फोटो: अशोक पाण्डे
उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाके को ध्यान से देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध पिछले करीब दो सौ बरसों में बहुत बिगड़े हैं और इन्हें बिगाड़ने का काम केवल मनुष्य ने किया है. (Uttarakhand World Environment Day)
पहाड़ में आने वाली अधिकतर आपदाएं मनुष्य द्वारा बनाई गयी हैं. चाहे पेड़ों के अंधाधुंध कटान के कारण पैदा हुआ पर्यावरण-असंतुलन हो, चाहे गैर-नियोजित विकास के नाम पर किये जा रहे निर्माणों के कारण हो रहे भूस्खलन हों, चाहे हर साल जंगलों में लगने वाली आग हो – गौर से देखा जाय तो इन सब के पीछे मनुष्य का लालच और अक्षम्य लापरवाही मुख्य कारण हैं. (Uttarakhand World Environment Day)
अपनी महत्वपूर्ण किताब ‘हालात-ए-हिन्दुस्तान’ की शुरुआत में राम चन्द्र गुहा हमसे आग्रह करते हैं कि विकास की सही तस्वीर देखने के लिए ऊंचाई पर उड़ते हुए किसी पक्षी की भांति (बर्ड्स आईव्यू) नहीं बल्कि किसी कीड़े की तरह धरती पर रेंग कर (वर्म्स आईव्यू) चीजों को देखे जाने की आवश्यकता है. सतह पर चलकर हमें नज़र आएगा कि हर जगह हर वर्ग के हर व्यक्ति को हर किसी चीज की भयानक कमी है. सतह पर चल कर ही हमें नज़र आएगा कि हमने अपार प्राकृतिक संपदा का कैसा असमान वितरण किया है और अपने कभी समाप्त न होने वाले लोभ के चलते धरती को न रहने लायक बना देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
हर साल की गर्मियों की भांति हाल के दिनों में उत्तराखंड के जंगलों में बेकाबू आग लगी. हर साल की तरह पारिस्थिकी की हानि हुई. हर साल की तरह जैव संपदा की बर्बादी हुई. हर साल ही तरह सरकारी विभाग और उनकी अकर्मण्यता मीडिया के निशाने पर आये और हर साल की तरह अंततः प्रकृति ने ही बारिश के माध्यम से सब कुछ पूरी तरह समाप्त होने से से फिर से बचा लिया.
हम केदारनाथ की त्रासदी को इतनी जल्दी भूल गए जिसका जीवंत प्रमाण है इस साल वहां जाने वाले यात्रियों की संख्या में अकल्पनीय इजाफा और उन यात्रियों के लिए किये जाने वाले सरकारी-गैरसरकारी इंतजामों में बरती जाने वाली लापरवाही और लूट.
देवभूमि के किसी भी दूरस्थ स्थान पर, जहाँ तक मनुष्य पहुंचा है, आप एक वर्ग फुट धरती ऐसी नहीं खोज सकते जिस पर प्लास्टिक या कूड़ा न हो.
आखिर क्या वजह रही होगी कि एक समय में देश की समृद्धतम जगहों में गिने जाने वाले शहर अल्मोड़ा और पौड़ी पानी की कमी के कारण कुख्यात हो गए. ऐसा क्यों हुआ कि हजारों की तादाद में गाँव के गाँव उजड़ गए, सारे नौले-धारे सूख गए. ऐसा क्यों है कि साथ किलोमीटर पैदल ट्रेकिंग कर आप एक गाँव पहुंचें और वहां की इकलौती दुकान में आपको आटा-चावल नहीं बल्कि मैगी और कोला मिलता है.
विश्व पर्यावरण दिवस पर ऐसी हजार बातों की झलक भर दिखाई जा सकती है लेकिन यह तब तक एक रस्मी बात बनी रहेगी जब तक हम इस बात का अहसास नहीं करते कि हमारे पुरखे प्रकृति का सम्मान करना जानते थे और उसकी हिफाजत अपनी माँ से अधिक किया करते थे. प्राकृतिक संरक्षण की सारी परम्पराएं सामूहिक और सामुदायिक होती थीं. आधुनिक विकास का सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि उसने हमें और अधिक स्वार्थी बनाया है जिसमें पड़ोसी घर तक के लिए कोई संवेदना नहीं बची है.
हमें न जाने कहाँ से यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया लगता है कि हमारी प्रकृति को बचाने और उसके संसाधनों को मैनेज करने का काम सरकार का होता है. सरकारें कभी यह काम नहीं करेंगीं. उनके पास अनगिनत फाइलों को निबटाने का वैसे ही इतना सारा काम बचा हुआ है. अगर आप उम्मीद करते हैं कि आपके घर के पास लगी जंगल की आग को बुझाने या सूख गए नौले को पुनर्जीवित करने जिले का कलक्टर या विधायक-सांसद आयेगा तो आपकी सोच में कहीं न कहीं खोट है.
पर्यावरण को, हिमालय को, उत्तराखण्ड को, पहाड़ और उसके वन-धारे-नौलों को बचाने का काम सामुदायिक तरीके से ही संभव है. जितनी जल्दी हम इस काम को शुरू कर सकें उतना बेहतर!
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आर्टिकल अच्छा है, यथार्थ को दर्शाता है परन्तु लिखने वाले सज्जन श्री रामचंद्र गुहा जी को जबसे प्रसन्न होकर बीफ खाते हुए देखा है, उनकी आंतरिक स्थिति बयां होती है। बाकि ये बिल्कुल सत्य है न केवल पहाड़ बल्कि प्लेन्स सभी जगह हमने प्रकृति का सत्यानाश कर दिया है, अब प्रकृति को भी अधिकार है संतुलन बनाने का।