पिछली कड़ी : जब तक सरकार मानती रहेगी कि ‘पलायन’ विकास की कीमत है, पहाड़ खाली ही होते रहेंगे
उत्तराखंड की आर्थिक नीतियों में पलायन को अंतरसंरचना की कमी व शिक्षा-स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के रूप में परिभाषित किया जाता रहा. सुधार के प्रयास बड़े धक्के के रूप में सामने आए जहाँ बड़े स्तर पर सड़कें बनीं जिनका उद्देश्य चार धाम यात्रा व चले आ रहे पर्यटन परिपथ में एकबारगी ही आमूलचूल काया पलट कर देना रहा. इकोतंत्र के विनाश की कीमत पर यह संरचनाएं बनीं तो पर्यटकों के बड़े हुजूम से पहाड़ की धारक क्षमता के संकट उभरने लगे. जलवायु संकट अलग से नई त्रासदी ले कर आए. शिक्षा-स्वास्थ्य में नए विश्वविद्यालय, नए महाविद्यालय, नए चिकित्सा केंद्र तमाम आधी अधूरी सुविधाओं के नाम पर खोले जो तय मानकों के आधार पर गुणवत्ता हीन घोषित हुए.
पत्रावलियों व फाइलों के ढेर में तय विकास के मात्रात्मक रूपक भारी भरकम पूंजी के विनियोग को सूचित करते दिखे. ऐसी नीतियां बनी जिनसे सुविधाओं का भ्रम जाल फैला पर आजीविका नहीं मिली. स्थानीय रोजगार~उत्पादन~आय के सृजन तंत्र का अभाव अब भी वही था. परंपरागत उद्योग विगलित हो हाशिये पर बने रहे. बड़े उद्योग, उपक्रम, नई तकनीक, एआई पहाड़ के लिए अप्रासंगिक ही रहे. पहाड़ के तथाकथित बड़े शहरों में एमएसएमई की सम्भावना बनी जहाँ उनके लिए बुनियादी जरूरतें उपलब्ध थीं पर उद्योग नीति का ऐसे कौशल से संयोजन बना जिसमें पारम्परिक ज्ञान अमान्य था. पहाड़ में पर्यटन सेवा केंद्रित था जिसमें स्थानीय उत्पाद अपनी पैठ बनाने में पिछड़े ही दिखते रहे.
तमाम यात्रा पथों में, कुरकुरे चिप्स के पैकेट, पानी व कोल्ड ड्रिंक्स के साथ मोमो मैगी के बढ़ते खोमचे आलू-रायता-पकोड़ी की दुकानदारी समेट गये. वैसे भी पारम्परिक खानपान, वस्त्र विन्यास व आभूषणों को आर्थिक नहीं सांस्कृतिक गतिविधि के रूप में सजावट का निमित्त बनाया गया जहाँ देखो रंगवाली पिछोड़ा और पेंट से बने ऐपण का प्रदर्शन है. और अब रील के नाम पर पहाड़ी बोली का. इस मामले में राजस्थान और बिहार के साथ उत्तरपूर्व के हिमालयी पहाड़ी इलाकों के उदाहरणों को देखा ही न गया जिन्होंने अपनी खान पान और पहनावे की पारम्परिक चीजों से पर्यटक को हमेशा आकर्षित किया और आजीविका का आधार भी बनाया.
नीति अर्थशास्त्र की सुनें तो अंतर्जात वृद्धि के सिद्धांत में स्थानीय संसाधन पारम्परिक उद्योग के ही बल पर उपयोग में आते हैं. समावेशी विकास में महिलाओं और गरीब वर्ग की भागेदारी बहुल है जो परंपरागत उद्योग की मुख्य धुरी है. इसी तरह जिन उद्योगों को न्यून कार्बन के अधीन रखा जाता है वह भी इसी श्रेणी में रखे जाते हैं. सतत विकास लक्ष्य या एस डी जी एलाइनमेंट में पारम्परिक धंधे सम्मिलित हैं (इसके पक्ष बिंदु 1, 8, 10 व 11 द्वारा प्रकट किये गए हैं) इसलिए इन्हें कल्याण का उपकरण नहीं बल्कि आर्थिक नीति का यंत्र माना जाना चाहिये.
