छलिया मेरा नाम

हिंदुस्तान के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर कई फ़िल्में बनी हैं. ऐसी ही एक फ़िल्म थी ‘छलिया’ (1960). फ्योदोर दोस्तोवस्की के नॉवेल ‘वाइट नाइट्स’ पर आधारित. पार्टीशन में कई परिवार बिछुड़े थे, इधर भी और सरहद पार भी. मार-काट अपने चरम पर थी. हर तरफ़ आग-जनी और चीखें. बचाओ-बचाओ और रहम करो की पुकार…दिल दहल उठे.

ऐसे ही माहौल में लाहोर से केवल (रहमान) का परिवार हिंदुस्तान आने के लिए किसी तरह छुपते-छपाते निकलता है. मगर अफ़रा-तफ़री में उसकी पत्नी शांति (नूतन) छूट जाती है. इससे पहले की वो वहशियों का शिकार बने, एक पठान अब्दुल रहमान (प्राण) उसे बचा लेता है. उसे अपने घर में पनाह देता है. वो है तो शैतान, लेकिन उसके दिल में एक रहमदिल इंसान भी है. उसने शांति को बहन का दर्जा दिया. उसे हमेशा परदे में रखा. वो उसे उसकी आवाज़ और पैरों से पहचानता है. शांति एक बच्चे को जन्म देती है. पांच साल का अरसा गुज़र चुका है. वो हिंदुस्तान वापस जाना चाहती है.

शांति क़रीब दिल्ली आती है. लेकिन यहां आकर उस पर मानों बिजली गिरती है. उसे उसका पति केवल उस वक़्त अपनाने से इंकार कर देता है, जब उसका बेटा अपना नाम अनवर और बाप का नाम अब्दुल रहमान बताता है. शांति के माता-पिता भी उसे बदनुमा करार देते हैं.

हर तरफ से मायूस शांति बच्चे को अनाथालय में छोड़ कर आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती है. लेकिन ऐन मौके पर छलिया (राजकपूर) उसे ऐसा करने से रोकता है. वो उसकी रामकहानी सुन कर पसीज उठता है. अपने घर में पनाह देता है. वक़्त गुज़रता है. छलिया मन ही मन शांति से प्यार करता है. इससे पहले कि वो अपनी मोहब्बत का इज़हार करे, शांति उसे बताती है कि वो सिर्फ़ अपने पति की है और बड़ी शिद्दत से उसे चाहती है.

इधर एक दिन अब्दुल रहमान लाहोर से दिल्ली आता है. उसे अपनी खोई बहन सक़ीना की तलाश है और छलिया से कोई पुराना हिसाब बराबर करना है. यहां से फ़िल्म बिलकुल फ़िल्मी हो जाती है. उन दोनों में भयंकर फाईट होती है. इससे पहले कि छलिया रहमान का काम तमाम करे, बीच में शांति आ जाती है – मेरे भाई को मत मारो.

रहमान को बहुत ग्लानि होती है. वो निराश होकर लाहोर वापस चल देता है. लेकिन ट्रेन में उसे अपनी बहन सक़ीना मिल जाती है. फ़सादात में उसकी हिफाज़त करने वाला एक हिन्दू पिता उसे लाहोर छोड़ने जा रहा था. इधर नेक छलिया शांति और उसके बच्चे को ड्रामाई तरीक़े से दशहरा मेले में फिर से मिला देता है. लेकिन मैसेज बहुत साफ़ था। ये भगवान की मूर्ति है….क्या सबूत कि इसमें भगवान है?…. ये यक़ीन विश्वास की बात है…. क्या सबूत कि इस तस्वीर में दिख रहा शख़्स तुम्हारा पिता है.

बॉक्स ऑफिस पर औसत ये फ़िल्म मनमोहन देसाई की पहली डाइरेक्टड फ़िल्म थी और इसी से उन्होंने खोया-पाया का सफ़ल मूल-मंत्र तलाश लिया था, जिसे उन्होंने आने वाली दर्जन भर फिल्मों में रिपीट किया. कल्याणजी-आनंद का म्युज़िक और ओम प्रकाश भंडारी उर्फ़ क़मर जलालाबादी के गाने बहुत हिट हुए थे.

….बाजे पायल छम छम होके बेक़रार…छलिया मेरा नाम…तेरी राहों में खड़े हैं दिल थाम के…मेरे टूटे हुए दिल से…डमडम डीगा डीगा… लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल उन दिनों कल्याणजी-आनंद जी के सहायक होते थे. राजकपूर ने एक्टर राजकपूर की माफ़िक़ ही एक्टिंग की. नूतन लाजवाब रहीं.

वो दोनों फिल्मफेयर अवार्ड के लिए नामित भी हुए. सबसे बढ़िया रहे प्राण. शायद पहली बार बुरे किरदार करने वाला एक नेक इंसान के किरदार में नज़र आया था. नूतन की मां शोभना समर्थ भी उनकी मां के छोटे से किरदार में दिखीं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

उत्तराखण्ड में वन्य-जीवों का आतंक

10 मार्च 2026 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड के वन मंत्री ने विधानसभा…

23 hours ago

उनके बारे में जो सिर्फ नाम नहीं जीवन हैं

गोविंदा, रघु, रामकली, चंदा, कृष्णा दा, सूर्या... नाम नहीं जीवन हैं कई दिनों से राजधानी…

1 day ago

उत्तराखण्ड के आयुष के हाथ में दिल्ली की रणजी टीम की कमान

विश्व क्रिकेट के दिग्गज विराट कोहली भी अब टिहरी गढ़वाल के देवप्रयाग निवासी आयुष बड़ौनी…

1 day ago

उत्तराखण्ड की उन्नति शर्मा ने देश का गौरव बढ़ाया, कॉमनवेल्थ -26 में जीता कांस्य

उत्तराखंड की एक और बेटी ने फिर दुनिया में देश का नाम रोशन किया है.…

1 day ago

बचपन से छीन ली गई बचपन की तस्वीर

यह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत तस्वीर है. इस से पहले मैंने ऐसी तस्वीर नहीं देखी,…

2 days ago

खसों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययन

डीएनए, आनुवंशिकी और मानवशास्त्र की दृष्टि से एक वैज्ञानिक समीक्षा भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में यदि…

4 days ago