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नगरूघाट मेला : यहाँ लगती है “मितज्यू” की अनूठी डोर

उत्तराखंड की मिट्टी में लोक परंपराओं की खुशबू रची-बसी है. हर पर्व, हर मेला यहाँ सिर्फ उत्सव नहीं होता, बल्कि सामाजिक एकता और मानवता का प्रतीक भी बन जाता है. ऐसी ही एक अद्भुत परंपरा का गवाह है — नगरूघाट मेला, जो भारत-नेपाल सीमा से लगे लोहाघाट ब्लॉक के महाकाली नदी तट पर हर साल आयोजित होता है.
(Unique Festivals in Uttarakhand)

“मितज्यू” लगाने की सदियों पुरानी परंपरा

नगरूघाट मेले की सबसे खास बात है यहाँ निभाई जाने वाली “मितज्यू” यानी मित्रता की रस्म. इस रस्म में भारत और नेपाल के लोग एक-दूसरे को “मार” (माल्य या हार) पहनाकर जीवनभर के मित्र बन जाते हैं. यह संबंध केवल दिखावा नहीं, बल्कि सच्चे भाईचारे, प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है. यह परंपरा सीमाओं से परे जाकर दो देशों की जनता को जोड़ती है — धर्म, संस्कृति और मानवता की साझा डोर में.

पितरों को समर्पित भावनाएँ

मेले की शुरुआत पितृ पूजन से होती है. श्रद्धालु लोग महाकाली नदी में स्नान कर अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं. इसके बाद मात-पितृ की पूजा कर मेला आरंभ होता है. यह परंपरा इस बात की याद दिलाती है कि हर नई शुरुआत अपने पुरखों के आशीर्वाद से ही शुभ होती है.
(Unique Festivals in Uttarakhand)

लोक संस्कृति और देव परंपरा का संगम

मेले के दौरान पूरा क्षेत्र लोक गीतों, ढोल-दमाऊं की थाप और देव झांकियों से गूंज उठता है. भोलानाथ मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, और आसपास के गांवों से आए लोग पारंपरिक वस्त्रों में देव रथ लेकर परिक्रमा निकालते हैं.

भारत और नेपाल दोनों ओर के कलाकार यहाँ लोक नृत्य और जागर प्रस्तुत करते हैं — जिससे यह मेला सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव बन जाता है.

सीमाओं से परे मेल-मिलाप

नगरूघाट मेला भारत और नेपाल की साझा विरासत को जीवंत करता है. यहाँ न कोई सीमा दीखती है, न कोई अलगाव — केवल मित्रता, विश्वास और साथ रहने की भावना दिखाई देती है. मेले के अंत में जब “मितज्यू” एक-दूसरे को गले लगाते हैं, तो वह दृश्य पूरे क्षेत्र की एकता और सादगी का प्रतीक बन जाता है.

कैसे पहुँचें

नगरूघाट, चम्पावत जिले के लोहाघाट ब्लॉक में पड़ता है. यहाँ टनकपुर या पिथौरागढ़ से सड़क मार्ग द्वारा पहुँचा जा सकता है. मेला सामान्यतः कार्तिक पूर्णिमा के आसपास आयोजित होता है.
(Unique Festivals in Uttarakhand)

नगरूघाट मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है — यह उन रिश्तों की कहानी है जो सीमाओं से परे जाकर दिलों को जोड़ते हैं. “मितज्यू” की डोर में बंधे लोग इस धरती को यह संदेश देते हैं कि जब संबंध सच्चे हों, तो कोई भी सरहद दिलों को अलग नहीं कर सकती.

-काफल ट्री डेस्क

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