकार व सांस्कृतिक सम्मान से समन्वित हैं. ट्रेल केवल प्रशासक नहीं थे, वह भारत में क्षेत्रीय प्रशासन सिद्धांत के पहले प्रयोग कर्ता रहे.

उत्तराखंड की वर्तमान प्रशासनिक संरचना, भूमि नीति, वन व्यवस्था व विकास की समस्याओं का आधार ब्रिटिश कालीन कुमाऊं गढ़वाल प्रशासन में मिलता है. जॉर्ज विलियम ट्रेल व उनके उपरांत प्रभावशाली अधिकारी हेनरी रामजे की नीतियों का प्रभाव अब भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ को विशेष प्रशासनिक क्षेत्र स्वीकार किया जो प्रथक कानून, कम नौकरशाही व स्थानीय रीति रिवाजों व मान्यताओं पर अवलंबित था.

उत्तराखंड में वन विभाग के तमाम प्रतिबंधों व संरक्षण के परे ग्राम आधारित सामाजिक निर्णय व वन उपयोग की पद्धतियों के दर्शन होते हैं जो यह इंगित करते हैं कि वर्तमान का स्थानीय प्रशासनिक अधिकार ब्रिटिश प्रयोगों से प्रभावित है जिनमें परंपरागत दशाओं के दर्शन होते हैं. ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ में जमींदारी लागू नहीं की. यह एक ऐसा निर्णय था जिससे छोटे काश्तकार संरक्षित रहे और भूमि विभाजन सीमित रहा. आज भी स्थिति यह है कि उत्तराखंड में बड़े जमींदार कम हैं व भूमि का स्वामित्व छोटे टुकड़ों में है. यह भूमि नीति की सकारात्मक विरासत है.

ब्रिटिश शासन की यह खूबी रही कि भूमि पर जमींदारी नहीं बनाई जिससे आज भी सामाजिक समानता का लाभ दिखाई देता है. ब्रिटिश प्रशासन स्थानीय परंपरा के अनुरूप तय विधान मान कर चले तो आज प्रशासन लचीला है. ब्रिटिश अधिकारियों ने सामाजिक परम्परा व लोक थात का सम्मान किया तो आज की व्यवस्था सांस्कृतिक संरक्षण देने की उन्मुखता दिखाती है.

ब्रिटिश शासन का पहाड़ के प्रति दृष्टिकोण था कि पहाड़ को स्थिर रखो, विकसित मत करो. आज भी उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती विकास और संरक्षण का संतुलन है. उत्तराखंड की वर्तमान समस्याएं केवल आधुनिक शासन की विफलता नहीं रहीं बल्कि वह ऐतिहासिक नीति संरचना की निरंतरता भी प्रदर्शित करती है. पर्वतीय प्रशासन के आदर्श प्रारूप के रूप में इनका अनुभव सिद्ध अवलोकन जॉर्ज विलियम ट्रेल (1817-35) व हेनरी रामजे (1856-84) की कार्य प्रणलियों से किया जा सकता है जिन्हें इतिहासकार पर्वतीय प्रशासन के आदर्श मॉडल के रूप में देखते हैं लेकिन उनकी कार्य शैली और समाज पर पड़ा प्रभाव भिन्न-भिन्न रहा. ट्रेल की शासन शैली स्थानीय परम्परा पर आधारित थी जो न्यूनतम हस्तक्षेप करते थे और समाज की स्थिरता का लक्ष्य रखते थे. रामजे संरक्षक शैली पर चले. उन्होंने नियंत्रित सुधार किए और प्रशासन को सुद्रढ किया. रामजे के लिए प्रशासन पहले था तो ट्रेल के लिए समाज.