अभी तक जो नीतियाँ केंद्र से राज्य की तरफ सप्लाई की गयीं उनमें एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) केवल उत्पाद चिन्हित करती थी जिसमें मूल्य श्रृंखला अनुपस्थित थी साथ ही यह पलायन सूचक भी न थी इसीलिए यह मात्र एक सूचीकरण अभ्यास बन गयी.दूसरी ओर एमएसएमई नीति पर्वतीय भूगोल से अनुकूलन नहीं रखती थी जिसमें लॉजिस्टिक व क्लस्टर को ध्यान में नहीं रखा गया. इस नीति ने स्थान को ध्यान में नहीं रखा.
कौशल विकास नीति मुख्यतः आईटीआई /अल्प कालीन प्रशिक्षण पर आधारित रही. इसमें पारम्परिक कौशल शामिल न था तो यह क्षेत्र असंगठित ही रहा. जबकि ऊन के बेहतरीन काम और ताम्बा, लोहा व अन्य धातुओं से बने प्रचलित पात्र हमेशा समर्थ मांग का प्रदर्शन करते रहे. इसके साथ ही ज्योतिष, फलित, वैद्यकीय परंपरागत योग्यता व अन्य कर्मकांड के मूल स्वरूप उपेक्षा से गुणवत्ता विहीन होते रहे.ऐसे में अनौपचारिक कौशल को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश ही न हुई.
इन नीतियों की पुर्नव्याख्या करते हुए “परिप्रेक्ष्य आयोजना” हेतु सबसे पहले तो पलायन निरोध को नीतिगत लक्ष्य बनाना होता जिसके लिए हर औद्योगिक नीति में “प्रवासन प्रभाव विवरण”अनिवार्य रहे. विकास खंड स्तर पर “ठहराव के लक्ष्य” नियत किये जाते. साथ ही पारम्परिक उद्योगों को नया नीतिगत आधार दे इन्हें रणनीतिक ग्रामीण अंतरसंरचना के रूप में शामिल कर दिया जाता. ऐसे लघु उद्योग ठहराव को सूचित करते. ऐसी संस्थागत पुनरसंरचना में परंपरागत व पर्वतीय उद्योग धंधों के संरक्षण व विकास के लिए अलग मंत्रालय होता. यह सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों के प्रचलित स्वरूप से भिन्न रखा जाता पर समन्वित होता. अब भी ग्राम उद्योग के लिए समूह या क्लस्टर नीति बनानी होगी जिसमें उत्पादन फलन की कुछ आदा या इनपुट जैसे कच्चा माल, पारंगत कारीगर इत्यादि सुविधा से उपलब्ध होते रहें.
ग्रामीण उद्योग विकास का वित्तीय रूप से सबल तर्क यह है कि इसमें शहरी रोजगार प्रदान करने जैसी उच्च लागत नहीं आती. अर्थात पारम्परिक उद्योग स्थापित करने पर व्यय कम होता है जबकि प्रतिफल दीर्घाकालिक होता है.पारम्परिक उद्योगों को जब तक कल्याण समझा जाएगा तब तक प्रवासन आर्थिकी अपना खेल करती रहेगी.
