‘…कैंजा (मौसी) ने हमारे कीचड़-मिट्टी से सने कपड़े एक टब में भिगोकर छिपला की मिट्टी का पवित्र घोल बना लिया है और उसे लोटे से गोमूत्र की भांति खेतों में लहलहाती फसल में उलीच रही है. ग्रामवासियों का विश्वास है कि इस पवित्र जल से फसलें कई गुना अधिक हो जाती हैं… कैंजा ने बिना हमारी बात सुने हमारे पैरों के तलवों और घावों में मल दिया, हम संकोच में डूबे कुछ कहने-समझने की स्थिति में न थे. बस, महसूस किया कि छिपला के जात यात्री आस्था की आदिम यात्रा को सम्पन्न कर छिपला का अंश लिये लौटे हैं. यह सम्मान और भावानुप्रेरित पक्ष हमारी स्मृतियों में चिर स्थायी धरोहर बन गया. हम सब चुपचाप इस अनुभव की पूंजी को सहेज कर रख लेना चाहते थे.’ (पृष्ठ – 139)
शिक्षक, सामाजिक चिन्तक और घुमक्कड़ डॉ. ललित पंत की ख्याति देश-दुनिया में हिमालयी समाज के सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्तित्वों में है. सोर (पिथौरागढ़) में 9 जुलाई, 1951 को जन्मे ललित पंत ने राजकीय इण्टर कालेज, धारचूला से सन् 1972 में अर्थशास्त्र विषय के प्रवक्ता पद से अध्यापन कार्य शुरू किया. इसी दौरान, उन्होने शौका तथा वनराजि समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों पर पीएच. डी. की उपाधि हासिल की. अध्यापन, लेखन और घुमक्कड़ी व्यक्तित्व को आत्मसात किए ललित पंत ने हिमालय के अधिकांश हिस्सों की कई अध्ययन यात्राएं की हैं. उनका यह सिलसिला जारी है. ‘पहाड़’ संस्था के संस्थापक सदस्य के रूप में ललित पंत ‘अस्कोट-आराकोट अभियानों’ में सक्रिय रहे हैं. उल्लेखनीय है कि, अस्कोट, पिथौरागढ़ जनपद में और आराकोट, उत्तरकाशी जनपद में स्थित है. ‘पहाड़’ द्वारा वर्ष 1974 से आरम्भ ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ हर दस साल में 1984, 1994, 2004, 2014 और 2024 में आयोजित किया गया है. साथ ही, प्रत्येक अध्ययन यात्रा के अनुभवों का दस्तावेज़ के रूप में प्रकाशन भी हुआ है.
ललित पंत के संयोजन में ‘अपने हिमालय को जानो’ व्याख्यान श्रृंखला बहुत लोकप्रिय है. ‘उना’ द्वारा लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार प्राप्त ललित पंत वर्तमान में स्वतंत्र लेखन से जुड़े हैं. यात्रा-पुस्तक ‘अजपथों से हिमशिखरों तक’ एवं ‘हिमानियों और हिम दर्रों की दुनिया में’ उनकी प्रकाशित कृतियां हैं. ‘अजपथों से हिमशिखरों तक’ यात्रा-पुस्तक में ललित पंत ने पिथौरागढ़ जनपद के उच्च हिमालयी क्षेत्र में की गई तीन यात्राओं को शामिल किया हैं. विगत शताब्दी के आखिर दो दशकों की ये यात्रायें इन क्षेत्रों में मोटर मार्ग आने से पहले की हैं.
लिहाजा, ये यात्रा-वृतांत सड़कों से आई कृत्रिमता से बचे हुए हैं. इनमें स्थानीय प्रकृति और समाज अपने मौलिक और जीवंत रूप में वर्णित है. इसीलिए, काली, कुटी, धौली और पूर्वी रामगंगा नदी-घाटी की वन्यता और वहां के जीवट और जीवंत लोगों के जीवन और जीवका का प्रवाह इसमें निर्बाध रूप प्रवाहित है.
वैसे भी, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री जब यात्रा लेखक भी हो तब उन यात्राओं का पूरा परिदृश्य अपने भूगोल, इतिहास और समाज के साथ जीवंत हो जाता है. और, डॉ. ललित पंत के इन यात्रा-वृतांतों में ये साकार हुआ है.
