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‘भूतगांव’ पहाड़ की नब्ज पकड़ता उपन्यास

पत्रकार -उपन्यासकार नवीन जोशी के उपन्यास पढ़ना, पहाड़ की नब्ज पकड़ कर शिद्दत से उसके हाल-हालात जानना और महसूस करना है. फिर चाहे वह उनका चर्चित उपन्यास ‘दावानल’ हो, ‘टिकटशुदा रुक्का’, ‘देवभूमि डेवलपर्स’ या फिर हाल ही में प्रकाशित यह उपन्यास ‘भूतगांव’. उनका हर उपन्यास हमें सैलानियों को बाहर से अपने नैसर्गिक सौंदर्य से सम्मोहित वाले वाले पहाड़ों के दर्द से रूबरू कराता है. विकास के बुलडोजरों से रौंदे, विस्फोटकों से झकझोरे और सुरंगों से छलनी किए जा रहे पहाड़ों  का दर्द. खनन माफिया और हरियाली के लुटेरे ठेकेदारों का दिया दर्द. विकास योजनाओं के नाम पर छले जाने का दर्द.
(Bhootgaon Book Review)

नवीन जी ने राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित अपने इस नए उपन्यास ‘भूतगांव’ में पहाड़ की नब्ज टटोलते हुए पलायन के कारणों और उसकी गहन पीड़ा को बांचते हैं. पलायन के कारणों को स्पर्श करती, मन को बांधती पहाड़ की मार्मिक   व्यथा-कथा कहता है यह उपन्यास. मैंने इसे पढ़ना शुरू किया और पढ़ता ही रहा. उपन्यास की पंक्ति-पंक्ति पढ़ना, पढ़ते-पढ़ते सोच में डूब जाना, वर्णित दृश्यों की मन में कल्पना करना और फिर नींद में वही सब कुछ किसी फिल्म की तरह देखना वक्त लेता ही है. इसका एक अंश मैं पहले ‘बाघैन’ कहानी के रूप में पढ़ चुका था जिसके कारण उपन्यास में पूरी कथा पढ़ने का सम्मोहन भी बना हुआ था.

भूतगांव की यह पूरी मार्मिक  कथा सतौर,सुनाड़ी गांव का रिटायर्ड फ़ौजी आनंद सिंह शेरू कुत्ते से बतियाते हुए बयां करता है. और सुनाए भी तो और किसे सुनाए? गांव खाली हो चुका है.सब लोग जा चुके हैं. अब वहां उस भुतहा गांव में अकेला वह है और है उसका संगी-साथी कुत्ता शेरू. बस. आनंद सिंह फ़ौजी भी वहां है तो बस अपनी इस जिद के कारण  कि फ़ौजी कभी मोर्चा छोड़ कर नहीं जाता. लेकिन, असलियत में उसके भीतर अपने पुरखों के बसाए गांव, अपनी जीमी-जागा से अटूट लगाव है जिसके कारण वह गांव को छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता. और शेरू? शेरू इसलिए है क्योंकि अब तक वह बाघ का निवाला बनने से बचा हुआ है.
(Bhootgaon Book Review)

इन्हीं दो पात्रों के बीच कही गई है फ़ौजी आनंद सिंह की यादों में बसी इस गांव को छोड़ कर चले गए लोगों की कहानी. केवल दो पात्रों के बीच पूरे उपन्यास की कहानी कहना कितना कठिन है, हम यह अनुमान लगा सकते हैं. और वह भी तब, जब श्रोता साथी एक कुत्ता शेरू है जो बोल कर उत्तर भी नहीं दे सकता. बस चुपचाप कभी पूंछ हिला देता है, कभी पंजे से  ठसका देता है या ठंडी नाक से छू देता है. लंबे एकालाप की कठिन चुनौती थी लेकिन उपन्यासकार ने शेरू की जीवंत उपस्थिति से एकालाप की मोनोटोनी कहीं भी आने ही नहीं दी है. पूरे उपन्यास को पढ़ते हुए कहीं भी मोनोटोनी महसूस नहीं होती बल्कि लोगों से खाली हो गए भूतगांव के निपट एकांत और उचाटपन की उदासी का तार लगातार कथा-सूत्रों को जोड़े रहता है.

हर रोज वह अकेला रिटायर्ड फ़ौजी आनंद सिंह शेरू के साथ गांव के खंडहर हो गए और हो रहे मकानों का जायजा लेता है, कहीं दीया जला देता है इस आस में कि शायद उस घर के बाशिंदे एक दिन लौट आएंगे, किसी मकान की ढालूदार पाथर छांई छत के पाथरों का मिलान कर देता है कि बारिश का पानी भीतर न टपके और कहीं किसी मकान की ढहती दीवार को सज देता है. छुरमल ज्यू देवता के मंदिर में घंटा बजा कर हाथ जोड़ आता है कि हे देवता दयालु होना, सबका भला करना. देवता की बिनती में भी यह आस कि किसी दिन लौटेंगे उसके गांव के बाशिंदे, उनके बाल-बच्चे.