पलायन के सामाजिक व्यय काफी अधिक होते हैं और इनका प्रभाव अदृश्य सा रहता है. यह बुनियादी बात बहुत बाद में समझ में आती है. इसलिए जनसंख्या की रोकथाम के साथ उपचार जरुरी होगा. ऐसे सन्दर्भ में पहाड़ की उद्योग नीति रोजगार सृजन नहीं वरन जनसंख्या स्थिरीकरण के प्रतिमान पर आधारित रहेगी. उसे ठहरने के अवसर मिलें यह प्राथमिक मुद्दा बने. 1970 से 1980 के दशक में नारायण दत्त तिवारी ने उत्तरप्रदेश के पर्वतीय इलाके में भीमताल, हल्द्वानी, रुद्रपुर, काशीपुर के साथ ही कौसानी अल्मोड़ा में छोटे व मध्यम उद्योगों की नींव रखी. सोच थी कि पहाड़ी खेती पर निर्भरता कम हो, पहाड़ में रोजगार मिले और पहाड़ी युवाओं का बाहर भटकना थमे . उन्होंने पहाड़ में खाद्य प्रसंस्करण (फल-सब्जी-जैमजूस), औषधीय/हर्बल (जड़ी-बूटी आधारित) इलेक्ट्रॉनिक्स (आईटीआई / पीएसयू सहायता इकाईयां) हस्तशिल्प (हाथकरघा, ऊन) लघु विनिर्माण (टूल, स्पेयर पार्ट) के कारखाने/शेड इकाईयां शुरू करवायीं. वस्तुतः ये उद्योग “पर्वतीय मॉडल” नहीं थे बल्कि मैदान से उठा कर पहाड़ में रख दिए गये थे.
तिवारी मॉडल में कई संरचनात्मक झोल थे. पहाड़ की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में नहीं रखा गया. उसमें भी मैदान जैसी सुविधाओं को तैयार मान लिया गया. पर्वतीय विशिष्ट लागत अकुशलता को स्वीकार नहीं किया गया कच्चा माल बाहर से लाने और तैयार वस्तुओं की डिलीवरी में परिवहन लागत बहुत अधिक आती थी. कच्चा माल की मंडी भी मैदान में थी जिससे लागत बढ़ी. जो माल बिजली, ट्रांसपोर्ट की कमी से तैयार होता उसकी भी डिलीवरी समय पर न हो पाती. इससे उसका बाजार फैल न पाया. कुछ उत्पादक तो ऐसे सूरमा निकले कि मैदान में ही माल बना वहीं गफ्फार मार्किट, भगीरथ प्लेस में मांग-आपूर्ति खपाने जैसा दो टप्पे का खेल शुरू कर दिया. इससे आगे ट्रांसपोर्ट सब्सिडी भी थी जेब भरने को.
पर्वतीय इलाकों में उद्योग की बुनियाद की हामी भरते ये कारखाने-शेड पहाड़ प्रेरित का नकाब लगाए पर पूरी तरह उत्तरप्रदेश निर्भर थे. सरकारी अनुदान, अनुबंध पर मिली जमीन, सस्ती बिजली और प्रशासन का ऐंठ भरा प्रबंध जबकि राजधानी में यूपी डेस्को औद्योगिक विकास पर बुनियादी आधार विकसित करने पर जुटा था. तमाम हील हवालों के बाद पहाड़ के उद्योग वाले तम्बू तने जिनके पीछे बाजार की तमाम अपूर्णताएं थी जैसे ही राज सहायता के डंडे हिले ये ढह गए. इसका सबसे बड़ा कारण व नीतिगत दोष यह था कि इनके जनक भाई भतीजावाद से पोषित चकड़ैत थे. उनमें साहस- उपक्रम योग्यता के नाम पर स्क्रू-ड्राइवर टेक्नोलॉजी का जोड़ जंतर था. जबकि अपने बूते पर खड़ा पाताल देवी अल्मोड़ा का हिक्स थर्मामीटर इनसे पहले अपनी अलग पहचान और बाजार बना चुका था और फल रस, अचार चटनी की राजकीय फल उपयोग इकाईयां तमाम जगहों में बेहतर सामान बना ग्राहकों को देती रहीं थीं. उन्हें बस कच्चा माल, चीनी देनी होती और बनाई का वह प्रति किलो के हिसाब से वसूलते. ऐसे में तिवारी मॉडल के ये उद्योग जिनके टिन-तप्पड़ बहुत बाद तक भीमताल में देखे जाते रहे फाइल आधारित परियोजनाओं के नमूने बन कर रह गए. अब तो भीमताल में केकटस व फूलों की नरसरी महक रही है. स्वउद्यम की मिसाल फ्रूटेज बन गया है.