ट्रेल के पश्चात कुछ समय तक कुमाऊं में कार्यवाहक कमिश्नर व अल्पकाल के लिए अधिकारी नियुक्त होते रहे. 1835 से 1856 के मध्य प्रशासनिक पुर्नगठन हुआ, पदनाम बदले और अस्थायी नियुक्तियां हुईं. इस अवधि को इतिहासकार “अंतराल प्रशासन काल” भी कहते हैं. 1850 में प्रशासनिक सुद्रढ़ीकरण के लिए जे एच बैटन की नियुक्ति हुई. बैटन सैटलमेंट अफसर थे. उन्होंने “गजेटियर ऑफ द प्रोविन्स ऑफ कुमाऊं” लिखा. उन्होंने स्पष्ट कहा कि पहाड़ी समाज आत्मनिर्भर है. यहाँ अलग भूमि नीति बनाई जानी आवश्यक है. यहाँ मैदान की राजस्व नीति लागू करना अनुचित व मूर्खता पूर्ण होगा. बैटन ने ही सर्वप्रथम “भौगोलिक प्रशासन सिद्धांत” रचा जिसमें उन्होंने सिद्ध किया कि शासन भूगोल के अनुसार होना चाहिये. गढ़वाल क्षेत्र में प्रारंभिक ब्रिटिश प्रशासक विलियम फ्रेजनर रहे जिन्होंने गढ़वाल के सामाजिक ढांचे का अध्ययन किया व चेतावनी दी कि कठोर केंद्रीकृत शासन पहाड़ी समाज में असंतोष उत्पन्न करेगा.

1856 से 1884 की अवधि में हेनरी रामजे का कार्यकाल महत्वपूर्ण रहा जो आम जन के चहेते रहे. रामजे ने पहाड़ के प्रशासन को स्थिर किया. स्थानीय जनता का विश्वास जीता और अपनी कार्यशैली से यह सिद्ध किया कि पहाड़ में शासन का भिन्न प्रारूप अपनाया जाना आवश्यक है. जनता ने उन्हें अपना क्षेत्रीय संरक्षक माना. उन्हें गांव-गांव “रामजी शाब” के नाम से जाना गया. वह लोकप्रिय रहे क्योंकि वह जनता के साथ सीधा संवाद करते थे. उनका कार्यकाल काफी लम्बा लगभग 28 वर्ष का रहा, इससे उनकी चुनी सम्यक नीतियां  क्रमिक रूप से क्रियान्वित हो पाईं. अतः उनका शासन काल स्थायित्व भरा रहा.

रामजे जनता पर कम से कम कर लगाने को उचित मानते थे.वह ऐसे अधिकारी रहे जिसने पहाड़ के जनों पर वसूली का बोझ न्यूनतम रखा क्योंकि पहाड़ के खेत छोटे थे, खेती कठिन थी व प्राप्त उपज कम. उनकी सोच थी कि कानून कम से कम हों व प्रशासन सरल रहे. सबसे महत्वपूर्ण तो स्थानीय परंपरा का अनुरक्षण है. स्थानीय परंपरा को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने कहा कि पहाड़ की परम्परा ही उसका कानून है इसलिए उन्होंने सामाजिक रिवाजों का सम्मान किया. ग्राम प्रधानों को अधिकार दिया. उनका प्रशासन कुमाऊं व समीवर्ती इलाकों में रहा जिसका मुख्य केंद्र अल्मोड़ा रहा.

रामजे के समय न्याय व्यवस्था संतुलित रही. आगम वसूली स्थिर रही. जनसंतोष बना रहा. ब्रिटिश शासन के लिए यह आदर्श प्रशासनिक प्रारूप था. उनकी कार्यप्रणाली में लोक थात के प्रति संवेदना बनी रही जिससे उन्हें अपार जन समर्थन मिला.भले ही लोक प्रियता के इस आधार में संस्थागत सुधार की सम्भावना कम रही. लोकप्रिय संरक्षक प्रशासक के रूप में उन्होंने लोगों की सीमित करदान क्षमता के आधार पर कर का बोझ न्यूनतम किया. कठोर कानून भी लागू न किए और आम गांव वासियों से गहरे व्यक्तिगत संबंध बनाए. उनका दर्शन था कि सरकार जनता की संरक्षक है. वह स्वयं भी बहुत सादा जीवन जीते थे. यही कारण था कि रामजे जैसे अंग्रेज साब को जनता अपना जैसा मानती रही.

