कॉलम

शऊर हो तो सफ़र ख़ुद सफ़र का हासिल है – 10

पुलिस का चेहरा बदल रहा है

आज आई जी ए के रतूड़ी सर का व्याख्यान हुआ. रतूड़ी सर बोलते हैं तो उनकी आँखें चमकती हैं, लगता है आँखों ही आँखों में सामने वाले को अंदर बाहर से स्कैन कर लेते हैं. पुलिस सेवा के साथी तो बहुत ही प्रभावित दिखाई दे रहे थे.

`it has been a long journey from colonial to a representative form of government. Police is the organisation which has evolved tremendously from an oppressive force to a facilitator’…   

…तीन चीजें याद आ रही हैं. पहली सराय पोख्ता पुलिस चौकी की. 98-99 की बात होगी. प्रभाकर का चालान (उसकी स्कूटर एलएमएल वेस्पा का) हो गया था शायद, या कोई और बात थी, ठीक से याद नहीं. वैसे भी आज दुनिया पलट रही है मेरी, वर्ना तो हम जैसे लोग पुलिस को चोर और चालान से ही रिलेट कर पाते थे. चालान की ही संभावनाएं ज्यादा हैं क्योंकि भले ही शक्ल से प्रभाकर `माखन चोर-नन्द किशोर’ लगता था, और अपने आप को, हरकतों से धड़ाधड़ चितचोर साबित करता जा रहा था, असली वाली चोरी… नहीं-नहीं. उसने कहा `सराय पोख्ता वाली पुलिस चौकी चलना है,’ मैंने तब तक डर पर काबू करना सीख लिया था इसलिए कहा `चलो.’

जौनपुर में ओलन्द्गंज चौराहे से दाहिने घूमकर एक पेट्रोल पम्प पड़ता है प्रभाकर ने स्कूटर वहीं खड़ा कर दिया और एक गलीनुमा रास्ते की तरफ मुड़ चला. मैंने कहा `वहाँ कहाँ जा रहे हो लगी है क्या?’ वो पीछे मुड़कर हंसा और बोला `अबे चौकी में जा रहे हैं.’ मेरे तो होश फाख्ता हो गए. इतने सालों से मैं जिस स्थान को सार्वजनिक शौचालय समझ रहा था वो एक पुलिस चौकी थी…

`yes I accept, service conditions are not upto the mark, but we have come a long way ahead.’

दूसरी याद है साही दरोगा की. ये और पहले की बात है. टी डी इंटर कॉलेज में था मैं. शायद फर्स्ट इयर में. वैसे तो हमारा आना जाना पीछे वाले गेट से होता था क्योंकि वो नजदीक पड़ता था लेकिन उस दिन जाने क्यों मंदिर के बगल वाले मेन गेट से एंट्री कर रहा था. अचानक भगदड़ सी मच गयी. बहुत से लड़के कॉलेज के अंदर की तरफ भागने लगे. मुझे बिलकुल समझ नहीं आया कि हुआ क्या. मैंने एक भागते लड़के से पूछा तो उसने हांफती आवाज में बताया `सा…ही… आ गया…साही.’ तब तक जंतु विज्ञान में दीदा न लगने के बाद भी मेरी आँखों के आगे कांटे जैसे बालों वाले एक जानवर का चित्र घूम गया. मुझे लगा लड़के इतने बड़े होकर भी ऐसे डरते हैं. मैंने वहीं खड़े होकर देखने का निश्चय किया.

थोड़ी देर तक ये भागम भाग होती रही फिर धक् धक् धक् धक् करती हुई बुलेट मोटर साइकिल बी आर पी इंटर कॉलेज की तरफ से आयी और लाइन बाजार की ओर चली गयी. उस पर एक पुलिस वाला बड़े ठसके के साथ बैठा दिखाई दिया. आँखों में भय कौतुभ और प्रशंसा का भाव लिए मुह खोले उसे देख रहे लड़के ने बताया `इहै हौ साही दरोगवा… बड़ी मरान मारत ह.’ किसी भी पुलिसवाले की वो पहली छवि बनी मन में जो आज तक कायम है.

     …`some times what you call it hanak… your ruab works as a detterant.’