तिवारी मॉडल में स्थानीय संसाधनों के उपयोग की समझ ही सबसे बड़ी उलझन थी. माना गया कि स्थानीय लोग इनमें खप जायेंगे पर यह ध्यान में न रखा गया कि उनमें वांछित तकनीकी कुशलता व योग्यता है भी या नहीं. कारखाना चलाने से पहले पूर्व नियोजित प्रशिक्षण की कोई व्यवस्थान न थी और न ही स्थानीय युवा शक्तियों को निर्णय में भागीदारी न मिली जबकि कुमाऊं और गढ़वाल में अच्छे सरकारी पॉलिटेक्निक मौजूद थे. प्रबंध व तकनीक से जुड़े पहाड़ से बाहर के श्रमिक आए और स्थानीय युवा पहाड़ से बाहर जाते रहे.
औद्योगिक क्षेत्र में भूमि नीति के अधीन उद्योगों को जमीन दी गयी थी पर इसका विस्तार नहीं हुआ. विस्तार, प्रसार और श्रृंखला जैसे प्रभाव तो औने-पौने पहाड़ की जमीन खरीद उनमें भव्य प्रासाद, भवन, कोठी होटल बना सीमेंट सरिया के उपक्रमों पर पड़ा.अब यह ऐसे उन्नत क्षेत्र बन रहे थे जो आस पास के पिछड़े क्षेत्र से साधनों को सोख रहे थे. प्रतिभा पलायन-ब्रेन ड्रेन, पूंजी का बड़े शहरों में गमन, कच्चे माल की निकासी, बुनियादी ढांचे की अवरुद्ध दशा मुख्य लक्षण बनते जा रहे थे. यह बैक वाश या ध्रुवीकरण था जिसका उल्लेख गुन्नर मिर्डल ने एशियन ड्रामा में स्पष्ट उदाहरणों के साथ किया जो कम विकसित इलाके में देखे जाते रहे.
हमारे यहाँ उद्योग लगाने की घोषणा को ही औद्योगी करण मान लिया गया और शिलान्यास के पत्थर लग गए. औद्योगीकरण की समझ में न्यूनाधिक रूप से तैयार होने वाली वस्तु+संसाधन का आवटन व नियतन+संसाधनों का निर्धारण+एकत्रण+सक्रियता+बाजार की पूर्णता+कौशल व जोखिम क्षमता+पूंजी की उपलब्धता+स्थानिक विशेषताओं को ध्यान में रखा जाता है. यहाँ चूक हो गई. अगली असावधानी यह रही कि इनमें पहाड़ की खेती व छोटे उद्योग की श्रृंखला ही अनुपस्थित रही. उदाहरण के लिए फल प्रसंस्करण उद्योग लगे पर फल उत्पादन नीति न बदली. अच्छा खासा चौबटिया गार्डन चौपट कर दिया. बोना के सेव भी याद न रहे और न ही हर्षिल जहाँ एक विदेशी आ बाग लहलहा गया. अपने यहां लगी इकाईयों में अन्य पर्वतीय राज्य मुख्य उत्पादन के साथ फलों के छिलके, उनकी गिरी का भी पूरा उपयोग कर सहायक उत्पाद बना डालते थे जैसे कॉलिंगपोंग से ऊपर के इलाकों में संतरे व अन्य नींबू प्रजाति के फल छिलकों से इसेंशियल आयल व फेस पाउडर बना लिया जाता तो हिमाचल में खूबानी, पुलम की गिरी से तेल जो बड़ा मंहगा बिकता. ऐसा भी नहीं कि इनका उपयोग उत्तराखंड की औरतों को मालूम न था. घरेलू उपायों से मध्यवर्ती तकनीक से घरेलू उपयोग की ऐसी कई वस्तु, प्रसाधन यहाँ की रसोई में आमा, ईजा बना डालतीं.