हेनरी रामजे का व्यवहार व दिशानिर्देश कुमाऊं में इतना सफल और अचूक माना गया कि लोग उसे स्वर्णकाल राजकाज कहने लगे. 1884 में उनके पद छोड़ने के बाद उनकी बनाई व्यवस्था व अनुशासन धीरे धीरे समाप्त हो गया. इसके पीछे कई घटनाएं व नई प्रशासन की संरचना से उपजे दोष थे.

रामजे का प्रशासन संस्थागत नहीं वरना व्यक्तिगत व्यवहार से उपजी सहजता पर आधारित था. किसी भी अड़चन व समस्या का समाधान वह वहां की परिस्थिति का अनुभव कर लेते थे. आम जन उनसे मिलते व परेशानी बताते. ऐसे विवादों में वह व्यक्तिगत हस्तक्षेप करते. शासन प्रणाली उन पर टिकी थी, इसीलिए उनके जाने के बाद इतना सकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाला प्रशासक लोगों को मिला नहीं.

19वीं सदी के अंत तक ब्रिटिश शासन की रणनीति में अचानक व्यापक परिवर्तन हुए. पहले स्थानीय व क्षेत्र विशेष की समस्याओं को सुलझाने के लिए वहां की परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिए जाने की स्वतंत्रता व अनुमति थी. फिर तो पूरे देश के लिए एक समान प्रशासन आरोपित किया गया जिसे क्रियान्वित करने वाली संस्था “इंडियन सिविल सर्विस” थी. नई नीतिगत संरचना में एक जैसे कानून, एक जैसी राजस्व प्रणाली व एक जैसा प्रशासनिक ढांचा था जिसने पहाड़ की अलग पहचान वाली व्यवस्था को समाप्तप्राय कर दिया.

ब्रिटिश सरकार आशंकाग्रस्त थी कि देश के अलग अलग क्षेत्रों को यदि भिन्न तरीके से शासन करने की छूट दी जाए तो ऐसी दशा में उनका प्रशासनिक नियंत्रण कम हो जाएगा. शासन को संचालित करने की लागत भी अधिक होगी और कहीं विद्रोह की आशंका भी हो सकती है. इसलिए उन्होंने एकरूप शासन की नीति लागू कर दी.

रामजे के बाद पहाड़ के इलाके में जो स्थानीय प्रभाव दिखे उनमें सबसे पहले तो जनता से सीधा संवाद कालांतर में कागजी प्रक्रिया में बदल गया. लचीला शासन कठोर नियमों में बंध गया. स्थानीय स्तर पर होने वाला न्याय औपचारिक अदालतों में होने लगा.

रामजे के समय कर कम थे उन्होंने करदान क्षमता का निर्धारण जनता की माली हालत देख कर निर्धारित किया था पर उनके बाद अधिकारियों को निर्देश हुआ कि राजस्व में वृद्धि की जाए. अब आगम व्यवस्था मानकीकृत की जाने लगी. इससे कर की दर बढ़ने लगी. सरकारी काम काज बढ़ा, नए कार्यालय व दफ्तर खुले. स्थानीय स्वायत्तता घटने लगी.

रामजे जिस परिकल्पना पर चले उसमें जनता के हित पहले और नियम बाद में थे. नई औपनिवेशिक सोच में नियम पहले व जनता बाद में रही. ऐसे प्रशासनिक प्रारूप में मानव संवेदना नौकरशाही के दुश्चक्र में बदल गई.