संस्कृत में बकरी को अज भी कहा जाता है. लिहाजा, उनके द्वारा खोजी और बनाई गई महीन पगडंडी को अजपथ कहा गया है. उच्च-हिमालयी क्षेत्रों में जहां मानव निर्मित रास्ते नहीं हैं, वहां भेड़-बकरियों के बनाये पूर्व निशानों पर चलना ही एक मात्र विकल्प होता है. उस समय यही निशान आगे बढ़ने के लिए सबसे सुरक्षित, सहज और कम दूरी में अगले पड़ाव तक पहुंचाने में मदद करते हैं. इन्हीं अथपथों से हिमशिखरों की ओर की तीन यात्रायें यात्रा-पुस्तक ‘अजपथों से हिमशिखरों तक’ में है.
पुस्तक की पहली यात्रा ‘ज्यौंलिंगकांग ताल में झांकता छोटा कैलास’ जून-जुलाई, 1986 की है. इसमें लेखक के साथ शेखर पाठक, कमल जोशी, चन्द्र सिंह सीपाल और लक्ष्मण सिंह मार्च्छाल सह-यात्री हैं. इस यात्रा-वृतांत को पढ़ते हुए यह बखूबी समझा जा सकता है कि ये सभी यात्राओं के अनुभवी व्यक्तित्व हैं.
तभी तो, सिनला दर्रे (समुद्रतल से 18,030 फीट की ऊंचाई) के आर-पार के दुर्गम अजपथों को ‘हम होंगे सिनला पार एक दिन, मन में है विश्वास…’ गीत जोर-शोर से गाते हुए एक-दूसरे के साथ खुद को खुद से हौंसला देने में ये कामयाब रहे. और, सिनला दर्रे पर पहुंच कर पूरे जोश से फिर गाया कि ‘हम हो गये सिनला पार आज के दिन, मन में था विश्वास, पूरा था विश्वास…’.
यह यात्रा चौदांस, ब्यांस और दारमा क्षेत्र की शौका समुदाय की संस्कृति, जीवन निर्वाह और वहां प्रवाहित काली, कुटी और धौली गंगा का परिचय कराती है. धारचूला, तवाघाट, छलमाछिलासौं, जिप्ती, बूंदी, गर्ब्यांग गुंजी, कालापानी-लिपूलेख, कुटी, ज्यौंलिंगकांग ताल, छोटा कैलास, मंग्स्याधूरा सिनला दर्रे के आर-पार, बेदांग तथा सेला की यह यात्रा रोमांचक ही नहीं इस क्षेत्र को जानने-समझने के द्वार भी खोलती है.
पिथौरागढ़ जनपद (उत्तराखण्ड), नेपाल और तिब्बत से सटे काली, गोरी और धौली नदी क्षेत्र (समुद्रतल से 4000 से 15000 फिट ऊंचाई) की अधिकांश बसासत शौका समाज की है. उच्च-हिमालयी क्षेत्र में पल्लवित शौका समाज का आधार, अतीत और आयाम घुमक्कड़ी रहा है.
शौका समाज हिमालयी ज्ञान और हुनर का धनी है. यायावरी और उद्यमशीलता इसकी पैतृक विरासत है. जो कि आज भी इस समाज की सामाजिक अभिवृत्ति-हिम्मत और हौंसले से समृद्धता की ओर अग्रसर है. देश-दुनिया में तेजी से हो रहे शैक्षिक, सामाजिक और राजनैतिक बदलावों ने हिमालय के सीमान्त समाजों की जीवन शैली को भी प्रभावित किया है.
हिमालय के शिखरों की गोद में शौकाओं के घर-गांव हैं. स्वाभाविक है कि, हिमालय के प्रति इस समाज का आकर्षक पारिवारिक आत्मीयता से ओत-प्रोत है. यही कारण है कि, भारत, तिब्बत-चीन, और नेपाल की सीमाओं से घिरे इस क्षेत्र में आज भी देशों की परिधि से बेफिक्र शौका समाज अपनी जीवंतता और समग्रता में जीता है.