उसी दौर में अर्थशास्त्र की एक किताब “स्माल इज ब्यूटीफुल” नीति विशेषझों के साथ आम लोगों के लिए बड़ी उपयोगी बनी थी जो बेहतर और कारगर तकनीक के द्वारा वृद्धि की पुरजोर वकालत करती थी. पर पहाड़ के उद्योगों की आधार शिला में कच्चे माल के लिए भटकना और जो तैयार हो उसकी फेरी लगाना ही लिखा हुआ था.उद्योग लगने की शुरुवात से ही भीमताल जैसे भावी औद्योगिक अस्थान में जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ने लगीं थी तो आस पास रामगढ़ व मुकतेश्वर में भी खेत व उद्यान के तप्पड़ खूब बिके. शहरीकरण तेज हुआ. बिजली पानी व जन सुविधाएं उसी मंथर गति को थामे रही नतीजा औद्योगिक परिसर~औद्योगिक इको प्रणाली की विसंगति को भोगता रहा. अनुदान और छूट में भी बाहरी विनियोग कर्ता आगे रहे. बरसों से बाहर रहे प्रवासी भी मैदान में कूदे. नीति अब भी मैदान केंद्रित थी जो प्रोडक्ट बन पड़ा उस पर पहाड़ की मुहर.
विफलता गाथा में संस्थागत निरंतरता में कमी के झोल दिखते रहे. राजकाज में जब दल और नेता बदले तो प्राथमिकताएं भी बदल गईं. पहले से चली योजनाएं बंद पड़ गयीं. संस्थाऐं नये खोल से ढक दी गयीं. अचानक उत्तराखंड राज्य बना तो पुराने उद्योग धंधों को पुरानी देन दारियां या विरासत दायित्व समझा गया. जब नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने तब लखनऊ से देहरादून के गलियांरे आने तक इनके पुनर्जीवन की धमनी -शिराएं सुप्त हो गईं थी. यही नहीं पटवाडांगर का वैक्सीन हो, मोहान की दवा या रानीखेत ड्रग फैक्ट्री इनके साथ साथ केंद्र का एच एम टी कारखाना सब दम तोड़ गये तभी टाइटन घड़ी बाजार में आई थी जिसने स्विस घड़ियों को भी पछाड़ दिया. बड़ा स्वाभाविक प्रश्न उभरता है कि तिवारी मॉडल को यदि सुधारा जाता तो क्या हो सकता था?
यदि उद्योग स्थानीय संसाधन आधारित होते. महिला केंद्रित रहते. सहकारी प्रारूप पर चलते. छोटे छोटे क्ल स्टर होते. बिक्री केंद्र ऐसे बनते जिनमें ग्राहक को लूटना नहीं बल्कि गुणवत्ता देना लक्ष्य होता-ज्यादा दूर नहीं लिज्जत पापड़ से सीख लेते, न कि पहाड़ी लूँण
से, तो पहाड़ में बने रहना कइयों को भा जाता. देखा देखी कई सेवाएं पनपती. पर अभी तो इन्वेस्टर्स सम्मिट के जलवे हैं. उद्योग इसलिए असफल नहीं हुए कि इनकी सोच आधी-अधूरी थी बल्कि जिस तरीके से इन्हें रोपने की तैयारी की गयी उसने पहाड़ के परिवेश यहाँ की लोकथात और बाजार को एक साथ न रखा.
उत्तराँचल (आज के उत्तराखंड) की पहली औद्योगिक नीति की घोषणा 8 जुलाई 2001 को हुई. केंद्र सरकार के विशेष पैकेज के रूप में औद्योगिक नीति 2003 को घोषित की गई थी जिसका मुख्य उद्देश्य राज्य की तीव्र आर्थिक वृद्धि, विनियोग आकर्षित करना और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना रहा. 1 जुलाई 2020 को सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम मंत्रालय भारत सरकार की अधिसूचना से सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्यम विकास अधिनियम 2006 में संशोधन कर सूक्ष्म उद्यम में 1 करोड़ ₹% का विनियोग व कारोबार 5 करोड़ ₹,लघु में 10 करोड़ ₹ का विनियोग व कारोबार 50 करोड़ ₹ तथा मध्यम में 50 करोड़ ₹का विनियोग व कारोबार की सीमा 250 करोड़ ₹ की गयी
मार्च 2003 से मार्च 2007 तक नारायण दत्त तिवारी उत्तराखंड के मुख्य मंत्री रहे.उनके समय में तय औद्योगिक नीति में 50 करोड़ ₹ से अधिक वाली परियोजनाओं को मेगा प्रोजेक्ट की मान्यता दी गयी. वैट में 90% तक छूट के साथ अन्य कर रियायतें दी गयीं. छोटे उद्योगों (एसएसआई) के लिए 3% व दुर्गम इलाकों के लिए 5 % तक ब्याज सब्सिडी का प्राविधान हुआ. फिर सिडकुल के माध्यम से एकीकृत औद्योगिक सम्पदा की स्थापना को प्राथमिकता मिली. तब यह सोचा जा रहा था कि इससे पहाड़ी और दूर दराज के इलाकों में रोजगार पैदा होगा और क्षेत्रीय विषमताएं घटेगी. नीतिगत जमा यह था कि कि राज्य की विनिर्माण इकाईयां, खास तौर पर औषधि, हर्बल और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित इकाईयां बढ़ेंगी. अवस्थापना सुविधा तैयार करना भी नियत हुआ.
