इस कहानी को विलियम एस. सैक्स की पुस्तक God of Justice से लिया गया है. यह पुस्तक गढ़वाल और मध्य हिमालय क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं और लोकदेवताओं पर आधारित एक अध्ययन है. पुस्तक में भैरव जैसे देवताओं की पूजा, उनसे जुड़े अनुष्ठान और स्थानीय समाज में उनकी भूमिका का वर्णन किया गया है. इसमें विशेष रूप से हरिजन समुदाय के धार्मिक अनुभवों और विश्वासों पर ध्यान दिया गया है. लेखक ने क्षेत्र में रहकर लोगों से बातचीत कर उनके जीवन को समझा है. काफल ट्री के लिए विलियम एस. सैक्स की पुस्तक God of Justiceके इस हिस्से का अनुवाद मंजुल ने किया है – सम्पादक
गढ़वाल में भैरव अनेक रूपों में प्रकट होते हैं, जिनमें से कई रूपों पर इस पुस्तक में चर्चा की जाएगी. उनका सबसे महत्वपूर्ण केंद्र कालेश्वर का मंदिर है, जिसे बोलचाल में काल्द कहा जाता है, जो बद्रीनाथ मार्ग पर कर्णप्रयाग से कुछ मील पूर्व में स्थित है, और गैरसैंण के पास कोठ्यार का मंदिर स्थित है. भैरव का वह रूप जो हरिजनों से सबसे अधिक निकटता से जुड़ा हुआ है, कचिया है, जिसे अक्सर कचिया-भैरव कहा जाता है. कचिया स्वयं भी अनेक रूप धारण करता है, जिनमें से कुछ विशेष व्यक्तियों से जुड़े हैं, जैसे लालू दास का कचिया, या कुछ विशेष स्थानों से जुड़े हैं, जैसे डोल गांव का कचिया.
पहली बार जब मैंने कचिया भैरव के बारे में सुना, तब मैं अपने मित्र आर. पी. नौटियाल के साथ सड़क पर गाड़ी चला रहा था, जो एक स्थानीय वकील हैं. वह बरसात का मौसम था, और तेज़ बारिश हो रही थी. जब हम कालेश्वर गांव से होकर गुज़रे, तो नौटियाल ने बताया कि वहाँ एक ऐसे देवता का महत्वपूर्ण मंदिर है जो स्थानीय हरिजनों से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि स्थानीय लोग इस स्थान को काल्द बगड़ कहते हैं. ठीक उसी समय उन्होंने देखा कि शांति लाल, जो स्थानीय डाकिया हैं और विशेष रूप से जानकार व्यक्ति हैं, सड़क पर चल रहे हैं. हमने गाड़ी रोकी और उनसे गाड़ी में बैठने को कहा. वे साक्षात्कार देने के लिए तैयार हो गए. मैंने अपना टेप रिकॉर्डर चालू किया, और लगभग बिना रुके शांति लाल ने मुझे बताना शुरू किया कि वहाँ भैरव पहली बार कैसे प्रकट हुए.
स्थानीय कथा यह है कि हमारा एक पूर्वज कुमाऊँ से आया था. वो भटौली गांव के पास एक स्थान पर पहुंचा, जहाँ दो परिवार रहते थे, एक लोहार का और एक ढोल बजाने वाले का. हमारा पूर्वज अपने साथ एक बहुत ही उग्र देवता लाया था, और जब वो आदेश देता था, तो वह देवता लोगों पर आक्रमण कर देता था. यह बार-बार होने लगा, और भटौली के लोग क्रोधित हो गए. उन्होंने कहा, “या तो हम इस आदमी को भगा दें, या इसको मार दें.” किसी ने उसे बताया कि उसे वहाँ से चले जाना चाहिए, क्योंकि उसकी जान खतरे में है. तब वह अपने साथ देवता की सारी विशेष वस्तुएँ लेकर चला गया, लोहे का चिमटा और मंदिर के पास रखा तिमूर का डंडा.
वह कर्णप्रयाग गया, उस समय के लोगों के लिए यह उतनी ही दूर की जगह थी जितनी आज आपके लिए दिल्ली है, और फिर वह इस ओर आया. उसने अपनी टोकरी पीठ पर लादी, यहाँ आया और बैठ गया. उसने देखा कि ज़मीन बहुत अच्छी है, चौड़े खेत हैं, बहुत उपजाऊ भूमि है. उसने अपनी टोकरी नीचे रखी, और जब उसे दोबारा उठाने की कोशिश की, तो पाया कि वह उसे उठा नहीं पा रहा है. वह बार-बार कोशिश करता रहा, लेकिन वह उसे उठा नहीं सका. अब उसके सामने समस्या थी, उसे यहाँ रात बितानी पड़ी. और रात के दौरान, देवता ने एक छोटे पक्षी के माध्यम से उससे बात की और कहा, “मुझे यह जगह पसंद है. मैं यहीं रहना चाहता हूँ.” और क्योंकि वह एक बहुत आध्यात्मिक व्यक्ति था, वह वहीं रुक गया.