‘…राजनैतिक दृष्टि से भले ही दो राष्ट्रों की अस्मिता आमने-सामने हो पर मानवीयता के दायरे में गहरे सांस्कृतिक बोध में समानधर्मा ग्रामीण समाज का समजीवन अन्तः सूत्रों से अनस्यूत है. इस सीमावर्ती क्षेत्र को देखकर विचार उठता है कि हमारी राजनैतिक विचार दृष्टि के ताने-बाने में, हमारी विदेश नीतियों-कूट नीतियों की घेराबंदी में जीवन का बहता यह सतत प्रवाह अवरुद्ध नहीं हो चाहिए.’ (पृष्ठ- 42)
कैलास मानसरोवर मार्ग में स्थित का यह संपूर्ण क्षेत्र सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध से पूर्व प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र की पहचान लिए हुए था. इसकी बानगी देखिए –
‘भारतीय शौका व्यापारी तिब्बती मण्डियों में छोंगठल (व्यापार कर), रौंगठल (शौका बस्ती पर कर), साठल (भूमि कर), पाठल (धूप पर कर), चेरिंग-चारिंग (चराहगाह कर), छा ठल (नमक पर कर), बा ठल (ऊन पर कर) कितने ही ठल (कर) अदा कर तिब्बतियों से व्यापार करते थे’. (पृष्ठ- 60)
लेखक की दूसरी यात्रा सितम्बर-अक्टूबर, 1990 की ‘नामिक ग्लेशियर बढ़ते कदम दरकती बर्फ’ है, जो कि रामगंगा के उद्गम स्त्रोत नामिक ग्लेशियर तक ले जाती है. सोर पिथौरागढ़ से बला गांव, भाल, उड्यार, रूगेरू ग्वार, थाला ग्वार, टांटी-ठलठोक बुग्याल, चफुआ, सुदुमखान, नौमरा घाघल, घटुली, नन्दाकुण्ड, जोगीबासा उड्यार, नामिक बुग्याल, नामिक ग्लेशियर और राम गंगा के उद्गम स्थल तक की यह यात्रा है. इस यात्रा में दिनेश चन्द्र सिंह बिष्ट, ललित खत्री, डी. एन. पंत, रामसिंह और धनसिंह लेखक के सहयात्री हैं.
तीसरी यात्रा ‘आदिम राहों में आदिम यात्रा-छिपला केदार जात’ है. इस यात्रा के पड़ाव खेलाग्राम, धूरा, ब्रह्मकुण्ड, कोदारद्वौ, बूंगा के ओड्यार, बरमाणों खेला गांव के कौतिक में हैं. 1 सितम्बर, 1987 को शुरू हुई इस यात्रा में लेखक के सहयात्री – दिनेश चन्द्र सिंह बिष्ट, ललित खत्री, शेर सिंह रौतेला, दलीप सिंह और नौ धामी और सैकड़ों जात यात्री हैं.
ज्ञातव्य है कि, प्रत्येक तीसरे वर्ष भूखे पेट और नंगे पैरों से छिपलाकोट ( समुद्रसतह से 14,760 फीट ऊंचाई ) और छिपलाकुण्ड ( समुद्रसतह से 13,252 फीट ऊंचाई ) तक की पैदल ‘छिपला केदार जात’ का आयोजन किया जाता है. स्थानीय लोग छिपलाकोट को नाज्युरीकोट और छिपलाकुण्ड को केदारद्वौ कहते हैं.
पंचचूली शिखरों के दक्षिण में छिपलाकोट शिखर श्रृंखला है. छिपलाकोट शिखर के पूर्वी ढाल से धौली गंगा, पश्चिमी ढाल से गोरी गंगा और दक्षिणी ढाल से काली गंगा का उदगम होता है. विकट भौगोलिक स्थितियों के बावजूद भी छिपला क्षेत्र में कई गांव को बसासत है. छिपलाकोट शिखर में इन गांवों के इष्टदेव छिपलाकेदार प्रतिष्ठापित हैं. मान्यता है कि युद्ध में असुरों से बचने के लिए देवता यहां आकर छिपे इस कारण इस स्थल को छिपलाकोट कहा जाने लगा.
पर्वत, झील, बुग्याल और शिखरों की ओर तीव्र ढ़लानों और ग्लेशियरों से गुजरती आस्था से लबरेज यह अदभुत यात्रा है. रास्तों के पड़ावों में झोड़ा (सामुहिक नृत्य) करते हुए छिपला केदार से सबके कल्याण के लोकगीत संपूर्ण जातयात्रा के 42 किमी. के कठिन रास्तों को तय करने की हिम्मत देते हैं. इस यात्रा के प्रमुख पड़ाव धूरा और बह्मकुण्ड के घनघोर जंगलों में स्थित उड्यारों (गुफायें) में जगह की कमी के कारण बैठकर बारिश, तूफान और बर्फवारी को सहते हुए सारी रात बिताने का रोमांच है. साथ ही, स्थानीय पारिस्थिकीय को खत्म करने में कीड़ाजड़ी (यारसागुम्बा) के अनियंत्रित दोहन की चिन्ता और चिन्तन इसमें है.