उत्तरप्रदेश के पर्वतीय जिलों में उद्योग स्थापना की उनकी नीति बनाम 2003 की औद्योगिक नीति में जो भिन्नताएं देखी गयीं उनमें मैदानी क्षेत्रों को ही लाभ मिला. पहाड़ के लिए 2008 में विशेष एकीकृत औद्योगिक प्रोत्साहन नीति की घोषणा भी की गई जिसमें 2011 में संशोधन भी किया गया. नई कार्य योजना में क्षेत्रीय असंतुलन के समाधान हेतु सुदूर पर्वतीय इलाकों में उद्यम स्थापना व इनके उन्नयन के लिए कई प्रोत्साहनों की घोषणा हुई. भारत सरकार के “एक जनपद -एक उत्पाद कार्यक्रम” के अनुरूप राज्य सरकार “एक जनपद- दो उत्पाद नीति” पर चली जिससे चिन्हित उत्पाद की पहचान बढ़ सके. इसके साथ ही मुद्रा, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, मेक इन इंडिया, प्रधान मंत्री गति शक्ति योजना व भारत सरकार के अन्य मिशन मोड कार्यक्रम व योजनाओं से समन्वय स्थापित करते हुए प्रदेश सरकार ने उद्योग विकास के विस्तार का प्रचार प्रसार किया. 2008 में तत्कालीन मुख्य मंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने पहाड़ी व दूर दराज के इलाकों में उद्योगों की दशा सुधारने पर बल दिया.
तिवारी युग की नीति का उद्देश्य क्षेत्रीय संतुलन पर था जबकि 2003 की नीति तीव्र आर्थिक वृद्धि पर केंद्रित रही. तिवारी युग में पहाड़ की उपेक्षा का पूर्वाग्रह था जिसमें उत्तरप्रदेश राज्य से विकास के मानक तय हुए. 2003 की नीति में विनियोग स्पर्धा व बाजार नेतृत्व को ध्यान में रखा गया. दोनों नीतियाँ अलग समस्या से निकलीं पर दोनों ही पर्वतीय यथार्थ से कटी थीं.
प्रथक पर्वतीय क्षेत्र के लिए तिवारी ने उत्तरप्रदेश राज्य प्रेरक औद्योगिकी को चुना जो सार्वजनिक संस्थाओं व अनुदान, पर आश्रित था. यह सार्वजनिक संस्थाओं व अनुदान पर आधारित था. रोजगार को सामाजिक लक्ष्य समझा गया. 2003 की नीति विनियोगी को आकृष्ट करने के लिए कर छूट व टैक्स होली डे पर जोर देती थी. माना गया कि इससे सकल घरेलू उत्पाद बढ़ेगा. इस उपाय का बाजार तर्क मजबूत था पर इसकी सामाजिक व भौगोलिक संवेदन शीलता कमजोर रही.इसमें एकल खिड़की, विनियोगी को सुविधा व निजी पूंजी पर निर्भरता रही पर इससे पहाड़ की संस्थाऐं अनुपस्थित रहीं व परंपरागत उद्योग इससे बाहर हो गए.