पर्वतीय इलाके के लिए अपनाया गया रामजे का प्रारूप युगान्तर कारी सोच थी जिसमें जन-जन को संतुष्टि देने का कल्याणकारी दर्शन निहित था. अब ब्रिटिश सरकार की नीतियाँ लोक कल्याण से हट साम्राज्य के विस्तार और संसाधनों के अनुकूलतम प्रयोग में ढल गईं. रामजे का जन शासन अब टिक पाने में असमर्थ था क्योंकि वह कठोर नियमों पर नहीं आम जन के हित पर आधारित था. आर्थिक लक्ष्य मानवीय मूल्यों पर भारी पड़ गये ब्रिटिश शासन औपनिवेशिक उत्पीड़न में बदल गया. रामजे अपनी जनकल्याण की नीतियों की उत्कृष्ट दशा से ऐसे अधिकारी के रूप में उभरे जो अपवाद था पर उनके बाद उनकी सोच उनके मानवीय मूल्य व संवेदना परम्परा नहीं बन पाई.

रामजे के साथ ट्रेल, विलियम फ्रेजनर व जे एच वैटन जैसे अधिकारियों की सोच में समानता रही कि पहाड़ के भूगोल को देखते हुए वह भिन्न प्रशासन चाहता है. पहाड़ के विधि-विधान भी स्थानीय परम्परा पर आधारित होने चाहिए. कर लगान कम ही रहें तो आम आदमी की कृय शक्ति बनी रहे. सबसे प्राथमिक तो शासन का विकेंद्रीकृत ढांचा बने रहना था. इन अधिकारियों की रिपोर्ट का महत्त्व इसलिए है क्योंकि यह मात्र भावनात्मक नहीं प्रशासनिक दस्तावेज तो थे ही, ब्रिटिश शासन की अधिकारिक फाइलों का हिस्सा थे. अलग से पर्वतीय प्रशासन की परिकल्पना अधिकारियों ने ही की और उसे व्यावहारिक रूप दिया. प्रथक पर्वतीय राज्य की राजनीति की पहल तो बाद में आरम्भ हुई.

उत्तराखंड राज्य का वैचारिक धरातल तो ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा पहाड़ में प्रशासन के भिन्न स्वरूप को क्रियान्वित करने के प्रयास में निहित रहा. उत्तराखंड के प्रबुद्ध जनों के साथ आम जनता ने इसका समर्थन किया और राजनीतिक आंदोलन के रूप में इसकी परिणति हुई.

पहाड़ संबंधित ब्रिटिश नीतियाँ अर्थात हिमालयी क्षेत्रों के लिए जो प्रशासनिक सिद्धांत बने उनमें स्थानीयता आधारित शासन, कम कर या कर में छूट, भूगोल के अनुरूप नीति को औपनिवेशिक शासन की समाप्ति के बाद अपनाया गया. इसमें विशेष श्रेणी राज्य नीति मुख्य थी. स्वतंत्रता के पश्चात पर्वतीय इलाकों की दुर्गमता, भंगुरता, दूरी व अलग-थलग बिखरे होने के साथ मौसम की प्रतिकूलता जैसी कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड को विशेष आर्थिक सहायता का पात्र बनाया गया. अधिक केंद्रीय अनुदान, कर रियायतें व औद्योगिक पैकेज भी दिए गये यह सीधे उस औपनिवेशिक सिद्धांत से मेल खाता है कि पर्वतीय क्षेत्र को प्रथक नीति चाहिये.

ब्रिटिश काल में भी पहाड़ के जंगलों को संसाधन दोहन व संरक्षण क्षेत्र की तरह लिया गया. स्वतंत्रता के पश्चात इन्हें संरक्षित वन क्षेत्र, आपदा संवेदन क्षेत्र के साथ अन्य कई विभाजन क्षेत्र की श्रेणी में रखा गया. किसी प्रकार के हस्तक्षेप से बचाने के लिए पर्यावरण की मंजूरी लेना भी निर्धारित किया गया.