कहा जाता है कि हमारे उस पुराने बाबा में बहुत शक्ति थी. वह देवता से कहते थे कि तंबाकू ले आओ, और देवता उनके लिए तंबाकू ले आता था. यह चार या पाँच पीढ़ी पहले की बात है. बाद में यह स्थान बहुत प्रसिद्ध हो गया, और लोग देवता को बहुत सम्मान देने लगे. लोग मानते हैं कि उसमें बहुत शक्ति है, और उसके फैसले बिल्कुल सही होते हैं. लेकिन हमारे पूर्वजों ने उसे मंदिर बनाकर देना उचित नहीं समझा, इसलिए उन्होंने मंदिर नहीं बनाया. इसका कारण यह था कि वह नदी के किनारे रहता था, जहाँ श्मशान घाट है. उन्होंने उसे वैसे ही रहने दिया जैसा वह था. तांत्रिक पद्धति यह है कि देवता को धरती के भीतर ही रखा जाना चाहिए. और वहाँ श्मशान घाट है, जलती हुई लाशें हैं, और सब कुछ उसके नियंत्रण में है. आज भी वही उस स्थान का प्रभारी है. वह झगड़ों का निपटारा करता है, लोगों को ऊँचे पद दिलाने में मदद करता है, पदोन्नति दिलाता है, विनाशकारी झगड़ों से बचाता है. वह यह सब काम पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए करता है. लोगों को उस पर विश्वास है. और सबसे बड़ी बात यह है कि समाज के कमजोर वर्गों, हरिजनों, के हाथ में वही एकमात्र शक्ति है.
एक और बहुत महत्वपूर्ण बात है जो मैं आपको बताना चाहता हूँ, जो केवल हमारे देश के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए बहुत महत्व रखती है, और वह यह है कि मेरे पूर्वजों ने दो देवताओं को एक साथ जोड़ा, एक मुस्लिम देवता और एक हिंदू देवता. भैरव हिंदुओं के देवता हैं, नरसिंह हिंदुओं के देवता हैं, और उनके साथ एक मुस्लिम देवता भी है, जिसे हम मामिंदा कहते हैं.
यदि कोई देवता की पूजा करना चाहता है, तो हम ही उसके पुजारी होते हैं. देवता तभी शांत होता है जब हममें से कोई वहाँ उपस्थित हो. यह भी आवश्यक नहीं है कि पुजारी वयस्क ही हो, वह बच्चा भी हो सकता है. वह वंश का कोई भी व्यक्ति हो सकता है. उदाहरण के लिए, यदि मैं किसी दूसरे गांव में हूँ, लेकिन मेरा बेटा यहाँ है, और यदि किसी कारण से देवता क्रोधित है, तो यह समस्या हमारे बच्चों के माध्यम से भी सुलझाई जा सकती है. यदि किसी दूसरे गांव में कोई स्त्री बीमार हो जाती है, यदि देवता अपना क्रोध दिखा रहा है, यदि वह उसे दंड दे रहा है, और यदि हमारे बच्चों में से कोई किसी अन्य कारण से वहाँ गया हुआ है, तो लोग कह सकते हैं, “यह कालेश्वर का पुजारी है.” और वे बच्चे से देवता की पवित्र राख, विभूति, लगाने को कह सकते हैं, और यदि वह वास्तव में कालेश्वर की ही बीमारी है, तो वह उस राख से ठीक हो जाएगी.
डब्ल्यू. एस. – पहले आपने अपने पूर्वज का इतिहास बताया था. क्या उसका नाम काल्द था. क्या इसी कारण इस स्थान को काल्द बगड़ कहा जाता है?
शांति लाल – यह देवता काल भैरव है. लोग इसे काल्द का कचिया कहते थे. वह काला था, इसलिए हम उसे काला कहते हैं. और इसी कारण इस स्थान को काल्द बगड़ कहा जाता है.
डब्ल्यू. एस. – नौटी के पास एक देववक्ता ने मुझे बताया कि यह देवता डोल गांव में उत्पन्न हुआ, और वहाँ से यहाँ फैला, और कंखुल तथा अन्य स्थानों तक पहुँचा.
शांति लाल – डोल का कचिया इसका सहपाठी है. डोल में जो हुआ वह यह था कि किसी ने एक बच्चे को ज़िंदा दफना दिया. यह किसी शत्रु का काम रहा होगा. वह बच्चा ज़मीन के नीचे चीखता रहा और मर गया, और उसकी आत्मा ने एक अलौकिक शक्ति का रूप ले लिया, और वह पूरे क्षेत्र का देवता बन गया. और क्योंकि वह बहुत शक्तिशाली था, वह अपने सभी दिशा-ध्यानी के साथ आया. और इसी कारण उसे यहाँ श्मशान घाट का प्रभारी बनाया गया. आर. पी. एन.: कचिया वही बच्चा है.शांति लाल – वही बच्चा. आज भी जब वह स्वप्न में आता है, तो बच्चे का ही रूप धारण करता है. इस देवता से जुड़ी बहुत सी कथाएँ हैं, मैं उन्हें सब कैसे बता सकता हूँ.
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