तीसरी याद है उस कविता की जो अशोक चक्रधर से बुरी तरह संक्रमित होने के दौरान मैंने लिखी थी, जिसका शीर्षक है `स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में है’ और जिसे यहाँ दुबारा यादकर के अपनी स्थिति तनावपूर्ण नहीं कर सकता.

बग्गा साहब में बहुत सी संभावनाएं दिखती हैं हमें. `ग्रीब और पछड़े हुए लोगों को रोट्टी चाहिए.’ लंबा चौड़ा कद. हृष्ट-पुष्ट सरदारजी. बातें करते- करते दोनों हाथो से भवों को उमेठने लगते हैं. ठीक वैसे ही जैसे `हम लोग’ सीरियल में विनोद नागपाल किया करते थे.

मूंछे उमेठने वालों से भवें उमेठने वालों की तबियत अलग होती है. संस्कृति अलग होती है. अभी तक मूंछे उमेठने की संस्कृति थी प्रचलन में. मर्दानगी का सबूत मानी जाती थीं मूंछे. ये कौन सी बायोलोजिकल मर्दानगी हुई, पता नहीं. इस हिसाब से मैं मर्द नहीं. वैसे जिस सोशियोलोजिकल व्यवहार के मानी बताई गयी हैं ये मूंछे (और उसका प्रकटीकरण उमेठने से होता है) उस लिहाज से अगर मैं मर्द नहीं तो न सही. अब लगता है भवें उमेठने की संस्कृति है. गो कि भवें दमाग (ये शब्द भी बग्गा साहब की उच्चारण शैली की वजह से) के ज्यादा करीब होती हैं. भवें उमेठना मतलब दमाग (उमेठना?) का प्रभुत्व दिखाना है. जहां तक मुझे याद है भइये विनोद नागपाल खासा निगेटिव कैरेक्टर था हम लोग में.

तो बग्गा साहब को क्लीन चिट मिल गयी ताज कॉरीडोर केस में कोर्ट से. जाने क्यों क्लीन चिट से मुझे आशीष शुक्ला याद आ जाता है. आठवीं की परीक्षा थी शायद छमाही. जनक कुमारी बाल शिक्षा निकेतन, उ. मा. विद्यालय, जौनपुर की प्रधानाचार्या (जिन्हें हम बड़ी मैंडम कहते थे) के बनाए हुए खतरनाक नियम-क़ानून के बीच भी कुछ महान जीव थे जो सूराख ढूंढ ही लेते थे. उस दिन शायद अंग्रेजी प्रथम और लंच के बाद अंग्रेजी द्वितीय का पेपर था. हाफ टाइम में हम (यानी मैं और निखिल श्रीवास्तव, जो बाद में जाने किसका हित साधने के लिए हितेंद्र हो गया था) अपनी रोज की मटरगश्ती के तहत उस छत पर जा पहुंचे जहां सेन्ट्रल हाल के चारों तरफ बने कमरों के ऊपरी रोशनदान खुलते थे. अचानक उन्ही में से एक रोशनदान से चीखोपुकार सी आवाजें आने लगीं. हमने झांका तो पाया कि आशीष शुक्ला और अनंजय सिंह किसी निरीह से लगने वाले बालक पर पिले पड़े थे. आशीष के मुह के कोनों से झाग, झाग के कोनों से धारदार गालियाँ और गालियों के कोनों से कुछ अपुष्ट से शब्द निकल रहे थे जिन्हें हम दोनों ने अपनी समझ के हिसाब से ये बनाया- `अबे तोसे पहिला, चउथा कोशचनवा लिखि के भेजवावै बिदा कहे रहे तू ससुर हम्मै क्लीन चिट भेजवाई दिह.’ कुल मिलाकर बात ये कि ये लड़का इनको जवाब लिखकर भेजने में फेल हो गया था फलस्वरूप ये इम्तिहान में फेल होने के कगार पर थे.

फिर बग्गा साहब क्लीन चिट से पास कैसे हो गए?

 

अमित श्रीवास्तव

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं.  6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता)

(पिछली क़िस्त से आगे)

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Girish Lohani

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