तिवारी की नीति व 2003 की उद्योग नीति पहाड़ के भूगोल की उपेक्षा करती थीं, दोनों में पहाड़ से चढ़ने व उतरने की लागत की अनदेखी की गई, लॉजिस्टिक्स गौण रहा. दोनों में परियोजनाएं पहले आरम्भ कर दी गयीं, पर्यावरण पर उनके दुष्प्रभाव व उसे ठीक करने को भूल सुधार की भांति देखा गया. दोनों का स्केल डिज़ाइन मैदान जैसा था जिसमें पहाड़ की भू-आकृति से पैदा हुई समस्याओं को पहले से ध्यान में नहीं रखा गया. तिवारी युग में पहाड़ में लगाए उद्योग टिके नहीं व 2003 की नीति से पहाड़ में उद्योग चढ़े ही नहीं.
स्थानिक वितरण को देखें तो पहले भीमताल, हल्द्वानी, अल्मोड़ा व कौसानी में प्रयोग हुआ तो 2003 के बाद पहाड़ इस हलचल से परे हो गया व उधम सिंह नगर, देहरादून व हरिद्वार इनका आधार बना. सबसे बड़ा नीतिगत भ्रम यह रहा कि एक ही नीति पूरे राज्य में लागू हो सकती है जबकि उत्तराखंड में मैदान प्रतियोगी आर्थिक गति से पुष्ट थे तो पहाड़ उत्तरजीविता और स्थिरता के घेरे में. दोनों के लिए अलग-अलग किस्म की नीति चाहिये होती. 2003 की नीति और पलायन को प्रेरित करने वाली बनी.
तिवारी की नीति की नीयत सही थी पर उसका डिज़ाइन अधूरा था. पहाड़ के उपक्रमी सरकारी हील हवाले की दौड़ में ठिठक गए. यदि तिवारी के मॉडल को 2003 में सुधारा जाता तो पर्वतीय उद्योगों को विशेष दर्जा मिलता व आज पहाड़ आर्थिक बोझ प्रतीत नहीं होते. उपर्युक्त दोनों नीतियों से यह सबक मिलता है कि इरादे के बिना रचना से असमंजस ही पनपता है तो वृद्धि बिना स्थानिक धरातल से असमानता ही उत्पन्न करती है. उद्योग बिना आजीविका के पलायन का कारक बनते हैं. उत्तराखंड की औद्योगिक विश्रांति दो असफलताओं का परिणाम है: तिवारी युग में किया गया एक अधूरा प्रयोग और फिर 2003 की नीति में हुई पहाड़ की सुनियोजित उपेक्षा.

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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1 Comments
कैलाश उप्रेती
लगता है कि प्रोफेसर पांडे को वास्तविक स्थिति का आंकलन का अनुभव नहीं है,
आज तिवारी जी के द्वारा लगाए गए उद्योग हजारों लोगों को रोजगार दे रहे है, तिवारी जी नहीं होते तो टाटा, महिंद्रा, बजाज, अशोक लेलैंड जैसे उद्योग नहीं आते,
यह राज्य का दुर्भाग्य है कि तिवारी जी के बाद ऐसा कर्मठ नेता नहीं मिला, खंडूरी जी जिनसे आशा थी कि कुछ अच्छा करेंगे वह भी लेगे लगाए उद्योगों को उजाड़ने मैं लग गए
पहाड़ों की दुर्गम भौगोलिक परिस्थिति के कारण यहां छोटे छोटे उद्योग लग सकते हैं, पहाड़ों मैं ट्रांसपोर्टेशन कीमत बहुत ज्यादा है और पानी की कठिनाई है, यहां के लोगों को हर्बल मिशन बहुत अच्छा अल्टरनेट दे सकता है
आज की सरकार की प्राथमिकता खनन उद्योग की है लेकिन यह उत्तराखंड को उजाड़ने मैं लगा है,
होटल व्यवसाय को भी प्राथमिकता दी जा रही ही जिसमें बहुत सारों मैं देह व्यापार भी चलता है और इसमें पहाड़ की लड़कियां भी फंस रही हैं,
भ्रष्टाचार ने लोगों की कमर तोड़ी है, अब शायद ही कोई उत्तराखंड मैं उद्योग लगाने को इच्छुक होगा