कॉलम

शऊर हो तो सफ़र ख़ुद सफ़र का हासिल है – 11

यूपीएससी उपासक की वेदना

अभी पंकज सर और देवेन्द्र `चुरू’ मिले कॉरीडोर में. दोनों ऐसे चल रहे थे जैसे कोई वू-डू करके चला रहा हो. वू-डू भी नहीं बल्कि जैसे कल हेमा मैडम बता रही थीं कि यहाँ पहाड़ों में जागर7 लगता है, उसमें जैसे किसी न किसी पर देवी या देवता आ जाते हैं, फिर वो अपने में नहीं रह जाता, चलते-चलते झूमने लगता है… झूमते-झूमते कुछ बोलता है और बोलते-बोलते चीखने लगता है. पता नहीं कैसे पर सब सच-सच बताने लगता है. वैसा ही लग रहा था इन दोनों को देखकर. चल रहे थे, झूम रहे थे, बोल रहे थे और रात के इस पहर में उनका फुसफुसाना भी लग रहा था कि चीख रहे हों. बोल भी सच ही रहे थे- `साला आख़िरी अटेम्प्ट है, घंटी बजाते बजाते थक गए, कोन जाने खुलता भी है या नहीं किस्मत का ताला. छुट्टी मिल नहीं रही.’ लगे हुए हैं दोनों यूपीएससी देवता को मनाने में.

 

अजीब मंदिर है ये भी! इतना विशाल की अन्दर आने में पूरा एक साल लगता है और मजे की बात, जरूरी नहीं कि अन्दर आने ही दिया जाए. जब तक आप अपनी फूल मालाएं, चढ़ावे, अक्षत आदि संभालते, एक दूसरे की धूल, पसीने और दुर्गन्ध को झेलते झेलाते, कुछ क्रुद्धःकपि टाइप के लोगो की टांग खिंचाई और टंगड़ी फंसाई से बचते बचाते दरवाजे तक पहुचते हैं कि भड़ाक! दरवाजा बंद… शो का टाइम ख़तम हुआ जैसा फिर बैठे आप कान खुजाइये और सर धुनिये की कलुए साले का तो चढावा भी कम था फिर कैसे अन्दर हो गया?

 

ये पहला मंदिर देखा मैंने जहां परिक्रमा पहले होती है मंदिर की, दर्शन बाद में. चार परिक्रमाए- चार मौके… अन्दर जाने के लिए तीन दरवाजे भयंकर. पहले दरवाजे की हाईट थोड़ी कम है इसलिए बड़े बड़े अकडू जो झुकते नहीं… इस महादेव के आगे सर नहीं नवाते भिड़ जाते है भड़ाक से… फिर सर पर गूमर लिए घूमते है और इंतजार करते है दूसरी परिक्रमा… दूसरी बार इस दरवाजे के खुलने का. ये दरवाजा थोड़ा चौड़ा है इसलिए बहुत से दर्शनार्थी लाँघ जाते हैं. दरवाजे पर दो घंटिया हैं, दोनों में आपस में कोइ मेल नहीं, बजानी दोनों पड़ती है. बज गयी तो वाह जी वाह नहीं तो फिर से घूमो.

 

अगला दरवाजा अचानक बहुत ही संकरा हो जाता है, कुछ ही तीस मार खां इससे पार हो पाते हैं. घंटियाँ भी यहाँ एक से एक बड़ी, तोप जैसी. हाथ घिस जाते हैं पर आवाज नहीं निकलती. बज गयी तो ठीक नहीं तो बाहर आउटर कॉर्डन  में.

 

इसके बाद का दरवाजा है सबसे जबरदस्त, गर्भ गृह का दरवाजा. दरवाजे पर घंटियाँ नहीं हैं, देवदूत हैं चार- पांच. मानो अन्दर के भगवान ने अपने सिपाही लगा रखे हों. इतने खतरनाक की सांस अटक जाती है आने वाले की. पूरा वेद, पुराण, मंत्र, आरती सब बांच दो इनके आगे पर टस से मस नहीं होते और मजे की बात, आपके चहरे पर हवाइयां उड़ रहीं हों, पसीने से शर्ट का रंग धुल गया हो, धड़कन की आवाज दो फिट दूर से हथौड़े के माफिक सुनाई दे रही हो, पर इनके कानो पर जू नहीं रेंगती दिखती. दुनिया जहां की बाते बता दें इन्हें पर अचानक पूछ बैठेंगे कि तुम्हारे घर के पिछवाड़े वाली गली के आखरी मकान के पिछले दरवाजे पर कितनी खूँटियाँ हैं, लो कर लो बात! तो जनाब इन देवदूतों से पार पाना आसमान से तारे तोड़ लाने के बराबर है कम से कम मुझ जैसे कम अक्ल अहमकों के लिए तो ऐसा ही है.

 

पिछले जन्मों के अच्छे कर्म चाहिए या इस जन्म का साम-दाम-दंड-भेदी प्रयास, माथे पर इबारत चाहिए या हाथों में लकीरें, माँ बाप का आर्शीवाद चाहिए या दोस्तों की निर्दोष दुआएं, व्यक्तित्व की सच्चाई चाहिए या कृतित्व में गंभीरता, मन की सत्यता चाहिए या मस्तिष्क की तीक्ष्णता, वस्तुस्थिति का धरातल चाहिए या सपनों का जाल चाहिए, आस चाहिए, विश्वास चाहिए… जाने क्या क्या चाहिए इस ईश्वर के दर्शनों को.. मैं तो अब तक जान ना सका!            

   

हा! हा! एक यूपीएससी उपासक की वेदना!

 

अमित श्रीवास्तव

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं.  6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता)

(पिछली क़िस्त से आगे)

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