ब्रिटिश सरकार ने अपनी वन नीति सरकारी नियंत्रण पर आधारित की जिसमें चारा, घास, ईंधन, लकड़ी के उपयोग की सीमाऐं नियत थीं जिनमें समय-समय पर प्रतिबन्ध बढ़ते गए. हक-हकूक के खिलाफ ग्रामीणों ने आवाज उठाई जो आज भी ग्रामीण अधिकार संघर्ष के रूप में विद्यमान है. रामजे काल से वन सरकारी नियंत्रण में आए अब उनका दोहन राजस्व की वृद्धि के साथ विविध निर्माण कार्यों के लिए किया गया. आज की वन नीति व उसमे हो रहे संशोधन व लाये जा रहे नये अधिनियम ग्रामीणों के उनके जंगलों पर अधिकार संकुचित कर देते हैं. पर्यावरण की दृष्टि से विकास योजनाएं अटकती हैं तो कई दशाओं में उनका खुला उल्लंघन भी होता दिखता है इनके विरोध में पहाड़ से ही चिपको जैसे जन प्रतिरोध ने जन्म लिया.

ब्रिटिश अधिकारियों ने भी 1850 के बाद पहाड़ को संसाधन क्षेत्र के दोहन की दृष्टि से देखना आरम्भ किया. उनके लिए क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण नहीं रहा वरन प्राथमिकता तो राजस्व, सामरिक नियंत्रण व सीमांत की सुरक्षा रही. असंतुलित विकास की यह परंपरा अभी भी जारी है जहाँ स्थानीय कला कौशल व काम धंधों के बूते लघु व कुटीर उद्योग उपक्रम विकसित नहीं किए गये. इसीलिए पहाड़ में आज भी उद्योग विहीनता है, सेवा क्षेत्र संकुचित बना है व पलायन जारी है. कारण वही कि आरम्भ से ही इसके मूल ढांचे को आत्मनिर्भर व विकासोन्मुख बनाने के प्रयास निरंतरता युक्त न हो सके.

हालांकि स्थानीय प्रशासनिक इकाईयों में ब्रिटिश कमिश्नर मॉडल की परिणति ही आधुनिक जिला प्रशासन मॉडल में रूपांतरित हुई.आज भी पहाड़ में जिला कलेक्टर व्यवस्था व विकास खंड प्रशासन चलता है.जो उसी पुराने विकेंद्रित शासन का विकसित रूप है. एक और विशेषता राजस्व पुलिस की रही.

आरंभिक ब्रिटिश अधिकारियों ने पहाड़ को एक प्रथक इकाई की भांति निर्दिष्ट करना सैद्धांतिक रूप से सही पाया. स्वतंत्रता के बाद वर्ष 2000 तक कुमाऊं व गढ़वाल मण्डल उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में सम्मिलित रहे. बाजार की अपूर्णता, अर्ध-रोजगार संतुलन और विकास नीतियों के असमंजस हावी रहे. संवेदनशील ब्रिटिश अधिकारियों की सोच रही कि पहाड़ की आर्थिकी छोटे स्तर के उत्पादन व स्थानीय व्यापार पर अवलंबित रहे पर उत्तर प्रदेश का हिस्सा बनने के बाद समूचे राज्य की नीतियाँ ही अधिकांशत: यहाँ क्रियान्वित की गईं जो पहाड़ के भूगोल के अनुरूप न थीं.

आरंभिक ब्रिटिश नीति में राजस्व नीति न्यून कर वसूलने पर अवलंबित थीं जिससे सामाजिक स्थिरता बनी रही पर कालांतर में समान कर प्रणाली केंद्र व राज्य के हिसाब से समान नियमों पर चलीं जिससे पहाड़ी इलाकों को अधिक लागत वहन करनी पड़ी.