‘…116 यात्रियों का हमारा दल इस कन्दरा में समा अवश्य गया किन्तु बैठने भर का स्थान मिला. वर्षा के कारण रात्रि में ठण्ड बढ़ चली थी तो कन्दरा में तीन-चार धूनी (आग) जला दी गयी. इस धूनी के इर्द-गिर्द स्थानीय समस्याओं को लेकर अन्तहीन चर्चा करते हुए तन्द्रा में ही रात बीती.’ (पृष्ठ- 133)
निश्चित रूप में, डॉ. ललित पंत की यात्रा-पुस्तक ‘अजपथों से हिमशिखरों तक’ में शामिल तीनों यात्रा-वृतांत उत्तराखंड के सीमान्त क्षेत्र के परिदृश्य के साथ-साथ अतीत, विगत और वर्तमान में भारत, नेपाल, तिब्बत और चीन के आपसी रिश्तों और विवादों की पड़ताल भी करते हैं. समृद्ध जल-प्रवाह काली नदी और धौली नदी के बारे में तथ्यात्मक बातें इन यात्रा-वृतांतों में हैं.
इन यात्रा-वृतांतों में भारत-नेपाल के मध्य हुई सन् 1815-16 की सुगोली संधि और सन् 1962 का भारत-चीन युद्ध का जिक्र इन देशों के सीमान्त क्षेत्रों में उक्त दो महत्वपूर्ण घटनाओं के बाद के बदलावों को भी रेखांकित करते हैं. स्थानीय शौका, जोहारी और रं समाज अचानक आए इन बदलावों के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था. आज भी उनके मन-मस्तिष्क में इसकी कसक है.
विशेषकर, हिमालयी भू राजनीति में भारत-नेपाल सीमा के बीच स्न 1815-16 की सुगोली संधि के संदर्भ में कालापानी, लीपूलेख और लिम्पियाधूरा की स्थिति और विवाद को इनमें जाना-समझा जा सकता है.
इस किताब में शामिल यात्रायें, सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उत्तराखंड के सीमान्त क्षेत्रों में चीन-तिब्बत के साथ सदियों पूर्व के परम्परागत व्यापार के समाप्त होने के कारण आर्थिक और सांस्कृतिक रिक्तता और त्रासदी को भी बताती हैं. इस नाते भारत-चीन के बीच होने वाले युद्ध के बाद दोनों ओर के सीमावर्ती समाज के राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्तों पर पड़ी दरार के कुप्रभावों का मूल्यांकन इनमें है.
स्वाभाविक है कि ललित पंत की इन यात्राओं में प्रकृति और परिवेशीय समाज के प्रति आत्म-मुग्धता की जगह जमीनी हकीकत और उसके प्रति जज्ब़ा दिखता है. लेखक ने अपने निजी अनुभवों से ज्यादा अहमियत स्थानीय परिवेशीय समाज और प्रकृति को दी है.
ये यात्रायें, शौका समाज की समग्र जीवन-चर्या की मौलिकता को बताते हैं. साथ ही, इस सीमान्त क्षेत्र के पिछडे़पन और भौगोलिक विकटता में नई उद्यमीय जीवन संभावनाओं को तलाशने और उसे हासिल करने के प्रयासों को भी सार्वजनिक करते हैं.
निःसंदेह, ललित पंत की इन यात्राओं के शब्द-चित्रों में कालीवार (भारत) और कालीपार (नेपाल) क्षेत्र की अनुपम वन्यता और बसासतों का मनमोहक दर्शन है. ये यात्रा-वृतांत उच्च-हिमालयी पारिस्थिकीय में विकसित समाज के मन-मस्तिष्क में समायी विराटता और वैभव को महसूस कराते हैं. तभी तो लेखक अपनी यात्रा में इस बात को प्रमुखता से इंगित करता है कि ‘….यदि हिमालय में विनम्र होकर, उससे तादात्म्य स्थापित कर लिया जाय तो हिमालय की हर विकटता व विकरालता भी सुन्दर लगने लगती है और उसकी स्मृतियां अधिक गहरी हो मन में समाती स्थाई हो जाती हैं.’ (पृष्ठ- 121)
कह सकता हूं कि, हिमालय प्रेमी घुमक्कड़ों और शोधार्थियों के लिए यह एक जरूरी किताब है. पुनः एक बेहतरीन यात्रा-पुस्तक के लिए डॉ. ललित पंत जी को आत्मीय बधाई.

वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी अरुण कुकसाल का यह लेख उनकी अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.
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