धीरे-धीरे पेड़ की जड़ों की तरह फैलती है पलायन की यह कथा. गांव से पान सिंह नेगी के इंटर पास बेटे वीरेन्द्र और गांव के हलवाहे चनरराम की बेटी हिरुली उर्फ़ हीरा की प्रेमी जोड़ी बिना कुछ सोचे-समझे लखनऊ की राह पकड़ लेते हैं. किस्मत साथ देती है और ट्रेन में  मिले सिंचाई विभाग के एक कर्मचारी की मदद से लखनऊ में उसी विभाग के निस्संतान दम्पति अधीक्षण अभियंता गोविंद नारायण माथुर और उनकी धर्मपरायण पत्नी की कोठी में पहुंच जाते हैं. वहां इस भगोड़े जोड़े को माथुर दम्पति का भरपूर स्नेह मिलता है. वे इनकी शादी करा देते हैं. इनका तो भविष्य बनने लगता है लेकिन पीछे छूटे गांव में जातिवादी दंश से मारपीट कर गरीब शिल्पकार चनरराम के परिवार का पलायन करवा दिया जाता है. कहां, कोई नहीं जानता.
(Bhootgaon Book Review)

जाति-बिरादरी की नाक का सवाल वीरेन्द्र की वापसी को असंभव बना देता है, बहिन नदी में डूब कर आत्महत्या कर लेती है और छोटा भाई आनंद सिंह घर से भाग कर फ़ौज में भर्ती हो जाता है. पिता गुमसुम हो जाते हैं और बहिन की मौत के दुख से मां की जीवन लीला समाप्त हो जाती है. घर में  रह गए बस गुमसुम पिता और दुखी, कर्मठ आमा.

उधर वीरेन्द्र टाइपिंग सीख कर माथुर साहब की कृपा से जल विभाग में टाइपिस्ट की सरकारी नौकरी पा लेता है. वीरेन्द्र और हीरा के दो बच्चे हो जाते हैं – विनायक और मीरा. विनायक पढ़-लिख कर इंजीनियर बन कर और मीरा पुराने दस्तावेजों के रीस्टोरेशन की कुशल विशेषज्ञ बन कर विदेश चले जाते हैं. यानी, पलायन की जड़ें गांव से लखनऊ और फिर नई पीढ़ी के साथ विदेश तक फ़ैल जाती हैं. माथुर दम्पति रिटायरमेंट के बाद भारद्वाज आश्रम, ऋषिकेश में स्थायी रूप से चले जाते हैं और जल विभाग के अपर डिवीजन क्लर्क वी.एस.नेगी उर्फ़ वीरेन्द्र सिंह नेगी उनकी कोठी से, महानगर में बने अपने नए घर ‘उड्यार’ में शिफ्ट हो जाते हैं.

घर में अब केवल वही दो प्राणी रहते हैं यानी वी.एस.नेगी और हीरा. लेकिन, रुकिए जरा….

उन दोनों के बीच एक अचानक एक तीसरे प्राणी की आवाजाही शुरू हो जाती है. वीरेन्द्र अपना अतीत टटोलते-टटोलते तीसरे प्राणी के संग-साथ में सुकून पाने लगता है और अपने ‘देवता’ की बढ़ती बेरुखी को चुपचाप महसूस करती हीरा अपने मन में संजोए सुंदर संसार के छिन जाने की आशंका से गहरे अवसाद में डूबती चली जाती है. वह महज मेडिकल कॉलेज और प्राइवेट अस्पताल के मनोवैज्ञानिकों की पेशेंट बन कर रह जाती है.
(Bhootgaon Book Review)

लेकिन, एक दिन मिस्टर वी.एस.नेगी अचानक गिर पड़ते हैं और गहरी चोट के साथ लखनऊ के ‘सुखाश्रम’-स्पेशल जीरियाटिक केयर हास्पिटल’ में भर्ती कर दिए जाते हैं. बेड पर लुंज-पुंज पड़े वी.एस. नेगी की अब नई पहचान बन जाती है- पेशेंट नंबर 21.

नियति का खेल… बीमार पापा-मम्मी लखनऊ में, बेटा कैलीफोर्निया और बेटी कल जर्मनी, आज जापान और कल कहां, पता नहीं. बीमार माता-पिता की सेवा कर रहा है गढ़ाकोला,उन्नाव का कुंदन. बेटा-बेटी का फोन आता है हालचाल पूछने के लिए, उत्तर देता है सुखाश्रम का वरिष्ठ डॉक्टर या फिर कुंदन. नंबर-21 को तो यह भी पता नहीं कि फोन पर कैलीफोर्निया से किसने कहा-“हाय ग्रैंडपा!” और कौन है वह हिलेरी और रोमिल कौन?

यह तो भूत गांव की इस व्यथा-कथा का केवल बाहरी फ्रेम है. पूरी कथा तो उपन्यास को पढ़ कर ही पता लग सकती है. और, तभी यह भी पता लगेगा कि खाली हो गए उस गांव बतौर में दम-खम से डटे उस अकेले फ़ौजी आनंद सिंह और उसके एकमात्र साथी शेरू का क्या हुआ?

पलायन की परिस्थितियों में पहाड़ की गहन पीड़ा से मन को झकझोर देने वाली मार्मिक व्यथा-कथा का दस्तावेज़ है- ‘भूतगांव’.
(Bhootgaon Book Review)

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देवेन्द्र मेवाड़ी

वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

इसे भी पढ़ें:  लोक देवता लोहाखाम

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