ब्रिटिश सरकार में मिश्रित सफलता वाली नीतियों में पंचायती राज लागू हुआ पर संसाधन तो सीमित थे. ग्रामीण विकास की नीतियाँ बनी पर असमान क्रियान्वयन हुआ. कुमाऊं -गढ़वाल के जिन स्थलों को पर्यटन की दृष्टि से अंग्रेज विकसित कर गये बाद में उन्हीं का विकास तीव्र रहा जिससे धारक क्षमता की समस्याएं तीव्र होती रहीं.

स्वतंत्रता के बाद ब्रिटिश मॉडल पूरी तरह न अपनाने के कारणों में नियोजित आर्थिक विकास की रणनीति थी. हालांकि इनके मॉडल भी पाश्चात्य सिद्धांतों पर आधारित थे. पहली योजना में हैरोड -डोमर के विश्लेषण का आधार था जो बचत व विनियोग की औसत व सीमांत प्रवृत्ति पर अवलंबित था. मान्यता थी कि जितना अधिक विनियोग उतनी तीव्र वृद्धि. तब कृषि, सिंचाई व बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता मिली. दूसरी योजना में महलनोबीस की औद्योगिक संरचना का आधार था. दीर्घकालिक औद्योगिक विकास, मशीन व पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना इष्ट रहा. स्थानीय विशिष्टताओं बनाम राष्ट्रीय नीति में मैक्रो नीतियों का ही वर्चस्व रहा. तदन्तर डब्लू आर्थर लेविस का आधार लिया गया कि परंपरागत कृषि क्षेत्र से आधुनिक औद्योगिक क्षेत्र की ओर श्रम का स्थानांतरण होता है. औद्योगिकीकरण व शहरी रोजगार बढ़ाने की सोच इससे प्रभावित थी. फिर कृषि, उद्योग व सेवा क्षेत्र के संतुलित विकास की नीति रागनर नर्क्से की थी जो एक साथ कई क्षेत्रों में विनियोग के पक्षधर रहे.

राज्य को अर्थव्यवस्था में प्रबल भूमिका का निर्वाह करने व निजी पूंजी पर अधिक निर्भरता न होना योजनाओं के लम्बे दौर में हावी रहा. इससे सार्वजनिक क्षेत्र पंगु व अक्षम होता गया. कई सरकारी उद्योगों में घाटा बढ़ते रहा. लाइसेंस-परमिट राज हुआ. लाल फीता शाही प्रबल बनी. 1950 के बाद अगले तीस वर्षों तक वृद्धि दर 3 ~3.5 तक ही सिमटी रही जिसे हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ कहा गया. सरकारी नियंत्रण से आर्थिक प्रगति अवरुद्ध रही. 1991 के आर्थिक सुधार के बाद उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण हुआ. पहाड़ पर इनके अनुकूल प्रभाव सीमित थे. काम की तलाश, परिवार की चिंता व जीवन स्तर की चिंताओं से पहाड़ से पलायन व प्रवास बढ़ता ही रहा.

ब्रिटिश शासन के आरंभिक चरण में स्थानिक विशेषताओं, स्थानीय विकास व परम्परा व सांस्कृतिक घटकों को प्रकट अधिमान मिला. कुमाऊं का प्रशासन ब्रिटिश प्रशासन के अन्य हिस्सों की तरह न था यह विशिष्ट पर्वतीय प्रशासन मॉडल था. तब के प्रशासक क्षेत्रीय संरक्षक जैसे माने गये. धीरे-धीरे स्वतंत्रता के बाद भी मैक्रो नीतियों के प्रभाव में अपनी विशिष्टता से वंचित होता गया. इसीलिए संवेदनशील विश्लेषक व आम जन की सोच यह ही है कि पहाड़ के गुणात्मक विकास के लिए अभी प्रबल प्रयास करने होंगे.

पर्वतीय नीति प्रारूप के स्पष्ट आरंभिक संकेत हैं जिनका ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा अनुभव किया गया व इसे उन्होंने इसे विशिष्ट रूप से लिखा. इनके आधार पर उत्तराखंड राज्य का परिदृश्य विश्लेषण किया जाना सम्भव है.

सर्वप्रथम आर्थिक परिवेश को उच्च वरीयता देनी होगी जिसके लिए निर्मित नीति में स्थानीय संसाधन आधारित उद्योग, सेवा क्षेत्र व डिजिटल गतिविधियों के प्रसार पर ध्यान दिया जाए. अब पारंपरिक खेती के स्थान पर जैविक उत्पाद, जड़ी बूटी, बीज उद्योग व उच्च मूल्य वाली पर्वतीय कृषि हो. परंपरागत अनाज व मसालों सब्जियों के बीज संरक्षित रखने के प्रबल प्रयास हों जिस पर पहाड़ के अनेक जन निरंतर कार्यरत रहे हैं और उन्होंने इसके लिए आंदोलन भी करते रहे हैं.

दूसरा पक्ष है जनसंख्या व सामाजिक ढांचा जिसमें पर्वतीय ग्राम, क्लस्टर आधारित खेती व लघु-कुटीर उद्योग धंधों की वर्तमान दशा में सुधार किया जाना होगा. कस्बों और गाँवों में टेली अंतरसंरचना आधारित स्वास्थ्य व शिक्षा सेवाओं को गुणात्मक रूप से उन्नत करना है. पहाड़ में रोजगार के अवसर खुलने की संभावना से ही रिवर्स माइग्रेशन की प्रक्रिया गति पकड़ सकती है. खाली होते गांव पुनः अपनी श्रमशक्ति वापस पा आबाद हो सकते हैं व उनमें बसाव भी बढ़ेगा. आरम्भ से ही ब्रिटिश अधिकारी गाँवों में जनसंख्या स्थिरीकरण का पक्ष लेते रहे थे. अब यह प्रवृति भी बढ़ रही है कि प्रवासी अपनी भूमि पर लौट रहे हैं और उचित दशा मिलने पर नवोन्मेष में संलग्न हो रहे हैं. यह प्रक्रिया और अधिक गतिशील होगी जब सरकार की ओर से उत्प्रेरक प्रेरणाऐं मिलेंगी.वर्तमान की रोजगार संरचना में सरकारी नौकरियों के साथ सेना, कॉर्पोरेट, संगठित व असंगठित क्षेत्र में संलग्न श्रमशक्ति पहाड़ से है.

स्थानीय आधार पर बने विकास प्रारूप में प्रत्यक्ष व प्रेरित विनियोग किए जाने पर माइस, डिजिटल सेवा व रिमोट वर्क, हर्बल, एग्रो व फूड प्रोसेसिंग, ग्रीन एनर्जी, लोकल क्राफ्ट, स्टार्टअप व अन्य सरकारी-गैर सरकारी सेवाओं का आधार सुद्रढ़ होता जायेगा. स्वयं ही रिवर्स माइग्रेशन की प्रक्रिया संचालित होने लगेगी. राजनीतिक इच्छाशक्ति के ढुल मुल होने व मात्र विज्ञापन केंद्रित होने से वह प्रक्रिया ही नियमित रहेगी जिससे पहाड़ के गांव खाली पड़ते जा रहे हैं. भूतिया गांव कहे जाने लगे हैं.

आरंभिक ब्रिटिश प्रशासन स्थान विशेष की समस्याओं को सुलझाने का दृष्टिकोण रखता रहा. नई पर्वतीय नीति के प्रारूप में अंचल, जलागम, जनपद आधारित आर्थिक नीति, ग्राम स्वायत्त बजट, स्थानीय हितों के अनुरूप भूमि कानून और पहाड़ के लिए अलग नीति क्रिया क्षेत्र का समागम होना टिकाऊ व धारणीय विकास की पूर्व शर्त होनी चाहिये.पहाड़ के लिए संवेदनशील प्रशासक यहाँ विद्यमान संसाधनों का सम्यक विदोहन चाहते थे जो आम जन के हित में हो. आज की व्यवस्था यहाँ के संसाधनों के ईष्टतम दोहन व उससे उपजी विकराल समस्याओं को देखते हुए भी समुचित निदान करने में असहज है. चाहे भू माफिया हो या खनन माफिया उनके राजनीतिज्ञों से रिश्ते सर्वज्ञात हैं. पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन होता आया है. न्यायपालिका का संज्ञान है पर व्यवस्था असमंजस के सिवाय कोई सटीक निर्णय पर नहीं पहुँचती.

पारिस्थितिकी आधारित स्थानीय भागीदारी की पर्वत नीति द्वारा ही उत्तराखंड समावेशी पर्वतीय विकास के मात्रात्मक व गुणात्मक स्तरों पर टिका रह सकता है. इसके लिए प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज और परिस्थितिकी अर्थात लोक थात के चारों आयामों को ले कर “पर्वतीय विकास का प्रारूप” लागू किया जाना भावी रणनीति बने.ब्रिटिश काल के लोकप्रिय प्रशासक यही संकल्पना लेते थे कि मैदानी राज्यों के लिए तय नीतियाँ पहाड़ के लिए अप्रासंगिक हैं इसलिए भौगोलिक आधार वाली आंचलिक नीति पर ही अवलंबित होना प्राथमिकता रहे.

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हर गांव का संसाधन मानचित्र, रोजगार प्रोफाइल, सूक्ष्म परिवार आधारित, लघु व कुटीर उद्योग की योजना तैयार हो और बजट सीधे ग्राम स्तर पर उपलब्ध रहे. रिवर्स माइग्रेशन के पैकेज में जो प्रवासी अपने क्षेत्र में उत्पादन, रोजगार व आय की क्रियाओं से संलग्न हो रहे हों उन्हें भूमि उपयोग अनुमति, स्टार्ट अप अनुदान व समुचित छूट दी जाएँ. हर जिले, अंचल, जलागम की एक विशिष्ट आर्थिक सांस्कृतिक पहचान बने जो स्थान विशेष के आर्थिक क्लस्टर पर आधारित हो.

उत्तराखंड बनने के बाद यह आपदा पीड़ित राज्य बन चुका है. इसलिए सुरक्षित मानक कड़ाई से लागू हों. भू स्खलन, अपक्षरण व निर्माण हेतु भंगुर क्षेत्रों की जाँच की जिम्मेदारी सम्बद्ध संस्थानों को सौंपी जाएँ व उनकी खोजबीन मुख्य आधार बने न कि जननेताओं द्वारा तुष्टिकरण हेतु की गई घोषणाऐं व शिलान्यास का अनवरत सिलसिला लोग देखते देखते ऊब जाएँ. पर्वतीय अनुसन्धान संस्थान का नेटवर्क तैयार हो जिसमें सूझ-बूझ से राज्य की संस्थाओं, विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, अनुसंधान केंद्रों व अन्य लब्ध प्रतिष्ठित एजेंसियों का तालमेल पर्वतीय आर्थिकी, संसाधन, आपदा पर क्रियात्मक व व्यावहारिक शोध की निरंतरता जारी रहे.

आरंभिक ब्रिटिश प्रशासक संवेदन शील थे तो वह नीति निर्माता, लोकप्रिय व प्रशंसा के पात्र रहे. उन्होंने जन भावनाओं को समझा और जनता से प्रत्यक्ष संवाद की स्थिति बनाए रखी. आज की स्थितियां प्रचार व विज्ञापन केंद्रित हैं जिनमें अवसर पाने में कुशल कृपा पात्र बनते हैं. इन परिस्थितियों में राजनीतिक, प्रशासनिक व नैतिक मूल्य व मर्यादा हीन विसंगतियों की जवाबदेही का तंत्र विकसित होना आज के जन-जन की प्रतिक्रियाओं से ही सबल बन सकता है.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : पर्वतीय विकास – क्या समस्या संसाधन की नहीं शासन उपेक्षा की रही?

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